ArpitGarg's Weblog

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Septuagenarian

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Fag end of life introspection,
Look back at years went by,
A crisscross and dissection,
Septuagenatian does with a sigh!

Loved by all, apple of eye,
Childhood was a sweet dream,
Chocolates, candies, apple pie,
Only I had to make a scream.

Teenage rebellion and growth,
Fancy the girls, hormones high,
Decide career, thing to loathe,
Lots of studies, those times dry.

Next decade was crucial,
Found earning source to live by,
Entered into life bond marital,
Some or other things, I did try.

Kids filled the time next,
Social bonds spread along,
Nothing I was left bereft,
Name and fame came along.

Hard to rein the kids rebel,
More spouse time, silent talks,
Health issues crop, I dwell,
Start of medicines, long walks.

Last decennio took it slow,
More of calm and less of high,
Next gen out of mould grow,
Septuagenarian turned am I.

Written by arpitgarg

August 25, 2014 at 5:41 pm

इस शाम की सुबह नहीं

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जाने कितने बसंत भये,
कितने जुग पहले बे थे गए,
अब तो अश्रु भी सूख गए,
सुहाने दिन भी अलोप हुए।

मेरे यौवन का रस था पीया,
रब ने दोनों को एक किया,
एक रात का था वो मस्त मिलन,
बिछड़े आज मोसे मोरे सजन।

फ़ौज से संदेसा आया था,
धरती माता ने बुलाया था,
गोरी को बचन दे कि लौटूंगा कल,
सुख चैन ले गया वो हर पल।

माटी के लिए उसने प्राण दिए,
अपने ही आंसू सांवरी ने पिये,
एक घोर अँधेरी रात हुई,
सूरज को जैसे ग्रहण लगा।

हर आहट पर, हर चौखट पर,
बस एक सवाल ही पूछे वो,
कि कौनसी गलती मोसे भई,
जो बिरह में मैं तड़प रही।

एकटकी लगाये चौखट पर देख रही उस पार,
कि आ जाएँ शायद मोरे सरकार,
छोड़ दे आस ओ पगली,
इस शाम की कोई सुबह नहीं।

अरे उधर यह क्या था हुआ,
यह किसको गरम कढ़ाई में डुबोकर के मार दिया,
कौन थी वो जिसके मुहं में,
एक चावल के दाने ने,
विष का सा था उत्पात किया।

हाय रे जन्म दाता,
क्यों तू ये नहीं समझ पाता,
कि देवी का रूप था वो जिसका,
अभी तूने संहार किया।

माँ के गर्भ से पूछे कन्या,
कि क्या मैं जन्म ले पाऊँगी,
गर जन्म भी मुझको दे दिया,
क्या मैं जीवित रह पाऊँगी,
गर जीवित जो मैं रह गयी,
अपने हक़ को क्या पा पाऊँगी।

इन मर्म स्पर्शी सवालों का,
मेरे पास कोई जवाब नहीं,
पर कोई तो हो कि जिसको,
इनके उत्तर मालूम सही।

क्या कन्या होना पाप है,
या यह कोई अभिशाप है,
अरे यही तो जननी है,
यह जीवन देने वाली है,
इसी के रूप में सीता है,
इसी के रूप में काली है।

ओ नीचे करम करने वालों,
मानवता को डसने वालों,
क्या कभी तुमने यह सोचा है,
जिस माँ ने तुमको जन्म दिया,
उस माँ में भी तो सीता है।

वह माँ भी तो एक कन्या थी,
गर उसका जन्म नहीं होता,
तो तेरी क्या होती पहचान,
मत दिखा तू अपनी झूठी शान।

उत्तराधिकारी के लोभ में,
मत हो जा तू इतना अँधा,
छोड़ दे ये गोरखधंधा,
लेने दे मुझको भी सांस,
बस यही लगाये है वो आस,
आस छोड़ दे ओ नादान,
इस शाम की कोई सुबह नहीं।

कौन हैं वो बुड्ढे बुढ़िया,
जो चौखट पर ही बैठे हैं,
जिस तक़दीर पर था इनको गर्व,
उसी तक़दीर से चैंटे हैं।

कोई नहीं है इनके पास,
जिंदा हैं बस ले लेकर सांस,
बुढ़िया चूल्हा जलाती है,
बुड्ढा खांसे जाता है।

जिसे लाड प्यार से बड़ा किया,
जिसपर जीवन न्योछार दिया,
वो लाल ही अपना नहीं हुआ,
तो परायों की क्या बात करें।

शादी नहीं वो बर्बादी लगी,
जिस माँ से पहले कोई नहीं,
वो बीवी के बाद आने लगी।

माँ बाप का प्यार न रोक सका,
उसको खर्चे बढ़ते दिखने लगे,
बुड्ढे के पान अखरने लगे,
कलह के फल दिखे पके पके।

जिसकी लोरी में सोया था,
उस माँ की खांसी खटकती है,
जिसके कंधो पर बैठा था,
उसका बोझ आज भारी है।

जिसकी ऊँगली से चला था,
उसका ही हाथ झटक दिया,
टूट गया आज एक क्रम,
झुक गए सारे नैन.
न उसको आई कोई शर्म,
क्यों मिला ह्रदय को चैन।

जीवन में धुंध सी छायी है,
सूरज की किरण शरमाई है,
क्या यही वो प्यारा लाल था,
जिसके लिए कंगाल हुए।

पर फिर भी बूढा सोचे है,
कि नाती कभी तो आएगा,
बेटे-बहू को लाएगा,
जो बेटा अपना सबकुछ था,
वो आखिर कबतक रुलाएगा।

न सोचो तुम ज्यादा कंगालों,
सो जाओ आंसू पी पीकर,
इस शाम की कोई सुबह नहीं।

कहीं दूर कोई और दिखा,
कमल खिला पर मसला हुआ,
कोमल कोमल सी पंखुड़ियाँ,
मुरझाई औ सकुचाई हुई।

४ साल की नन्ही उमर में,
उसका था विवाह हुआ,
१२ साल ही हुई न वो,
कि उसका संसार ही उजड़ गया।

समझ ना आया उसको कि,
रंगीन चूड़ी के समय में,
सफ़ेद कफ़न सी साडी दे,
क्यों उसको दुनिया से दूर किया।

सास ससुर के तानों को,
अपनी छाती पर सहती है,
अपनी किस्मत पे विचार कर,
वो रो रो कर यह कहती है।

कि जीवन में हँसी कब आएगी,
कब फिर हँस गा वो पाएगी,
क्या समाज उसको सजने देगा,
क्या उसको भी कोई और मिलेगा।

जो उसके जीवन को रंग देगा,
अपने ही प्रेम के रंगों में,
क्या वो सखियों संग,
मस्ती के रस पी पाएगी,
या ऐसे ही रोते रोते यह,
जिंदगी पूरी गुजर जायेगी।

सूर्य सी वो दमकती थी,
कोमल काया उसकी चमकती थी,
पर आज अंधकार ने लील लिया,
शनि ने उसकी खुशियां को पिया।

कभी मंदिर में घंटा बजा,
पूछे क्यों तूने दी है सजा,
फिर भी एक आस लगाये हुए,
सपनों को है सजाये हुए।

मत सपने सजा इतने बावरी,
इस शाम की कोई सुबह नहीं।

Written by arpitgarg

January 15, 2008 at 11:46 am

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