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दिल

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कितना कुछ पाया तूने,
सब कुछ क्यों अब खोता है,
सुख ही सुख है मुख पर,
पर दिल जाने क्यों रोता है।

बातों ही बातों में जब,
रातें सब कट जाती हैं,
दिन खर्राटे भर सोता है,
पर दिल जाने क्यों रोता है।

चिंताएं हुई सब खाख खाख,
अंतर्मन भी अब पाक पाक,
अमृत की खेप को जोता है,
पर दिल जाने क्यों रोता है।

खिला चाँद, छन छन रोशन,
हर कोना कोना होता है,
चांदनी में भीगा मन तेरा,
पर दिल जाने क्यों रोता है।

मादक मदहोशी छायी है,
यौवन मद-मस्ती आई है,
रूहानी शाम का न्योता है,
पर दिल जाने क्यों रोता है।

सुन्दर स्वच्छ निर्मल शीतल,
जैसे प्रयाग में लिया गोता है,
धुले पाप सब, मुक्त हुआ अब,
पर दिल जाने क्यों रोता है।

कोई बात है जो टीस रही,
जाने अनजाने कुछ तो हुआ,
समझ कुछ नहीं आता है,
औ दिल बस रोता जाता है।।

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Written by arpitgarg

August 25, 2014 at 4:36 am

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बेक़सूर दिल

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कभी इधर, कभी उधर,
भटकातीं है मन मेरा,
सब गलतियां करती हैं हूर,
दिल का मेरे क्या कसूर।

खुद ने दिया इतना प्यार,
बाँट बाँट के थका हूँ मैं,
पर ख़त्म नहीं होता सुरूर,
दिल का मेरे क्या कसूर।

दुनिया ने किया बदनाम मुझे,
तितलियाँ पकड़ता तो बचपन से था,
ठरकी थोड़ा मैं था ज़रूर,
दिल का मेरे क्या कसूर।

आँखों से खिची चली आयीं,
इशारों तक बात नहीं आयी,
पर कभी मैंने न किया गुरूर,
दिल का मेरे क्या कसूर।

चाह नहीं, ठहराव नहीं,
रुका नहीं मैं किसके लिए,
अपनी धुन में रहता मगरूर,
दिल का मेरे क्या कसूर।

मैखाने के पैमाने से,
कुछ कसर नहीं रखी बाकी,
आखिर कुछ तो बहकेगा,
इसमें दिल का मेरे क्या है कसूर।।

Written by arpitgarg

November 29, 2013 at 9:22 pm

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बे-बस

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थका हारा चढ़ा मैं बस में,
बगल में आकर बैठ गयी वो,
नींद उसकी आँखों में झलकी,
मेरा कन्धा कब बना सिरहाना,
न वो समझी, न मैंने जाना,
उसको उठाने को मन न माना,
मेरा स्टॉप जाने कब निकला,
एक मक्खी परेशां करने लगी,
अखबार से पंखा करता रहा,
टिकट आखिर की ले दी उसकी,
टीटी कहीं उठा न दे उसको,
बस की यात्रा में जिंदगी सजा ली,
सोते में उसके चेहरे पर हँसी,
दिल ले गयी हमारा, कन्धा भी,
जैसे जैसे आखिर स्टॉप आने लगा,
हमारे दिल में टीस सी उठने लगी,
सोचा उठाऊँ उसको, पूछूं नाम,
पर कुछ कर न पाया,
आखिर बस रुक गयी,
आवाज लगी, सब उतरो,
वो उठ गयी, कुछ अनजान,
कंधे से उठी, शर्मिंदा सी,
हम कुछ कहने को हुए,
जो ख्वाब बुने थे बयां करूँ,
वो बाल सही करने लगी,
दुपट्टा भी ठीक किया उसने,
गला ठक रहा था अबतक,
तभी कुछ दिखा हमें,
फलक में शब्द रुक गए,
सारे अरमां खाख हुए,
छुपा हुआ था पल्लू में जो,
हमें दिखा उसका मंगलसूत्र।

Written by arpitgarg

March 9, 2013 at 11:00 pm

Posted in Hindi, Poetry

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पता चल न पाता कभी

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दिल का धड़कना होता है क्या,
सांसें आखिर कैसे चढ़ जाती है,
नींद रातों की कैसे जाती है गुम,
तू न मिलती, पता चल न पाता कभी|

लटों की उलझन में फसना है क्या,
डूबकर आँखों में तैरते कैसे हैं,
मार खाने में आता है कैसा मज़ा,
तू न मिलती, पता चल न पाता कभी|

रात दिन, एक कैसे जाते हैं हो,
भूख लगती है, खा क्यों न पाते हैं हम,
एक चेहरे में पहर कैसे कट जाते हैं,
तू न मिलती, पता चल न पाता कभी|

रिश्ते नाते सब गैर लगते हैं क्यों,
क्यों बेगाना ज़माना ये हो जाता है,
प्यार भी सबका लानत क्यों लगने लगा,
तू न मिलती, पता चल न पाता कभी|

सर्द रातों की गर्मी में तपना है क्या,
चंद बातों में दुनिया का बसना है क्या,
चाँद तारे तोड़कर कैसे लाते हैं सब,
तू न मिलती, पता चल न पाता कभी|

इजहार-ऐ मोहब्बत होती है क्या.
कैसे दर्द-ऐ-जुदाई तड़पा जाती है,
प्यार का रंग खूनी लगता है क्यों,
तू न मिलती, पता चल न पाता कभी||

miao

Written by arpitgarg

March 19, 2012 at 10:29 pm

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ऐसा नहीं है

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ऐसा नहीं था कि मुझे कुछ गम था,
पर जीवन में लगता कुछ कम था|
पत्र तो था पर मंजिल थी लापता,
अगले मोड़ पे टकराइगी, क्या था पता||

ऐसा नहीं था कि मैं कोई विश्वामित्र था,
पर तपस्या थी हकीकत, न चल-चित्र था|
इन्द्र की बारिश, ये दिल सह न सका,
जब तन मन तपाने बनी तू मेनका|

ऐसा नहीं था कि कभी मस्ती नहीं थी,
पर अपनी कोई अलग हस्ती नहीं थी|
दौड़ा गयी तू सिरहन, मिली नयी राह,
कट रहा था जीवन, आई नयी चाह|

ऐसा नहीं था कि कोई पगला था मैं,
हाँ समझदारी में थोडा कंगला था मैं|
‘हड़बड़ी कबतक, आदतें सुधारो’, तूने ज्ञान दिया,
ज्यादा नहीं गर थोड़ा तो समझदार किया|

ऐसा नहीं था कि दिल ये पत्थर था,
पर धड़कने को नहीं ये तत्पर था|
मौत के जैसे आई औ जिंदगी दे गयी,
दिल को धड़का, मेरी सांसें ले गयी|

ऐसा नहीं है तू मुझे भाती नहीं,
या सुबह शाम तेरी याद आती नहीं|
सहे हैं दुःख तूने, और दे नहीं सकता,
असमंजस है मेरा, वक़्त ले नहीं सकता|

Written by arpitgarg

August 20, 2011 at 2:45 am

कौन है तू

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रात को आग़ोश में लेने दो,
सुबह को ख्वाब ही रहने दो,
ऐ यार तेरे खुमार में हूँ,
मुझे इस प्यार में डूबा रहने दो|
 
भूख प्यास कोई ना लगती,
सुनता था तो हँसता था में,
पर भूख मरी, जब प्यास मरी जब,
हर पल आहें भरता था में|
 
आँख बचाकर, आँख मिलाना,
अहसासों पर काबू पाना,
सुनने में  ही लगता है,
पर होता नहीं है आसां ये|
 
नींद गयी है, चैन गया है,
तारों की गिनती करता हूँ,
सुबह को कैसे उठ जाऊं में,
रात को सोता कौन सा हूँ|
 
वो पल्लू जो पहिये में अटक गया,
मेरा मन भी उसमें लिपटा  था,
तूने जो फाड़ के फैंका था,
पत्र नहीं वो, दिल था मेरा|
 
माना, किस्मत मेरी खोत्ती है,
पर ज्यादा गुलामी ना होती है,
हाँ कर देगी तो मेरी है,
ना कर दे जो, मर्ज़ी तेरी|
 जीवन का पहिया चलता है,
आगे को, बस आगे को|
 
हसीन सा ख्व़ाब, तू आयी थी,
पर नींद तो टूट ही जाती है,
ओर दिल भी जुड़ ही जाता है,
होगा, किस्मत को जो है मंज़ूर,
कौन हूँ में, कौन है तू ||

Written by arpitgarg

May 11, 2011 at 7:41 pm

पहला प्यार

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क्या हुआ है दिल को आज,
इसने बजाया है वही पुराना साज,
जब हमने पहली बार किसी को था दिल दिया,
पर हाय री बेवफ़ा, उसने हमें शायर बना दिया|
 
प्रेम के प्रकाश से हमारी आँखें थीं चुंधियाई,
इसी जूनून ने हमारी आखरी सांसें थीं निकलवाईं,
उसकी हिरनी जैसी चाल पर थे हम मिटे हुए,
उसकी कातिल मुस्कान पर थे हम फ़िदा हुए|

सुबह-शाम उसके घर के चक्कर हम लगा रहे थे,
लग रहा था उसको भी हम कुछ-कुछ भा रहे थे,
भूख को हमारी उसकी जालिम अदाओं ने था मार डाला,
हमारी नींद का तो उसने जनाजा ही था निकला|

न दिन को चैन, न रातों को आराम,
हमारी जिंदगी तो उसने कर दी थी हराम,
बॉस से झिक झिक, घरवालों की उलाहना,
उसकी मोहब्बत में हम थे हद से गुजर जाना,

आखिर हमने कर ही डाला प्रेम का इजहार,
बदले में उसकी लानतों का मिला हमको हार,
उसकी शादी पहले ही तय हो चुकी थी किसीसे,
हमारा दिल न हो सका संतुष्ट बस इसीसे|

उसेक गम में जाम उठाया, बन गए देवदास,
जीवन जीने की हमारी खो गयी थी आस,
हम तो बस रह गए थे सबके लिए उपहास|

फिर हम झूमे नाचे, किया खूब डांस,
एक परी को दिल दिया, शुरू हुआ रोमांस,
उमंग वापस आई हैं, जिंदगी लाया हूँ मैं बुला,
पर पहले प्यार की याद को क्या मैं सकूंगा भुला?

Written by arpitgarg

January 5, 2011 at 5:28 pm

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