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गुमसुम

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शून्य को बैठा ताक रहा,
जाने क्यों बगलें झाँक रहा,
अपनी मस्ती में था झूमा,
रहने लगा तू क्यों गुमसुम।

हर ओर तरंगें बिखरी थी,
घनघोर घटाएं छितरी सी,
हंसने से सवेरा होता था,
रहने लगा तू क्यों गुमसुम।

चलने से थिरकन होती थी,
धू-२ के शिकन न होती थी,
हर वाद-विवाद में था अव्वल,
रहने लगा तू क्यों गुमसुम।

कुल दीपक तू कहलाया था,
माहौल हुआ गरमाया सा,
अग्नि तपिश थी लगती नम,
रहने लगा तू क्यों गुमसुम।

सर माथे तुझे लगाते सब,
मूरत न कोई, अपना तू रब,
तू कलाबाज, मस्ती करतब,
रहने लगा तू क्यों गुमसुम।

प्रश्न का हर, तू था उत्तर,
हर दांव रहा मीले पत्थर,
ध्वनि तेरी धरती कम्पन,
रहने लगा तू क्यों गुमसुम।

काजल से काली रात है यह,
डूबे सब, कहर बरसात ठहे,
कठिन पहर, न आये समझ,
रहने लगा तू क्यों गुमसुम।।

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Written by arpitgarg

September 2, 2014 at 2:05 am

Posted in Hindi, Poetry

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