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Sketch – Gloom

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Written by arpitgarg

August 4, 2020 at 8:01 am

Posted in Art

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Happy Happy Self

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Happy_catI was feeling it of late, but good that someone pointed it out. There is a kind of negative vibe I have been giving. A bit can be attributed to the novelty wearing off the school experience. But a lot can be attributed to not being intentional. Intentional, a funny but important word.

It’s very important to be clear in outlook in what you want to do. In personal life or career wise. Have something to drive you on. Since I folded up my startup, there was a sort of void that engulfed me. I spend time studying for GMAT, writing B-school essay’s, CFA, FRM etc. But all those were short term. Having finally arrived to school, I never planned what to do next.

I let myself be driven by what others were doing and let myself be herded in. As time went by, it became increasingly hard for me to admit it. And it feels nice to admit it and break the shackles. Feels fresh.

Have finally sat down and started to plan how I want to spend my next 1.5 years at school. Whatever it might be, I have promised myself it will be intentional and something that makes me happy happy.

Written by arpitgarg

January 24, 2018 at 5:01 am

Posted in Personal

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अंत करो

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love1

मैं तो आखिर एक पंछी था,
जिसके पर थे कुतर चुके,
पिंजरे को घर था मन किया,
आह की चाह की टीस जिया,
पर तू ओ जालिम आयी क्यों,
अपने संग आस ये लायी क्यों,
अब पशोपेश में उलझा मैं,
कोई आये इसको सुलझा दे,
तब तक बैठा मैं तड़प रहा,
या शुरू या इसका अंत करो|

Written by arpitgarg

January 23, 2018 at 2:32 am

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सीने की चुभन

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heart

कुछ उसने कहा औ चुप मैं रहा,
औ चुप मैं रहा, पर उसने सुना,
दिल की धड़कन, आह साँसों की,
माथे की शिकन, सीने की चुभन।

प्यार को उसके ठुकरा कर के,
अँखियन उसकी नम मैंने करी,
सोचा था कि सही राह है यह,
जाने फिर क्यूँ दिल यह तरसे।

बाहों में मेरे ऐसे लिपट गयी,
न आज रात तुझे जाने दूँगी,
अब तो जीवन की विरह है,
कुछ पल हैं बचे, दिल रोता ये।

कितना मजबूर महसूस करूँ,
जैसे हाथ काटे जालिम ने किसी,
औ पैरों को बेड़ियां जकड़ी हैं,
जैसे सजी चिता की लकड़ी हैं।

बस लिपट-२ के तू रोती रही,
मैं बेबस सा यह सब देख रहा,
एक बड़े अंतर्द्वंद से हूँ रहा जूझ,
खतम हुई मेरी सब सूझ बूझ।

वो पल हसीन कैसे भूलूँ मैं,
जो काटे जुल्फों के साये में तेरे,
मदहोश करती जो महक तेरी,
उसका आलम है आज तलक।

मेरा अंतर्मन ये कहता मुझसे,
यह जीवन जो न तेरे नाम किया,
वह पल जो न जियूँगा साथ तेरे,
अगले सब जनम तुझे मैंने दिए।।

Written by arpitgarg

November 16, 2015 at 4:09 pm

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सच है

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दिल में उठा है दर्द सा कुछ,
रह रह कर के आता है,
सह सह कर के जीता हूँ,
हाँ ये सच है, मैं पीता हूँ।

भुन्नैटा सा यह जीवन क्यों,
सपने धरे सब, ज्यों के त्यों,
ख्वाइश तोड़-२ के सीता हूँ,
हाँ ये सच है, मैं पीता हूँ।

चहुँओर मेरे है हलचल सी,
पगला सा हूँ मैं देख रहा,
लो हाथ रख गीता पे कहूँ,
हाँ ये सच है, मैं पीता हूँ।

आँखें भर आती जब-तब,
मेरे हाथ भी कापें जाते हैं,
बोझ ये कब तक मैं सहूँ,
हाँ ये सच है, मैं पीता हूँ।

अपना जिसको माना था,
दिल था जिसके नाम किया,
समेटता मैं वही फजीता हूँ,
हाँ ये सच है, मैं पीता हूँ।

सब फुर्ती फुर्र हुई मेरी,
चाहते हैं भागूं खूब तेज,
इंसान हूँ, न मैं चीता हूँ,
हाँ ये सच है, मैं पीता हूँ।

वाद-विवाद न करना अब,
ठान लिया बस ठान लिया,
उलझन सारी अब सुलझा दूँ,
हाँ ये सच है, मैं पीता हूँ।।

Written by arpitgarg

February 25, 2015 at 3:57 am

Posted in Hindi, Poetry

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अगले जनम

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झटक हाथ तेरा चल दिया,
अकेला तुझे छोड़ कर,
जीता हूँ अब इसी भरम,
अगले जनम हो पूरी कसम।

गलती नहीं की मैंने कोई,
शायद ईश्वर की थी मर्जी,
इस जीवन रहा अधूरा करम,
अगले जनम हो पूरी कसम।

समय से न कोई जीत सका,
मैं भी ठहरा बस हाड मांस,
न बदले सच, कर-२ परिश्रम,
अगले जनम हो पूरी कसम।

बेगाना तुझे बनाकर रोता हूँ,
दिन रात आंसू पी पीकर,
तुझे अपना कहा बिना शरम,
अगले जनम हो पूरी कसम।

कुछ ज्यादा ही मजबूर हूँ मैं,
अपने फंदों में फंसा हुआ,
जो मैंने किया वो मेरा धरम,
अगले जनम हो पूरी कसम।

रात ढली कुछ काली ये,
आगे कुछ न दिख रहा अभी,
कठिन डगर, न पड़ तू नरम,
अगले जनम हो पूरी कसम।

बस दुआ यही मैं करता हूँ,
खुशहाल रहे तेरा जीवन,
रह गयी अधूरी जो इस जनम,
अगले जनम हो पूरी कसम।।

Written by arpitgarg

September 8, 2014 at 1:31 am

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इतना हक़ भी नहीं?

