ArpitGarg's Weblog

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Some Vintage Days

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Some vintage days, gone are they
Some vintage memories, left
Ups and Downs, gave they to us,
Heavy and Light talks abuzz
Those lengthy evenings, graphs and charts
Those bickering, arguments tarts
Whatever you told, I often repulsed
But the words come back to me
You said it from your experience
I could not grasp much then
They hit me now, like wine of old
All said and done, memories built,
Will meet, paths will cross again,
Some vintage days, gone are they
Some vintage memories, left.

Written by arpitgarg

September 1, 2012 at 12:50 pm

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Things I love/hate about Anna Hazare

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  1. I hate that he makes me feel corrupt. He tries to wake up my conscience. He makes me uncomfortable. He irks me.
  2. I love that he does not contest elections and hold legislative posts. Scared if he becomes PM.
  3. I hate the fact that he brainwashes today’s youth into believing that corruption is a bad thing.
  4. I love when he goes on fast and his health deteriorates. Good Riddance.
  5. I hate that his crusade will take off food from plates of corrupt people like me.
  6. I love that people like him are not selected for constitutional posts in our country. Who would bear a lokayukta like him?
  7. I hate that my dream of owning a black money account in Swiss bank will remain a dream because of him.
  8. I love the fact that he is old.
  9. I hate that his legacy will continue forcing me to answer to laws of the land for corruption.


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I shook hands with and hugged a number of people today. I was in my hometown for holidays and fortunately it coincided with one of my schoolmates wedding. We being family friends were invited to the marriage.

Just a bit of background. I wasn’t all too social guy at school. Didn’t even know the names of many from my class. I can laugh at it today but I was a suck-up to the teachers and evidently not very popular among fellow students. It has been 7 long years since I passed out of school and haven’t had time to catch up with any of my mates barring a few close ones.

Normally I hesitate going up to someone, shaking hands and initiating a talk. The same reason why I don’t consider myself an MBA material. Anyways, today was a day to set things right. I entered the arena just as the Baraat was entering. A bunch of people were dancing. I recognized one of them to be an old pal. I shook hands and hugged. It was not exactly nostalgic but discovering. More so for a person like me, who never took a chance to socialize with people when had time.

Anyways, I met not less than two dozen old mates. Some married, some bachelors and others somewhere in between. I took the lead in going up to people with, “Saath mein padte the yaar, naam yaad nahin aa raha”. Not remembering was a lame excuse; I never really knew the names of many people in the first place. They were mere faces for me. But I was happy and guilt ridden at the same time when most of them replied, “Don’t worry we remember your name, Arpit”.

I stayed till late, chatting, relishing old times. Wish I could have chatted with you guys more. But it was a nice little start. Thank you all for remembering my name when I was so pathetic as to not remember your’s. And above all thanks to my friend whose marriage gave me a chance to meet old pals. Best wishes to him.


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This is one of my first poems. Wrote it long time back.
During the phase when students bear huge burden of expectations on their back.

Why the life is so heavy,
Like an encumbrance to levy.
Challenges pouring in every hour,
Like thorns of a rose flower.
Which smells good,
But stings like wood.
Pressure building on all sides.
Not a moment to lay beside.
Like a complicated preparation of glycene,
With everyone so keen,
To uncover the unseen.
I think how good it had been,
If worries were not known and I with my fairy queen,
Striding along the path of my life,
Free from all strife.
No feeling to outshine others,
But a mind to follow,
And sooth others like a pillow.
With feeling of communism,
Sounding everywhere like,

Written by arpitgarg

January 31, 2010 at 7:42 am

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फिर वो पुरानी याद आई

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क्यों रह रह कर आते सपने,
उन पीर परायी रातों के,
क्यों होती है दिल में हलचल,
उन नई पुरानी बातों से,
क्यों जहन में अटकी हैं यादें,
जब गलियों की कच्ची सड़कें,
सावन में पक्की लगती थीं,
जब टूटी सायिकल की गद्दी,
मोटर से मुलायम लगती थी,
जब आंच पे पकती रोटी भी,
जायके में अव्वल लगती थी,
क्या दौर था वो, कुछ और था वो,
सुख चैन का बस सिरमौर था जो,

