Archive for the ‘Poetry’ Category
इतना हक़ भी नहीं?
रूठा जो मुझसे उस दिन,
कहीं वो मेरा रब तो नहीं,
पुछा था तूने जिस दिन,
अब मेरा इतना हक़ भी नहीं?
तक़दीर ने कैसी चाल चली,
मुड़ बैठा, जाना न जिस गली,
धड़का दिल, इसमें तो शक नहीं,
अब मेरा इतना हक़ भी नहीं?
कसूर न इसमें दोनों का,
खेल नहीं था खिलौनों का,
पत्तों की इमारत, ऐसी ढही,
अब मेरा इतना हक़ भी नहीं?
खुश हो तू, इतनी दुआ करूँ,
तेरे अश्रु झरे, बहुतेरा डरूँ,
कुछ देर की अब ये बात रही,
अब मेरा इतना हक़ भी नहीं?
वादे न थे कुछ हमने किये,
फिर भी क्यों ऐसी उठे तीस ,
जैसे लहू लाल हो जाए बही,
अब मेरा इतना हक़ भी नहीं?
समय का पहिया सीधा चलता,
साँझ पहर ही सूरज ढलता,
उल्टा चल दे, ये आस रही,
अब मेरा इतना हक़ भी नहीं?
हूँ खुशियों में तेरी शामिल,
गम को मैं तुझसे गलत करूँ,
खोजूं ईश्वर, होगा तो कहीं,
अब मेरा इतना हक़ भी नहीं?
गुमसुम
शून्य को बैठा ताक रहा,
जाने क्यों बगलें झाँक रहा,
अपनी मस्ती में था झूमा,
रहने लगा तू क्यों गुमसुम।
हर ओर तरंगें बिखरी थी,
घनघोर घटाएं छितरी सी,
हंसने से सवेरा होता था,
रहने लगा तू क्यों गुमसुम।
चलने से थिरकन होती थी,
धू-२ के शिकन न होती थी,
हर वाद-विवाद में था अव्वल,
रहने लगा तू क्यों गुमसुम।
कुल दीपक तू कहलाया था,
माहौल हुआ गरमाया सा,
अग्नि तपिश थी लगती नम,
रहने लगा तू क्यों गुमसुम।
सर माथे तुझे लगाते सब,
मूरत न कोई, अपना तू रब,
तू कलाबाज, मस्ती करतब,
रहने लगा तू क्यों गुमसुम।
प्रश्न का हर, तू था उत्तर,
हर दांव रहा मीले पत्थर,
ध्वनि तेरी धरती कम्पन,
रहने लगा तू क्यों गुमसुम।
काजल से काली रात है यह,
डूबे सब, कहर बरसात ठहे,
कठिन पहर, न आये समझ,
रहने लगा तू क्यों गुमसुम।।
एक-दो दिन
वो ट्यूशन पढ़ने आती थी,
औ मन को मेरे भाती थी,
जरा जरा इठलाती थी,
कुछ ज्यादा ही इतराती थी।
मैं रहता था आगे बैठा,
वो पीछे बैठी हुई कहीं,
अपनी किस्मत से था चैंटा,
कि बात तो अबतक हुई नहीं।
घुंघराले बाल जो थे उसके,
कभी आँखों पे आ जाते थे,
कर दिए जाने कितने नुस्के,
शब्द हलक में ही रह जाते थे।
ऊब भरा एक दौर था वो,
दिमाग भी कुछ और था वो,
नंबर लाने में लगा रहा,
दिल से अपने ही दगा रहा।
हंसी कुछ उसकी वैसी थी,
कि तितली भी शर्मा जाए,
सुंदरता उसकी ऐसी थी,
नीरसता में बहार छाए।
कुर्ती उसकी जो रंग पीला,
मुझपे पक्का कुछ ऐसा चढ़ा,
आसमान फिर क्या नीला,
बुद्धि पे पत्थर जैसे पड़ा।
पहल नहीं पर मैंने करी,
कर्म में खुद को झौंक दिया,
चाहे फिर हो वो स्वप्न-परी,
दृढ़ प्रण कुछ ऐसा लिया।
पत्थर दिल पहुंचे कालेज ,
प्यार तो बस उससे ही था,
एक-दो दिन की देर थी बस,
किसी और पे जा अटका॥
बात चली
लब पे लगा के मैखाने को,
झूमा मैं हर गली गली,
