ArpitGarg's Weblog

An opinion of the world around me

अंत करो

leave a comment »

love1

मैं तो आखिर एक पंछी था,
जिसके पर थे कुतर चुके,
पिंजरे को घर था मन किया,
आह की चाह की टीस जिया,
पर तू ओ जालिम आयी क्यों,
अपने संग आस ये लायी क्यों,
अब पशोपेश में उलझा मैं,
कोई आये इसको सुलझा दे,
तब तक बैठा मैं तड़प रहा,
या शुरू या इसका अंत करो|

Written by arpitgarg

January 23, 2018 at 2:32 am

Posted in Hindi, Love, Poetry, Uncategorized

Tagged with , , ,

Leave a comment