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सवा तीन रात के

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गुमनाम अँधेरा छाया है,
चाँद भी खिल न पाया है,
नीरस मन बिन बरसात के,
सवा तीन बजें जब रात के।

झींगुर मधुर ध्वनि चेते,
कुकुर भी जैसे गूँज गान,
रोग अनिद्रा मारे जोर,
सवा तीन बजें जब रात के।

कोई फुटपाथ पे है सोया,
कोई बिन आंसूं के है रोया,
सब मारे हैं हालत के,
सवा तीन बजें जब रात के।

पंखा सर सर कर चलता,
जैसे सन्नाटे को दबा रहा,
डर लगता हल्की आहट से ,
सवा तीन बजें जब रात के।

पानी पी-२ कर बहला मन,
उत्तर दक्षिण, दक्षिण उत्त्तर,
संजीदा बिन ज़ज्बात के,
सवा तीन बजें जब रात के।

घोड़े दिमाग, दौड़े सरपट,
चेतना पहुंचे चरम सीमा,
सोच पाये पार संसार के,
सवा तीन बजें जब रात के।

ध्यान लगा, तो परम पहर,
अशांत तो काली रात बने,
मृत जीवित हो अंतर धूमिल,
सवा तीन बजें जब रात के।।

Written by arpitgarg

August 21, 2014 at 3:43 am

Posted in Hindi, Poetry

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