वो समां पुराना चला गया,
कुछ और देर तक रहता फिर,
मिल बैठ के बातें करते हम,
कोई रीत पुरानी गाता में,
कुछ गम मिल जुलकर करते कम|

मैदान में वो गिरना पड़ना,
हर बात पे बालक हठ करना,
जो हवा बनाई डींगे हांक,
सब अव्वल बैटिंग देते थे,
जो आड़े आया कोई सो,
अपने सुदबुध में ऐंठे थे,
जो पेड़ सुनहरा गुलमोहरी,
दिनभर हरिया बरसाता था,
वोह बेल हवा में टूट टूट,
और नीम का मस्ती लहराना,
क्या दौर था वो, कुछ और था वो,
सुख चैन का बस सिरमौर था जो,

वो समां पुराना चला गया,
कुछ और देर तक रहता फिर,
मिल बैठ के बातें करते हम,
कोई रीत पुरानी गाता में,
कुछ गम मिल जुलकर करते कम|

शादी का मौसम सुनते ही,
मुहँ में पानी का आ जाना,
ख्वाब में भी खुरचन लड्डू की,
आपस में कुश्ती करवाना,
और कचौड़ी पूड़ी  से,
घी का टप टप रिसते जाना,
और नहीं, बस और नहीं,
एक और तो लो, तुम्हें मेरी कसम,
भाभी देवर का टकराना,
क्या दौर था वो, कुछ और था वो,
सुख चैन का बस सिरमौर था जो,

वो समां पुराना चला गया,
कुछ और देर तक रहता फिर,
मिल बैठ के बातें करते हम,
कोई रीत पुरानी गाता में,
कुछ गम मिल जुलकर करते कम|

बीमार था जब, सब याद है अब,
दादी ने नजर उतारी थी,
अलाएँ बालाएं सब टल जाएँ,
इस बात की दुआ पुकारी थी,
दीवाली में पूरे कुनबे का,
मिल जुलकर बाड़ा चमकाना,
कुछ दीपक से, कुछ बत्ती से,
सब ओर प्रकाश का टिम टाना,
सब बच्चों को नगदी मिलना,
बड़ों का आशीर्वाद कहलाता था,
एक सुई, एक धागे में,
सारा संसार पिर जाता था,
क्या दौर था वो, कुछ और था वो,
सुख चैन का बस सिरमौर था जो,

वो समां पुराना चला गया,
कुछ और देर तक रहता फिर,
मिल बैठ के बातें करते हम,
कोई रीत पुरानी गाता में,
कुछ गम मिल जुलकर करते कम|

हो गई पुरानी सब बातें,
यादें भी धुंधली हो हैं चली,
पर मन जाने क्यों अटका है,
कभी ना जाना, उसी गली,
कभी कभी एक आस जगे,
क्यों ना कल जब सो के उठें,
तो सुबह उन्हीं गलियों में हो,
रात उन्हीं अठखलियों से हो,
पर बीत चुका कब आया है,
बीते की याद ही आई है,
क्या दौर था वो, कुछ और था वो,
सुख चैन का बस सिरमौर था जो,

वो समां पुराना चला गया,
कुछ और देर तक रहता फिर,
मिल बैठ के बातें करते हम,
कोई रीत पुरानी गाता में,
कुछ गम मिल जुलकर करते कम|

Written by arpitgarg

February 20, 2009 at 7:57 am

भूली बिसरी यादें

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कहाँ-कहाँ से पकड़ से लाये,
कैसे करतब करवाने को|
बंद कर दिए एक पिंजरे मैं,
आपस मैं खोपड़ टकराने को|

तीन मोर और दो थी मोरनी,
नई-नई पहचान हुई|
पग-पग कर थी राह जोड़नी,
कच्चा था धागा टूटी थी सुई|

प्यार था उमड़ा जिन बातों पर,
वो बातें कड़वी याद हुईं|
एक हाथ से ताली नहीं बजती,
कहावत ये साकार हुई|

मोर-मोरनी लड़े औ झगडे,
अपनों का नाम खराब किया|
होते हैं जीवन में लाखों लफड़े,
पर हाय ये विष क्यों सबने पिया|

नजरें मिला पाओगे अब तुम,
दर्पण मैं अपने आप से क्या|
गिर कर भी उठ पाओगे क्या,
नजरों मैं अपने आप के तुम|

भगवान् इन्हें सदबुद्धि देना,
आगें करतब कुछ ऐसा करें|
सब देखें और गुणगान करें,
कि मोर-मोरनी हों तो ऐसे,
और सभी का ये सम्मान करें|

Written by arpitgarg

January 14, 2009 at 10:08 am

सायोनारा: अलविदा सैंट पीटर्स

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My farewell speech 12 Std, St. Peters College Agra, 2003.

