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सारे जहाँ से अच्छा
सारे जहाँ से अच्छा, कहता था एक बच्चा,
हम बुलबुलें हैं इसकी, कहती थी दादी उसकी,
ग़ुरबत में हों अगर हम, विश्वास न हो बस कम,
रहता हो दिल वतन में, फक्र से न घुटन में|
परवत वो सब से ऊँचा, सबने लहू से सींचा,
गोदी में हज़ारों नदियाँ, हो गयी हैं जिनको सदियाँ,
ए आब-ए-रूद-ए-गंगा, दुबकी जो कर दे चंगा,
मज़हब नहीं सिखाता बैर, असल बात जाने दो खैर|
हिन्दी हैं हम वतन है, दुश्मन करें जतन हैं,
यूनान-ओ-मिस्र-ओ-रोमा, कुछ गए, कुछ को कोमा,
हस्ती मिटती नहीं हमारी, झूझने की है बीमारी,
हम तुझको क्यों सुनाएं, दर्द-ए-निहाँ हमारा|
PS: My tribute to Saare Jahan se Accha by Muhammad Iqbal
देश मेरे देश मेरे
आजादी की सौंधी खुशबू,
जब नथुनों में भर आती है,
सर उठाकर जीने की,
तब आदत सी हो जाती है|
संघर्ष किया था जब सबने,
वो साल पुराना लगता है,
खून बहाया था जिसने,
वो भाई बेगाना लगता है|
बापू की तस्वीर पर,
बस फूल चड़ाए जाते हैं,
१०% कमीशन पर,
सब काम कराये जाते हैं|
आजादी बोले कुछ, तू सुन,
६३ साल की हो गयी हूँ में,
अब मुझमें वैसी बात नहीं,
मेरे बूढ़े कन्धों में अब,
पहले जैसी जान नहीं|
मेरे बच्चों अब तुम पर है,
की देश का आगे क्या कुछ हो,
अपने सपने तुम खुद देखो,
तुम खुद ही उन्हें साकार करो|
हे माँ तू ऐसा क्यों बोले,
तूने तो बहुत कुछ है दिया,
हिम्मत, सोच और इज्जत का,
जीवन में हमारे प्रकाश किया|
महनत करेंगे सब मिलकर,
देश को आगे ले जायेंगे,
ज़रुरत पड़ी तो फिर एक बार,
हम अपना लहू बहाएंगे|
देश मेरे देश मेरे,
तू ही मेरा तीर्थ है,
तू ही मेरे चारों धाम,
मैं जी लूँगा फिर और कभी,
इस बार करी जां तेरे नाम|
