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सोचा न था

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चहकता है मन, गाता है दिल,
सुबह से शाम, कटती नहीं अब,
ख्वाब देखना भी भाने लगा है,
ऐसा होगा कभी, सोचा न था|

सुबह उठना अच्छा लगने लगा,
काम करना सच्चा लगने लगा,
समझदारी भी आने लगी है अभी,
ऐसा होगा कभी, सोचा न था|

ठण्ड छूने से जिसको लगी थी कभी,
तपन उसके ही आने से होने लगी,
सर्द रातें भी पल में कटती हैं अब,
ऐसा होगा कभी, सोचा न था|

चंद लम्हों में सो जाया करता था जो,
कितने पहर आँखों-आँखों में कटने लगे,
दर्द भी होता है न ताकीद अब,
ऐसा होगा कभी, सोचा न था|

अपनी बातों से फुर्सत नहीं थी जिसे,
बातें करना ही वो भूल बैठा है अब,
दर्द-ए-तन्हाई समझ में आने लगी,
ऐसा होगा कभी, सोचा न था|

जो होना था हो ही गया है तुझे,
राख पे रोने से कुछ पायेगा नहीं,
तमन्ना सरफरोशी की जग है गयी,
ऐसा होगा कभी, सोचा न था||

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Written by arpitgarg

October 11, 2011 at 8:07 pm

Posted in Hindi, Love, Poetry

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