ArpitGarg's Weblog

An opinion of the world around me

मेला वोट का

leave a comment »

देखो फिर से लगा है मेला,
तरह तरह के हैं नट-खेल,
कोई है पत्तों का जादूगर,
कोई सौदागर किस्मत का।

कोई दंगों के डर से डरा रहा,
कोई है घोटाले सुना रहा,
जात-पात की देता दुहाई,
कोई धर्म का हाथ भड़ा रहा।

एक करतबी मिला मुझे,
जो रस्सी पे चलता था,
इस ओर नहीं, उस ओर नहीं,
बीच रास्ते निकलता सा।

था एक मदारी वादों का,
बस वादों का, न इरादों का,
सब बंदर बनकर उछल रहे,
पैसे बटोर वो निकल लिया।

दाढ़ी वाला बाबा आया,
साथ अपने कुछ सपने लाया,
नयी तरक्की, दिशा नयी,
न हो बड़े व्यापारी की ढाल कहीं।

एक गोरा चिट्टा बच्चा आया,
बड़ा नाम और इतिहास लाया,
हर हाथ शक्ति की बात करी,
घोटालों का आरोप, न हुआ बरी।

हुंकार भरी एक बैरी ने,
कहता है मैं हूँ पाक साफ़,
जनता के मन में संशय है,
किस करवट ऊँठ ये बैठेगा।

सब हैं मेले की मस्ती में,
हर चीज़ बिके है सस्ती में,
जिसे भी मिले बंपर इनाम,
कर के देगा वो कुछ काम?

Written by arpitgarg

March 21, 2014 at 4:13 pm

Posted in General/Society, Hindi, Poetry

Tagged with , , , , ,

Leave a comment