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बदिरा

with 3 comments

केशव के काले कुंज से,
कहा था किशन की कुटीर से,
कब तक करोगे कोप कल्लोल,
काले केश से काले मेघों ने,
कबसे कहीं न काज किया,
कुपित हुए वे कलयुग के कर्मा के कर्मों से,
किसने क्या कर दिया,
कबसे कोख ने फल ना दिया,
काहे का ये कोप भवन,
काहे की ये कठिनाई,
कबसे कह रहे हैं कब आओगे,
काले केशों से कुछ कोमल बरसाओगे,
कोनों तक में कालिख छाई,
ज्ञान का कमरक पियो कृपाई,
कभी कुछ कुबेर के कानों में,
कूकेगी कोयल कूँ कूँ,
कुछ तो कवलित हो कठिनाई,
कह कुछ मत कर्म कर भाई|

Written by arpitgarg

February 15, 2010 at 1:43 pm

3 Responses

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  1. I am overdosed by your poem.

    pankaj's avatar

    pankaj

    February 16, 2010 at 10:35 am

  2. Now on I won’t read Hindi poems.

    pankaj's avatar

    pankaj

    February 16, 2010 at 8:45 am


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