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नींद शर्मा गयी

with 2 comments

आखें उसके दीदार के नशे में डूबीं थी ऐसे,
की नींद भी शर्मा के रह गयी रात भर,
लफ्ज़ मिले नहीं बहुत सोच कर,
जब मिले तो जबाँ दगा दे गयी,
हाथ घायल थे उसके भर स्पर्श से,
कलम उठाई तो सियाही सूखी निकली,
बहुत हिम्मत कर उस दिन स्टेशन पहुंचे हम,
जालिम ट्रेन को भी उसी दिन समय पर आना था,
निगाहों ने बस उसको ढूँढा सारी तरफ,
जब दिखी तभी बारिश आ गयी,
मिलना था उससे जब, ख्वाबों में,
कातिल एक बार फिर नींद दगा दे गयी|

Written by arpitgarg

August 28, 2010 at 3:18 am

2 Responses

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  1. In short hum to aapke fan ho gaye hain ji 🙂

    subhanallah 🙂

    Sailesh Pandey's avatar

    Sailesh Pandey

    August 31, 2010 at 11:06 am


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