ArpitGarg's Weblog

An opinion of the world around me

मन की सुन

with 2 comments

गम को लेकर दुनिया भर का,
खुद को क्यों ग़मगीन करूँ,
क्यों इंतज़ार दिन ढलने का,
मैं आँखें क्यों ना बंद करूं।

क्यों चौबेजी मैं बन बैठूँ,
जब छब्बे बनकर मस्त रहूं,
माथे पर क्यों पड़ने दूं बल,
जब खाऊं पियूं बलवान रहूँ।

सोच सोच के क्यों हारूं,
जब हरा हरा के सुचवाऊँ,
इज्जत पे मेरी बन आये,
इतना भी इज्जतदार नहीं।

आसां नहीं, इतना जीवन,
सुनते-सुनते जीवन बीता,
एक कसक रह गयी जीवन में,
क्यों बहिर ही मैं पैदा न हुआ?

हर पल रहना बोझ तले,
क्यों चाहूं मुझको ईश मिले,
बोझ तो गधा उठाता है,
औ पीता तो चीता भी है।

जटिल नहीं होता है कुछ,
जटिलता बस अनुभूति मात्र,
कैलाश ही सबको चढ़ना है,
कभी कुआं खोद के पानी पी।

जब लगे कि है शामत आयी,
क्षितिज ताक, जरा मुस्करा,
गुनगुना उठ मस्ती की धुन,
कान बंद, बस मन की सुन॥

Advertisements

Written by arpitgarg

July 19, 2013 at 11:22 am

Posted in Hindi, Poetry

Tagged with , , , ,

2 Responses

Subscribe to comments with RSS.

  1. shandaar aur romanchak panktiya, padh kar maza aa gaya.

    Pranay Tandon

    July 19, 2013 at 3:39 pm


Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: