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सच है

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दिल में उठा है दर्द सा कुछ,
रह रह कर के आता है,
सह सह कर के जीता हूँ,
हाँ ये सच है, मैं पीता हूँ।

भुन्नैटा सा यह जीवन क्यों,
सपने धरे सब, ज्यों के त्यों,
ख्वाइश तोड़-२ के सीता हूँ,
हाँ ये सच है, मैं पीता हूँ।

चहुँओर मेरे है हलचल सी,
पगला सा हूँ मैं देख रहा,
लो हाथ रख गीता पे कहूँ,
हाँ ये सच है, मैं पीता हूँ।

आँखें भर आती जब-तब,
मेरे हाथ भी कापें जाते हैं,
बोझ ये कब तक मैं सहूँ,
हाँ ये सच है, मैं पीता हूँ।

अपना जिसको माना था,
दिल था जिसके नाम किया,
समेटता मैं वही फजीता हूँ,
हाँ ये सच है, मैं पीता हूँ।

सब फुर्ती फुर्र हुई मेरी,
चाहते हैं भागूं खूब तेज,
इंसान हूँ, न मैं चीता हूँ,
हाँ ये सच है, मैं पीता हूँ।

वाद-विवाद न करना अब,
ठान लिया बस ठान लिया,
उलझन सारी अब सुलझा दूँ,
हाँ ये सच है, मैं पीता हूँ।।

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Written by arpitgarg

February 25, 2015 at 3:57 am

Posted in Hindi, Poetry

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