कुछ बीती बातों का छोड़ रहा हूँ फव्वारा,
दिल कि डायरी का है यह सार सारा,
इस कविता में अपनी पहचान ख़ुद से है करारा यह बेचारा,
सुबह घंटी बजने के ५ मिनट बाद नियमपूर्वक क्लास में है आरा,
बिना पास के साइकिल स्टैंड वाले को दस रुपये का किया इशारा,
बिन पॉलिश के जूतों और लंबे बालों को लिए क्लास में है घुसा जारा,
डायरी न लाने पर एक दोस्त के कवर व बाकी से पन्ने लेकर असेम्बली में जाने की जुगाड़ है बिठारा,
एडवर्ड सर की नजरों से बचने के लिए गंदे जूते पैंट से है घिसे जारा,
छोटे कद का होकर भी असेम्बली की लाइन में सबसे पीछे है लगा जारा,
प्रयेर के टाइम पे गर्लफ्रैंड के किस्से है सुनारा,
नेशनल ऐनथम के दौरान अटेंशन में नहीं खड़ा हुआ जारा,
‘गुड मोर्निंग टीचर’ को के.एल. सहगल के गीत की तरह है सुनारा,
पहले ही पिरिएड में टिफिन का लिया चटकारा,
चुपके से दूसरे कि बोतल से पानी है पिया जारा,
लीव ऐप्लीकेशन न लाने पर जल्दी से मम्मी-पापा का साइन है किया जारा,
बिना सिलेबस कि किताबों के भी नोविल्स के बोझ से बैग है फटा जारा,
बोरिंग लेक्चर के बीच नींद में डूबा जारा और पकड़े जाने पर घिसा पिटा राग सुनारा,
मॉरल साइंस के पिरिएड में फादर के संग ठहाके है लगारा,
इंगलिश के पिरिएड में में मैथ का काम है किया जारा,
मैथ का पिरिएड आने पर सिस्टर ऑफिस भागा जारा,
एग्जाम से पहले बैठकर महनत से फर्रे है बनारा,
टीचर के सिर को एरोप्लेन की लैंडिंग प्लेस है बनारा,
चुन-चुन कर दूसरों पे रबड़ में फंसाकर बुलेट है बर्सारा,
पंखे, ट्यूबलाईट और, बल्ब को चॉक का निशाना है बनारा,
तबियत ख़राब होने का बहाना बनाकर घर को भगा जारा,
फ़ुटबाल मैच में सामने वाले को धक्का देकर गिरारा और ख़ुद गिरने पर बाहर मिलने का न्योता देकर आरा,
जूनियर साइड में नल की लाइन पर जाकर छोटे बच्चों को है हड़कारा,
इंटरवल की घंटी बजने पर खिड़की से है कूदा जारा,
कैंटीन में ५ रुपये में दो पैटी लेकर अपनी बुद्धि को है इतरारा,
औरों की बर्थडे की ट्रीट खाकर अपनी बर्थडे के दिन स्कूल में न दिया नज़ारा,
एब्सेंट होने पर रोज नया बहाना बनरा,
कैंटीन की भीड़ में अपनी शक्ति का पूरा जोर दिखारा,
दूसरे के बर्गर के चिथड़े कर फूले नहीं समारा,
दो दोस्तों के बीच डब्लू.डब्लू.एफ करवाकर मंद-मंद मुस्करारा,
क्लास से बंक मारकर पूरे स्कूल में गश्त है लगारा,
पीछे बैठकर दोस्तों से गप्पें है लडारा,
एग्जाम में आगे वाले को आन्सर बताने के लिए पटारा और न बताने पर उसे भूखे शेर कि तरह है घूरे जारा,
केमिस्ट्री लैब में नाइट्रिक एसिड से घर की टकसाल के सारे सिक्के है चमकारा,
विभिन्न रसायनों को मिला सतरंगी चित्र है बनारा,
५ टी.टी  और दो बीकर तोड़ने की गाथा गर्व से पूरी क्लास को है सुनारा,
फिजिक्स लैब में मरकरी कि गोलियाँ है बनरा,
वहाँ के इन्सटरूमंट्स तोड़कर, उनके पहले से टूटे होने कि ख़बर सच्चाई से टीचर को है सुनारा,
प्रोजक्ट टाइप करने के बहाने पूरा दिन कमप्यूटर लैब में ऐ.सी. के मजे है उड़ारा,
मक्खन लगाकर सब टीचर्स का बनना चाह रहा दुलारा और दूसरों के मक्खन लगाने को सहन नहीं कर पारा,
स्पोर्ट्स डे की शाम कॉरिडोर में बम्ब है छुड़ारा,
और भड़ाम की आवाज आने पर सीना फूलकर दुगना हुआ जारा,
एग्जाम टाइम में सब टीचर्स के पैर छूकर जारा,
सेकंड क्लास की सीड़ियों से  “ग्रेट वाल पार आफ चाइना” के उस पार है झाँका जारा,
स्कूल के अन्दर आने के रास्ते में बड़ा गेट आते ही स्पीड धीमी कर मुंडी है घुमारा,
कम्बाइंड स्कूल सैलिब्रैशन के लिए १५ अगस्त का इंतज़ार है किया जारा,
इन सब को याद कर बड़ी मुश्किल से हूँ में अश्रुधारा को रोक पारा,
सैंट पीटर्स के गलियारों में दिल मेरा हारा,
यहाँ है सब टीचर्स का स्नेह और फादर मैथ्यू का प्यार बहुत सारा,
यहाँ है मानवता का फव्वारा,
यह है मार्गदर्शक हमारा,
येह है प्यार का गुलिस्तां हमारा,
आज इन सब चीजों को कर रहा हूँ में सायोनारा
सायोनारा, सायोनारा, सायोनारा…
…अलविदा सैंट पीटर्स…