रखनी मुझको छुपा के थी पर,
रात चली तो बात चली।
ताश के पत्ते हाथ में आकर,
नोट की गड्डी खुली खुली,
अड्डा किसीको पता न था पर,
रात चली तो बात चली।
सुट्टे के धुएं के छल्ले,
निकले जैसे हो नली नली,
घर पहुंचा खुशबू लगा के था पर,
रात चली तो बात चली।
नाच गान औ मनोरंजन,
तोते संग थिरकी थी तितली,
पैसे बटोर वो चली गयी पर,
रात चली तो बात चली।
रात की बात रात के संग,
कैसे कैसे थे मन मचली,
उड़ गया मैं जैसे कटी पतंग पर,
रात चली तो बात चली।
गुम हुआ था ऐसी मस्ती में,
तसवीरें थीं सब हिली हिली,
इधर उधर कर देता मैं पर,
रात चली तो बात चली।।
आजादी
न लेते इजाजत जीने की,
कर छाती चौड़ी सीने की,
अब सुकूं में पूरी आबादी,
है लहू बहा, ली आजादी।
अब मर्जी अपनी चलती है,
हवा मुफत में मिलती है,
खुल कर करते सब संवादी,
है लहू बहा, ली आजादी।
दादा नाना से पूछो तुम,
स्वाभिमान रहता था गुम,
पूर्णिमा भी लगती आधी,
है लहू बहा, ली आजादी।
काले गोरे का भेद मिटा,
बर्फ की सिल्ली, भगत लिटा,
देते प्रताड़ना अत्यादि,
है लहू बहा, ली आजादी।
रात पहर था सोने का,
अंत हुआ था खोने का,
हर ओर हुई थी उन्मादी,
है लहू बहा, ली आजादी।
दंगे फसाद भी खूब हुए,
आगजनी और धुएं धुएं,
जान माल की बर्बादी,
है लहू बहा, ली आजादी।
क्या महसूस हुआ उस पल,
गर पूछ सकूँ बलवानों से,
निकला सूरज, या थी आंधी,
है लहू बहा, ली आजादी।।
दिल
कितना कुछ पाया तूने,
सब कुछ क्यों अब खोता है,
सुख ही सुख है मुख पर,
पर दिल जाने क्यों रोता है।
बातों ही बातों में जब,
रातें सब कट जाती हैं,
दिन खर्राटे भर सोता है,
पर दिल जाने क्यों रोता है।
चिंताएं हुई सब खाख खाख,
अंतर्मन भी अब पाक पाक,
अमृत की खेप को जोता है,
पर दिल जाने क्यों रोता है।
खिला चाँद, छन छन रोशन,
हर कोना कोना होता है,
चांदनी में भीगा मन तेरा,
पर दिल जाने क्यों रोता है।
मादक मदहोशी छायी है,
यौवन मद-मस्ती आई है,
रूहानी शाम का न्योता है,
पर दिल जाने क्यों रोता है।
सुन्दर स्वच्छ निर्मल शीतल,
जैसे प्रयाग में लिया गोता है,
धुले पाप सब, मुक्त हुआ अब,
पर दिल जाने क्यों रोता है।
कोई बात है जो टीस रही,
जाने अनजाने कुछ तो हुआ,
समझ कुछ नहीं आता है,
औ दिल बस रोता जाता है।।
सवा तीन रात के
गुमनाम अँधेरा छाया है,
चाँद भी खिल न पाया है,
नीरस मन बिन बरसात के,
सवा तीन बजें जब रात के।
झींगुर मधुर ध्वनि चेते,
कुकुर भी जैसे गूँज गान,
रोग अनिद्रा मारे जोर,
सवा तीन बजें जब रात के।
कोई फुटपाथ पे है सोया,
कोई बिन आंसूं के है रोया,
सब मारे हैं हालत के,
सवा तीन बजें जब रात के।
पंखा सर सर कर चलता,
जैसे सन्नाटे को दबा रहा,
डर लगता हल्की आहट से ,
सवा तीन बजें जब रात के।
पानी पी-२ कर बहला मन,