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रूठा जो मुझसे उस दिन,
कहीं वो मेरा रब तो नहीं,
पुछा था तूने जिस दिन,
अब मेरा इतना हक़ भी नहीं?

तक़दीर ने कैसी चाल चली,
मुड़ बैठा, जाना न जिस गली,
धड़का दिल, इसमें तो शक नहीं,
अब मेरा इतना हक़ भी नहीं?

कसूर न इसमें दोनों का,
खेल नहीं था खिलौनों का,
पत्तों की इमारत, ऐसी ढही,
अब मेरा इतना हक़ भी नहीं?

खुश हो तू, इतनी दुआ करूँ,
तेरे अश्रु झरे, बहुतेरा डरूँ,
कुछ देर की अब ये बात रही,
अब मेरा इतना हक़ भी नहीं?

वादे न थे कुछ हमने किये,
फिर भी क्यों ऐसी उठे तीस ,
जैसे लहू लाल हो जाए बही,
अब मेरा इतना हक़ भी नहीं?

समय का पहिया सीधा चलता,
साँझ पहर ही सूरज ढलता,
उल्टा चल दे, ये आस रही,
अब मेरा इतना हक़ भी नहीं?

हूँ खुशियों में तेरी शामिल,
गम को मैं तुझसे गलत करूँ,
खोजूं ईश्वर, होगा तो कहीं,
अब मेरा इतना हक़ भी नहीं?

Written by arpitgarg

September 2, 2014 at 9:41 pm

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दिल

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कितना कुछ पाया तूने,
सब कुछ क्यों अब खोता है,
सुख ही सुख है मुख पर,
पर दिल जाने क्यों रोता है।

बातों ही बातों में जब,
रातें सब कट जाती हैं,
दिन खर्राटे भर सोता है,
पर दिल जाने क्यों रोता है।

चिंताएं हुई सब खाख खाख,
अंतर्मन भी अब पाक पाक,
अमृत की खेप को जोता है,
पर दिल जाने क्यों रोता है।

खिला चाँद, छन छन रोशन,
हर कोना कोना होता है,
चांदनी में भीगा मन तेरा,
पर दिल जाने क्यों रोता है।

मादक मदहोशी छायी है,
यौवन मद-मस्ती आई है,
रूहानी शाम का न्योता है,
पर दिल जाने क्यों रोता है।

सुन्दर स्वच्छ निर्मल शीतल,
जैसे प्रयाग में लिया गोता है,
धुले पाप सब, मुक्त हुआ अब,
पर दिल जाने क्यों रोता है।

कोई बात है जो टीस रही,
जाने अनजाने कुछ तो हुआ,
समझ कुछ नहीं आता है,
औ दिल बस रोता जाता है।।

Written by arpitgarg

August 25, 2014 at 4:36 am

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मुठ्ठी भर रेत

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छोटी कभी, लम्बी कभी,
है जिंदगी भी कुछ अजीब,
सुलझी कभी, उलझी कभी,
कितनी दूर, कितनी करीब।

बदला मौसम, बादल छाए,
मझधार में नैया, गोते खाए,
पानी अँखियाँ, काली रतियाँ,
सब कुछ खोये, कुछ न पाये।

धड़कता दिल, चढ़ती सांस,
पीता पानी, लगती पर प्यास,
ऊपर से खुश, अंदर उदास,
चलती-फिरती जिन्दा लाश।

कैसी सी है दास्तां ये मेरी,
जाने क्यों हुई आने में देरी,
कहता रहता दिन औ रात,
बिखरे सपने, उजड़े जज्बात।

इस सपने का मोह न जाता है,
गम रह रह कर के आता है,
एक टीस सी अंदर उठती है,
खुद पर ही तरस आ जाता है।

अपने संग सबको दुखी किया,
हवा चली, बुझ गया दिया,
मुठ्ठी में जो दम ना था,
क्यों रेत समाने तू चला॥

Written by arpitgarg

July 29, 2014 at 8:11 pm

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Happily Ever After!

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One upon a time there lived a princess in a place which looked just like heaven. She used to be always sad. World and even God has been mean to her. She used to roam around the lanes of that place of all luxury; still nothing was enough to make her cheer.

One day, a Prince came into her life. He was handsome and charming. But she kept pushing him away, wary of what may happen. The more she pushed him away, the more he was pulled towards her. He kept on persisting, till heavens broke loose. Finally the Princess relented but still there was a hitch.

Her coldness drove him mad. One fine day Prince decided to go to a land far-far away. Far enough from the warmth of her breath; far enough from the comfort of her touch; far enough from the pain of her disinterest. No sooner the Prince left, than the Princess felt weak. She realized that though she has been sad before, it was the first time she really cried. That night, she dreamt of the Prince. She slept peacefully for the first time in years.

She wanted to meet the Prince badly. She ran all the way to the land far-far away. She ran through the rivers, up the hills, braved the rough weathers and treacherous jungles. She finally met him once again. She cried and cried and cried, till oceans felt shy. He held her into his arms. She felt alive again. He too gave a silent tear.

And they lived happily ever after!

happilyEverAfter

Image Courtesy: http://www.thomasvan.com/

Written by arpitgarg

December 26, 2013 at 8:59 pm

Posted in Literary, Love

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