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सात दिन बरसात के

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भीगी भागी रात थी वो,
घूंघट डाले साथ थी वो,
भूल नहीं मैं क्यूँ पाता,
वो सात दिन बरसात के|
 
असल नहीं वो सूद था बस,
जो मुझे लगा था रब जैसा,
वापस कर दो मुझको अब,
वो सात दिन बरसात के|
 
मुझको होती थी सिरहन सी,
उसकी आँखों की नश्तर से,
खो गए हैं जाने कहाँ गए,
वो सात दिन बरसात के|
 
बारिश की बूंदों का पड़ना,
बिना बात के भी तेरा लड़ना,
छप-छप करती चप्पल जब,
वो सात दिन बरसात के|
 
एक सौंधी सी मट्टी खुशबू,
ठण्ड लगी, सो लगी अलग,
गर्मी करती उसकी सांसें,
वो सात दिन बरसात के|
 
वो बात ना जाने क्या होती,
जो रात जहन में आती थी,
खुस-फुस करती फ़ोन पे तू
वो सात दिन बरसात के|
 
खुशियाँ आयीं बेहिसाब,
गम सारे मेरे हवा हुए,
फिर आयेंगे जल्दी से कब,
वो सात दिन बरसात के||

Written by arpitgarg

September 16, 2011 at 11:01 pm

Posted in Hindi, Love, Poetry

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अंगुलियाँ तेरी

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गुनगुनाती हैं नए तराने,
अहसासों का सैलाब लिए,
कुछ न कहकर सब कह जाती,
तेरी यह जालिम अंगुलियाँ|
 
कमल की कोमल पंखुड़ियां,
छू देती हैं, सिरहन करके,
होने की मेरे करती पुष्टी,
तेरी यह मादक अंगुलियाँ|
 
हाथों में लेकर पुच्के/गुजिया,
ओठों तक तेरे जो पहुंचाती,
कभी आह भरी, कभी चाह भरी,
तेरी यह पूरक अंगुलियाँ|
 
शोभा हीरे की तुझसे है,
जो अंगूठी बनके बैठा है,
हीरे की चमक को चमकाती,
तेरी यह यौवन अंगुलियाँ|
 
जाते में मुझको पकड़ा था,
बाहों में भींच के जकड़ा था,
बालों, कपडों को खींच रही,
तेरी यह गुमसुम अंगुलियाँ|
 
दिन था बुरा, परेशां था में,
सर पर मेरे वो शीतल स्पर्श,
हाथ लगाकर दर्द किया फुर्र,
थकान मिटाती यह अंगुलियाँ|
 
लाल की लाली में डूबीं कभी,
कभी हरियाई हरे की छाई है,
नाखूनों पर छितरे सतरंग से,
इन्द्रधनुष सी तेरी यह अंगुलियाँ|
 
वो बारिश में तले पकोड़े थे,
गरम गरम औ सुरख सुरख,
उनपर एक छाप सी छोड़ गयीं,
तेरी यह पाँचों अंगुलियाँ|
 
साथ साथ थे पकडे हाथ,
तुझे अपना बनाया मैंने था,
पहना के अंगूठी प्रेम की,
मेरी हो गयीं, तेरी अंगुलियाँ||

Written by arpitgarg

June 16, 2011 at 2:43 pm

Shootout in the Rain

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First full-fledged down pour of the season and Mumbai was left reeling. My weekend plans stood canceled as they involved a bit of travelling. I decided to cool my heels at home instead.

Late afternoon, a news came trickling in about shootout of a veteran journalist. Given the violent times we live in, I would not have given the story, a second hearing. But few keywords caught my attention. Apparently the shootout took place near to my house; on the road that I take daily. Another of such tragedies that I have come up close. The last being when an air hostess leaped off the building I lived in.

These incidents do leave a sad feeling. However as cold as it may sound, they don’t affect us anymore as far as personal security is concerned. I didn’t leave the building after the said suicide. I will take the same road tomorrow. It becomes just news. And then the calls, “Heard a shootout happened where you live. Were you there? Did you see anything?” and other such queries.

In another hour or so I had almost forgotten what had happened. I was just waiting for the rains to subside to get on with the evening. But they never did. I decided to go for a stroll to the park nearby. No sooner had I stepped out of my building did I see dozens of media satellite vans lined up. I wondered why. Then I remembered the shootout. My building is adjacent to the police station and whole media was there to cover the story.

I abandoned the idea of the walk and came back to the apartment. It was time for my evening snacks.

नींद शर्मा गयी

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आखें उसके दीदार के नशे में डूबीं थी ऐसे,
की नींद भी शर्मा के रह गयी रात भर,
लफ्ज़ मिले नहीं बहुत सोच कर,
जब मिले तो जबाँ दगा दे गयी,
हाथ घायल थे उसके भर स्पर्श से,
कलम उठाई तो सियाही सूखी निकली,
बहुत हिम्मत कर उस दिन स्टेशन पहुंचे हम,
जालिम ट्रेन को भी उसी दिन समय पर आना था,
निगाहों ने बस उसको ढूँढा सारी तरफ,
जब दिखी तभी बारिश आ गयी,
मिलना था उससे जब, ख्वाबों में,
कातिल एक बार फिर नींद दगा दे गयी|

Written by arpitgarg

August 28, 2010 at 3:18 am

बदिरा

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केशव के काले कुंज से,
कहा था किशन की कुटीर से,
कब तक करोगे कोप कल्लोल,
काले केश से काले मेघों ने,
कबसे कहीं न काज किया,
कुपित हुए वे कलयुग के कर्मा के कर्मों से,
किसने क्या कर दिया,
कबसे कोख ने फल ना दिया,
काहे का ये कोप भवन,
काहे की ये कठिनाई,
कबसे कह रहे हैं कब आओगे,
काले केशों से कुछ कोमल बरसाओगे,
कोनों तक में कालिख छाई,
ज्ञान का कमरक पियो कृपाई,
कभी कुछ कुबेर के कानों में,
कूकेगी कोयल कूँ कूँ,
कुछ तो कवलित हो कठिनाई,
कह कुछ मत कर्म कर भाई|

Written by arpitgarg

February 15, 2010 at 1:43 pm

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