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मुठ्ठी भर रेत

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छोटी कभी, लम्बी कभी,
है जिंदगी भी कुछ अजीब,
सुलझी कभी, उलझी कभी,
कितनी दूर, कितनी करीब।

बदला मौसम, बादल छाए,
मझधार में नैया, गोते खाए,
पानी अँखियाँ, काली रतियाँ,
सब कुछ खोये, कुछ न पाये।

धड़कता दिल, चढ़ती सांस,
पीता पानी, लगती पर प्यास,
ऊपर से खुश, अंदर उदास,
चलती-फिरती जिन्दा लाश।

कैसी सी है दास्तां ये मेरी,
जाने क्यों हुई आने में देरी,
कहता रहता दिन औ रात,
बिखरे सपने, उजड़े जज्बात।

इस सपने का मोह न जाता है,
गम रह रह कर के आता है,
एक टीस सी अंदर उठती है,
खुद पर ही तरस आ जाता है।

अपने संग सबको दुखी किया,
हवा चली, बुझ गया दिया,
मुठ्ठी में जो दम ना था,
क्यों रेत समाने तू चला॥

Written by arpitgarg

July 29, 2014 at 8:11 pm

Posted in Hindi, Poetry

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