ArpitGarg's Weblog

An opinion of the world around me

दिल

leave a comment »

कितना कुछ पाया तूने,
सब कुछ क्यों अब खोता है,
सुख ही सुख है मुख पर,
पर दिल जाने क्यों रोता है।

बातों ही बातों में जब,
रातें सब कट जाती हैं,
दिन खर्राटे भर सोता है,
पर दिल जाने क्यों रोता है।

चिंताएं हुई सब खाख खाख,
अंतर्मन भी अब पाक पाक,
अमृत की खेप को जोता है,
पर दिल जाने क्यों रोता है।

खिला चाँद, छन छन रोशन,
हर कोना कोना होता है,
चांदनी में भीगा मन तेरा,
पर दिल जाने क्यों रोता है।

मादक मदहोशी छायी है,
यौवन मद-मस्ती आई है,
रूहानी शाम का न्योता है,
पर दिल जाने क्यों रोता है।

सुन्दर स्वच्छ निर्मल शीतल,
जैसे प्रयाग में लिया गोता है,
धुले पाप सब, मुक्त हुआ अब,
पर दिल जाने क्यों रोता है।

कोई बात है जो टीस रही,
जाने अनजाने कुछ तो हुआ,
समझ कुछ नहीं आता है,
औ दिल बस रोता जाता है।।

Written by arpitgarg

August 25, 2014 at 4:36 am

Posted in Hindi, Poetry

Tagged with , , , ,

Leave a comment