इस शाम की सुबह नहीं

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जाने कितने बसंत भये,
कितने जुग पहले बे थे गए,
अब तो अश्रु भी सूख गए,
सुहाने दिन भी अलोप हुए।

मेरे यौवन का रस था पीया,
रब ने दोनों को एक किया,
एक रात का था वो मस्त मिलन,
बिछड़े आज मोसे मोरे सजन।

फ़ौज से संदेसा आया था,
धरती माता ने बुलाया था,
गोरी को बचन दे कि लौटूंगा कल,
सुख चैन ले गया वो हर पल।

माटी के लिए उसने प्राण दिए,
अपने ही आंसू सांवरी ने पिये,
एक घोर अँधेरी रात हुई,
सूरज को जैसे ग्रहण लगा।

हर आहट पर, हर चौखट पर,
बस एक सवाल ही पूछे वो,
कि कौनसी गलती मोसे भई,
जो बिरह में मैं तड़प रही।

एकटकी लगाये चौखट पर देख रही उस पार,
कि आ जाएँ शायद मोरे सरकार,
छोड़ दे आस ओ पगली,
इस शाम की कोई सुबह नहीं।

अरे उधर यह क्या था हुआ,
यह किसको गरम कढ़ाई में डुबोकर के मार दिया,
कौन थी वो जिसके मुहं में,
एक चावल के दाने ने,
विष का सा था उत्पात किया।

हाय रे जन्म दाता,
क्यों तू ये नहीं समझ पाता,
कि देवी का रूप था वो जिसका,
अभी तूने संहार किया।

माँ के गर्भ से पूछे कन्या,
कि क्या मैं जन्म ले पाऊँगी,
गर जन्म भी मुझको दे दिया,
क्या मैं जीवित रह पाऊँगी,
गर जीवित जो मैं रह गयी,
अपने हक़ को क्या पा पाऊँगी।

इन मर्म स्पर्शी सवालों का,
मेरे पास कोई जवाब नहीं,
पर कोई तो हो कि जिसको,
इनके उत्तर मालूम सही।

क्या कन्या होना पाप है,
या यह कोई अभिशाप है,
अरे यही तो जननी है,
यह जीवन देने वाली है,
इसी के रूप में सीता है,
इसी के रूप में काली है।

