ArpitGarg's Weblog

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लहू का सागर बहने दे

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सुबह की पहली किरन,
होती कितनी कपटी है,
सारी दुनिया की बुद्धि,
उस एक ऊँगली में लिपटी है|

एक कश लगा जोर का तू,
छल्लों को फिर उड़ते देख,
सागर की गहराई में भी,
गहराई का वो आलम कहाँ|

सिक्का जो है खोटा वो,
उठा के उसको फेंकें सब,
तुझको तो मैं तब मानूं,
उस सिक्के को चमकाए जब|

हैं दुनिया में कितने इश्वर,
राम रहीम येशु भर भर,
करेगा क्या तू इश्वर चुन,
अपना एक नया ही इश्वर बुन|

रातों को जब सन्नाटा है,
चीर उसे जो पाता है,
उसे ही पूछा जाता है,
नहीं तो दूजा खाता है|

आग को थोड़ा दे और हवा,
थोड़ा तो संयम को कम कर,
उठा हाथ में एक पत्थर,
और हो जाने दे शीशा चूर,

युग नया कभी ना आता है,
तिल तिल के बनाया जाता है,
तिल तिल के अब मरना छोड़,
हवा के रुख को अब तू मोड़|

होली रंगों से कब तक,
क्या ऐसे क्रांति आएगी?
लगा तिलक तू माथे पर,
औ लहू का सागर बहने दे||

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Written by arpitgarg

September 15, 2012 at 12:12 am

Posted in Hindi, Prose

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