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कश्मीर त्रासदी: माँ के आंसू

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न देखा कभी सैलाब ऐसा,
क्या ऐसी भूल मुझसे हुई,
चहुंओर नीर तांडव पसरा,
लगा रात रोई है माँ मेरी।

प्रकृति कहर था सुना बहुत,
दिखा तो मेरी रूह काँपी,
जल-थल आपस में समा गए,
लगा रात रोई है माँ मेरी।

धन-धान सबकुछ तबाह हुआ,
मुह मोड़ तूने न सुनी दुआ,
हिम्मत भी मेरी डगा गयी,
लगा रात रोई है माँ मेरी।

बन्दूक से दुश्मन करता वार,
सह जाता वो भी एक बार,
पन-हमले से ऐसा लाचार,
लगा रात रोई है माँ मेरी।

हूँ दाने-दाने को मोहताज,
अपनों से भी मैं बिछड़ गया,
है नदी जहाँ था भरा बाजार,
लगा रात रोई है माँ मेरी।

मानव, जंतु सब बहे निढाल,
मेरा घर क्यों तूने छीन लिया,
अमृत ही है विष बन बैठा ,
लगा रात रोई है माँ मेरी।

डर लगता मुझको सन्नाटा,
दुआ आज मैं बस यही करूँ,
हिम्मत मुझको देना दाता,
माँ के आंसू मैं पौंछ सकूँ।।

Written by arpitgarg

September 14, 2014 at 4:23 am