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अध्याय

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गूँज उठी आवाज मेरी,

पसरा सन्नाटा था,

खाली मकान हुआ वो,

घर था मेरा जो कभी।

 

एक एक कर चुना था सब,

एक पल में सब छूट गया,

मुहँ से शब्द न निकले,

गले तक आकर थम गए।

 

वो बस ठहराव न था,

जीवन का था एक अध्याय,

सुहानी यादें, खुशनुमा पल,

आज था जो, बन गया कल।

 

कुछ और भी था जो छोड़ा था,

दूर अपने से उसको किया,

जीवन इतना कठिन होगा,

सोचा न था मैंने कभी।

 

थोड़े दिन की बात है ये,

फिर से कमल खिल जाएगा,

राहें मंजिल को पहुंचेंगी,

मौसम जब रंग बदल लेगा।

 

बस तब तक न भूलना होगा,

लक्ष्य पर रखनी होगी नज़र,

जिस कारण से विरह चुनी हमनें,

उसको सार्थक करना होगा।।

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Written by arpitgarg

December 3, 2012 at 4:26 pm

Posted in Poetry

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जीवन: कठिन या आसान

with one comment

कभी ऐसा महसूस हुआ है की हम अकेले नहीं है| कोई है हमारे आस पास जो हमें देख सकता है, हमें महसूस कर सकता है| कभी ऐसा नहीं लगता कि जो हमारे साथ हो रहा है वह पहले भी हो चुका है| ऐसा नहीं लगता की हमारी जिंदगी हमारी होते हुए भी हमारी नहीं| अपनी किस्मत पर हमारा कुछ अधिकार नहीं| हम अपनी मर्ज़ी से पैदा भी नहीं हो सकते| हाँ मर ज़रूर अपनी मर्ज़ी से सकते हैं, जब चाहें तब| मतलब यह हुआ की हम अपने लिए अपनी मर्ज़ी से कुछ अच्छा नहीं कर सकते| हाँ बुरा ज़रूर कर सकते हैं, जब चाहें तब|

जब भी में आइना देखता हूँ, मुझे उसके अन्दर एक दूसरी दुनिया दिखाई देती है| मैं ख़ुद को कैद पाता हूँ| पता नहीं उस दुनिया का कैदी हूँ या इस दुनिया का| वह दुनिया असली है या यह दुनिया| मैं अपना अक्स देख रहा होता हूँ या में ख़ुद किसी और का अक्स हूँ|

जब कभी रात को में डरावना सपना देखता हूँ और अचानक नींद खुल जाती है, तब भी मुझे डर क्यों लगता रहता है| अरे वह तो सपना मात्र था, डर कैसा| पर नहीं, मुझे डर लगा रहता है, जब तक कि दोबारा नींद नहीं आ जाती| तो वह डर किसका था, डरावने सपने का या डरावना सपना टूट जाने का| कहीं हमारी जिंदगी दोहरी तो नहीं| हम सपना देख रहे होते हैं या हम ख़ुद किसी और का सपना हैं|

रात को अकेले आसमान की तरफ़ देखा है कभी| मिलाईं हैं कभी आसमान की आंखों में आँखें| टिमटिमाते तारों को देखकर सोचा है कभी, की उनमे से किसी तारे के इर्द गिर्द भी कोई दुनिया होगी| जब हम तारे को देख रहे होते हैं, तब क्या पता उस तारे के किसी ग्रह से हमारा ही अक्स हमें देख रहा हो| वह भी हमारी तरह आसमान को घूर रहा हो|

कौन है वह जो ना होते हुए भी है, क्या वह ही आत्मा है| या वह जीवित है और हम एक आत्मा हैं| आख़िर क्या है सच| क्या आईने में हमारा अक्स हमसे कुछ कह चाह रहा है या वह दूसरे ग्रह वाला शायद या फिर हमारा सपना, हमें कुछ बताना चाहता हो|

जिंदगी कितनी आसान हो जाती है ना, अगर इन सब बातों के बारे में सोचो ही मत| अगर है भी कोई अकेले में, तो अब तक क्यों नहीं आया सामने| अगर अब तक नहीं आया है, तो अब क्या आएगा| आईने में कोई भी दुनिया हो, अगर वह हमें डराती है, तो तोड़ दो ऐसे आईने| मत चिंता करो, दूसरा ग्रह हमसे बहुत दूर है| कोई वहां से चिल्लाएगा भी, तब भी सुनाई नहीं देगा|

उन चीज़ों के बारे में सोचना ही क्या, जिसके बारे में हम कुछ कर ही नहीं सकते| जिंदगी को बेकार में ही, और कठिन क्यों बनाएं|

Written by arpitgarg

December 4, 2008 at 11:37 am

Posted in Hindi, Prose

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