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जल उठी धरती फिर

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जल उठी धरती फिर धू धू करके,
फिर हुआ स्तम्भ विस्तंभ आज,
छाती चौड़ी, अब जीता डरके,
गम में मुस्कराना, गहरा राज|

कुछ घना, कुछ गहरा, एक साया,
चहचहा उठे पंची सारे, सांझ भई,
धड़कन बढ़ी, सकुचा, दिल घबराया,
पुराने सब काल हुए, दुर्घटना नई|

कितने हँसे, कितने रोये, क्या गिनती,
मुखौटे से दिखे सब, मूक मय अवाक,
ग्रसित हैं, मुक्त करो, बस यही विनती,
कुछ न बचा, साथ गयी झूठी साख|

एक बटन दबा, एक घनघोर ध्वनी,
चिथड़े उड़े, हर ओर गिरे, सब शांत,
चीख भी उसकी, न निकली, न सुनी,
रो उठे सागर, हिंद से लेकर प्रशांत|

लाचार लगे अब, कुछ न कर पाऊँ,
शीश महल, अब नहीं बचा, चूर-चूर,
घर कब्जाया, खतरा, अब कहाँ जाऊं,
पास था साहिल, लगे अब दूर-दूर|

शैतान था वो, कुकृत्य किया जिसने,
बेबाक जिंदगी, न कभी जिए डरके,
सरफ़रोश हुआ, तृप्त-अमृत पिया उसने
जल उठी धरती जब धू धू करके|

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Written by arpitgarg

July 15, 2011 at 9:17 pm

एक सताती बात

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एक सताती बात,
कि होता क्यूं है तांडव,
बने सब कौरव पांडव,
बीच बाज़ार के आगे,
न कोई पर्दा ढाके,
न कोई अपने क्यूं है,
न आते सपने क्यूँ हैं,
रात दिन, दिन रात|

एक सताती बात,
कि क्यूं कोई भूखा सोता,
क्यूं कोई बच्चा रोता,
अनाज है धरती देती,
मुफत, ना पैसे लेती,
क्यूं फिर सबको न मिलती,
फ़कत दो वक़्त की रोटी,
रात दिन, दिन रात|

एक सताती बात,
कि क्यूं कोई इतना लोभी,
ना आती लाज जराभी,
जब है कोई बहू जलाता,
चंद रुपयों की खातिर,
बने कोई इतना शातिर,
कि बस पैसा ललचाये,
रात दिन, दिन रात|

एक सताती बात,
बुढ़िया की किस्मत कैसी,
कि उसकी आँखें तरसी,
पर उसका पूत ना पूछे,
उसे तो बोझ लगे अब,
जब निकले सब मतलब,
कहाँ पे हुई थी गलती,
यही ईश्वर से पूछे,
रात दिन, दिन रात|

एक सताती बात,
कि देखो खाखी-खादी,
करें देश बर्बादी,
औ हम सब चुप कर देखें,
बेबस धृतराष्ट्र के जैसे,
वतन का हरते चीर,
अरे अब जाग भी जा तू,
तुझे धरती है पुकारे,
रात दिन, दिन रात|

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