ओ नीचे करम करने वालों,
मानवता को डसने वालों,
क्या कभी तुमने यह सोचा है,
जिस माँ ने तुमको जन्म दिया,
उस माँ में भी तो सीता है।

वह माँ भी तो एक कन्या थी,
गर उसका जन्म नहीं होता,
तो तेरी क्या होती पहचान,
मत दिखा तू अपनी झूठी शान।

उत्तराधिकारी के लोभ में,
मत हो जा तू इतना अँधा,
छोड़ दे ये गोरखधंधा,
लेने दे मुझको भी सांस,
बस यही लगाये है वो आस,
आस छोड़ दे ओ नादान,
इस शाम की कोई सुबह नहीं।

कौन हैं वो बुड्ढे बुढ़िया,
जो चौखट पर ही बैठे हैं,
जिस तक़दीर पर था इनको गर्व,
उसी तक़दीर से चैंटे हैं।

कोई नहीं है इनके पास,
जिंदा हैं बस ले लेकर सांस,
बुढ़िया चूल्हा जलाती है,
बुड्ढा खांसे जाता है।

जिसे लाड प्यार से बड़ा किया,
जिसपर जीवन न्योछार दिया,
वो लाल ही अपना नहीं हुआ,
तो परायों की क्या बात करें।

शादी नहीं वो बर्बादी लगी,
जिस माँ से पहले कोई नहीं,
वो बीवी के बाद आने लगी।

माँ बाप का प्यार न रोक सका,
उसको खर्चे बढ़ते दिखने लगे,
बुड्ढे के पान अखरने लगे,
कलह के फल दिखे पके पके।

जिसकी लोरी में सोया था,
उस माँ की खांसी खटकती है,
जिसके कंधो पर बैठा था,
उसका बोझ आज भारी है।

जिसकी ऊँगली से चला था,
उसका ही हाथ झटक दिया,
टूट गया आज एक क्रम,
झुक गए सारे नैन.
न उसको आई कोई शर्म,
क्यों मिला ह्रदय को चैन।

जीवन में धुंध सी छायी है,
सूरज की किरण शरमाई है,
क्या यही वो प्यारा लाल था,
जिसके लिए कंगाल हुए।

पर फिर भी बूढा सोचे है,
कि नाती कभी तो आएगा,
बेटे-बहू को लाएगा,
जो बेटा अपना सबकुछ था,
वो आखिर कबतक रुलाएगा।

न सोचो तुम ज्यादा कंगालों,
सो जाओ आंसू पी पीकर,
इस शाम की कोई सुबह नहीं।

कहीं दूर कोई और दिखा,
कमल खिला पर मसला हुआ,
कोमल कोमल सी पंखुड़ियाँ,
मुरझाई औ सकुचाई हुई।

४ साल की नन्ही उमर में,
उसका था विवाह हुआ,
१२ साल ही हुई न वो,
कि उसका संसार ही उजड़ गया।

समझ ना आया उसको कि,
रंगीन चूड़ी के समय में,
सफ़ेद कफ़न सी साडी दे,
क्यों उसको दुनिया से दूर किया।

सास ससुर के तानों को,
अपनी छाती पर सहती है,
अपनी किस्मत पे विचार कर,
वो रो रो कर यह कहती है।

कि जीवन में हँसी कब आएगी,
कब फिर हँस गा वो पाएगी,
क्या समाज उसको सजने देगा,
क्या उसको भी कोई और मिलेगा।

जो उसके जीवन को रंग देगा,
अपने ही प्रेम के रंगों में,
क्या वो सखियों संग,
मस्ती के रस पी पाएगी,
या ऐसे ही रोते रोते यह,
जिंदगी पूरी गुजर जायेगी।

सूर्य सी वो दमकती थी,
कोमल काया उसकी चमकती थी,
पर आज अंधकार ने लील लिया,
शनि ने उसकी खुशियां को पिया।

कभी मंदिर में घंटा बजा,
पूछे क्यों तूने दी है सजा,
फिर भी एक आस लगाये हुए,
सपनों को है सजाये हुए।

मत सपने सजा इतने बावरी,
इस शाम की कोई सुबह नहीं।

Written by arpitgarg

January 15, 2008 at 11:46 am

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