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सायें सायें

with one comment

सोचा मैंने एक दिन ऐसा,
होता होगा नर्क भी कैसा,
जहाँ गर्म सर्द का भेद न हो,
चलती हो हवा बस सायें सायें।

चीख हलक से न निकले,
जहाँ लौह भी बन बर्फ पिघले,
हर ओर सन्नाटा पसरा हो,
कौआ भी चुप, न काएं काएं।

घनघोर तबाही मंजर हो,
बस खूनी भूतानी खंडर हो,
ढहते सपने, बहते अपने,
फिस्स होता महल, टाएं टाएं।

बस मार काट और सर्वनाश,
जलते से बदन, उड़ते चिथड़े,
गर कुछ समझायी आता है,
ढिशुम ढिशुम और धायें धायें।

सोने को नसीब न तल कोई,
खाने को फक्त कंकड़ हो,
पीने को मिले बस अपना लहू,
ज्वालामुखी में लावा से नहाएं।

जहाँ दर्द की कोई थाह न हो,
हो यातनाएं बस दिन औ रात,
नुचता हो बदन, रूह भी कापें,
जिन्दा शरीर गिद्ध खाएं जाएँ।

सोच के ही मैं सहम गया,
क्या ऐसा नर्क हो सकता है?
जहाँ गर्म सर्द का भेद न हो,
चलती हो हवा बस सायें सायें।।

Written by arpitgarg

March 18, 2014 at 3:08 pm

Posted in Hindi, Poetry

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One Response

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  1. your flow of words is amazing… seems it comes naturally to you… great blog.
    I am a blogger from India, Delhi… visit my page sachinmanan.wordpress.com and pls share your comments

    सचिन मनन's avatar

    SachinManan

    March 18, 2014 at 11:06 pm


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