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आजादी
न लेते इजाजत जीने की,
कर छाती चौड़ी सीने की,
अब सुकूं में पूरी आबादी,
है लहू बहा, ली आजादी।
अब मर्जी अपनी चलती है,
हवा मुफत में मिलती है,
खुल कर करते सब संवादी,
है लहू बहा, ली आजादी।
दादा नाना से पूछो तुम,
स्वाभिमान रहता था गुम,
पूर्णिमा भी लगती आधी,
है लहू बहा, ली आजादी।
काले गोरे का भेद मिटा,
बर्फ की सिल्ली, भगत लिटा,
देते प्रताड़ना अत्यादि,
है लहू बहा, ली आजादी।
रात पहर था सोने का,
अंत हुआ था खोने का,
हर ओर हुई थी उन्मादी,
है लहू बहा, ली आजादी।
दंगे फसाद भी खूब हुए,
आगजनी और धुएं धुएं,
जान माल की बर्बादी,
है लहू बहा, ली आजादी।
क्या महसूस हुआ उस पल,
गर पूछ सकूँ बलवानों से,
निकला सूरज, या थी आंधी,
है लहू बहा, ली आजादी।।
सारे जहाँ से अच्छा
सारे जहाँ से अच्छा, कहता था एक बच्चा,
हम बुलबुलें हैं इसकी, कहती थी दादी उसकी,
ग़ुरबत में हों अगर हम, विश्वास न हो बस कम,
रहता हो दिल वतन में, फक्र से न घुटन में|
परवत वो सब से ऊँचा, सबने लहू से सींचा,
गोदी में हज़ारों नदियाँ, हो गयी हैं जिनको सदियाँ,
ए आब-ए-रूद-ए-गंगा, दुबकी जो कर दे चंगा,
मज़हब नहीं सिखाता बैर, असल बात जाने दो खैर|
हिन्दी हैं हम वतन है, दुश्मन करें जतन हैं,
यूनान-ओ-मिस्र-ओ-रोमा, कुछ गए, कुछ को कोमा,
हस्ती मिटती नहीं हमारी, झूझने की है बीमारी,
हम तुझको क्यों सुनाएं, दर्द-ए-निहाँ हमारा|
PS: My tribute to Saare Jahan se Accha by Muhammad Iqbal
