ArpitGarg's Weblog

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पता चल न पाता कभी

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दिल का धड़कना होता है क्या,
सांसें आखिर कैसे चढ़ जाती है,
नींद रातों की कैसे जाती है गुम,
तू न मिलती, पता चल न पाता कभी|

लटों की उलझन में फसना है क्या,
डूबकर आँखों में तैरते कैसे हैं,
मार खाने में आता है कैसा मज़ा,
तू न मिलती, पता चल न पाता कभी|

रात दिन, एक कैसे जाते हैं हो,
भूख लगती है, खा क्यों न पाते हैं हम,
एक चेहरे में पहर कैसे कट जाते हैं,
तू न मिलती, पता चल न पाता कभी|

रिश्ते नाते सब गैर लगते हैं क्यों,
क्यों बेगाना ज़माना ये हो जाता है,
प्यार भी सबका लानत क्यों लगने लगा,
तू न मिलती, पता चल न पाता कभी|

सर्द रातों की गर्मी में तपना है क्या,
चंद बातों में दुनिया का बसना है क्या,
चाँद तारे तोड़कर कैसे लाते हैं सब,
तू न मिलती, पता चल न पाता कभी|

इजहार-ऐ मोहब्बत होती है क्या.
कैसे दर्द-ऐ-जुदाई तड़पा जाती है,
प्यार का रंग खूनी लगता है क्यों,
तू न मिलती, पता चल न पाता कभी||

miao

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Written by arpitgarg

March 19, 2012 at 10:29 pm

Posted in Hindi, Love, Poetry

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