उत्तर दक्षिण, दक्षिण उत्त्तर,
संजीदा बिन ज़ज्बात के,
सवा तीन बजें जब रात के।
घोड़े दिमाग, दौड़े सरपट,
चेतना पहुंचे चरम सीमा,
सोच पाये पार संसार के,
सवा तीन बजें जब रात के।
ध्यान लगा, तो परम पहर,
अशांत तो काली रात बने,
मृत जीवित हो अंतर धूमिल,
सवा तीन बजें जब रात के।।
मुठ्ठी भर रेत
छोटी कभी, लम्बी कभी,
है जिंदगी भी कुछ अजीब,
सुलझी कभी, उलझी कभी,
कितनी दूर, कितनी करीब।
बदला मौसम, बादल छाए,
मझधार में नैया, गोते खाए,
पानी अँखियाँ, काली रतियाँ,
सब कुछ खोये, कुछ न पाये।
धड़कता दिल, चढ़ती सांस,
पीता पानी, लगती पर प्यास,
ऊपर से खुश, अंदर उदास,
चलती-फिरती जिन्दा लाश।
कैसी सी है दास्तां ये मेरी,
जाने क्यों हुई आने में देरी,
कहता रहता दिन औ रात,
बिखरे सपने, उजड़े जज्बात।
इस सपने का मोह न जाता है,
गम रह रह कर के आता है,
एक टीस सी अंदर उठती है,
खुद पर ही तरस आ जाता है।
अपने संग सबको दुखी किया,
हवा चली, बुझ गया दिया,
मुठ्ठी में जो दम ना था,
क्यों रेत समाने तू चला॥
मेला वोट का
देखो फिर से लगा है मेला,
तरह तरह के हैं नट-खेल,
कोई है पत्तों का जादूगर,
कोई सौदागर किस्मत का।
कोई दंगों के डर से डरा रहा,
कोई है घोटाले सुना रहा,
जात-पात की देता दुहाई,
कोई धर्म का हाथ भड़ा रहा।
एक करतबी मिला मुझे,
जो रस्सी पे चलता था,
इस ओर नहीं, उस ओर नहीं,
बीच रास्ते निकलता सा।
था एक मदारी वादों का,
बस वादों का, न इरादों का,
सब बंदर बनकर उछल रहे,
पैसे बटोर वो निकल लिया।
दाढ़ी वाला बाबा आया,
साथ अपने कुछ सपने लाया,
नयी तरक्की, दिशा नयी,
न हो बड़े व्यापारी की ढाल कहीं।
एक गोरा चिट्टा बच्चा आया,
बड़ा नाम और इतिहास लाया,
हर हाथ शक्ति की बात करी,
घोटालों का आरोप, न हुआ बरी।
हुंकार भरी एक बैरी ने,
कहता है मैं हूँ पाक साफ़,
जनता के मन में संशय है,
किस करवट ऊँठ ये बैठेगा।
सब हैं मेले की मस्ती में,
हर चीज़ बिके है सस्ती में,
जिसे भी मिले बंपर इनाम,
कर के देगा वो कुछ काम?
सायें सायें
सोचा मैंने एक दिन ऐसा,
होता होगा नर्क भी कैसा,
जहाँ गर्म सर्द का भेद न हो,
चलती हो हवा बस सायें सायें।
चीख हलक से न निकले,
जहाँ लौह भी बन बर्फ पिघले,
हर ओर सन्नाटा पसरा हो,
कौआ भी चुप, न काएं काएं।
घनघोर तबाही मंजर हो,
बस खूनी भूतानी खंडर हो,
ढहते सपने, बहते अपने,
फिस्स होता महल, टाएं टाएं।
बस मार काट और सर्वनाश,
जलते से बदन, उड़ते चिथड़े,
गर कुछ समझायी आता है,
ढिशुम ढिशुम और धायें धायें।
सोने को नसीब न तल कोई,
खाने को फक्त कंकड़ हो,
पीने को मिले बस अपना लहू,
ज्वालामुखी में लावा से नहाएं।
जहाँ दर्द की कोई थाह न हो,
हो यातनाएं बस दिन औ रात,
नुचता हो बदन, रूह भी कापें,
जिन्दा शरीर गिद्ध खाएं जाएँ।
सोच के ही मैं सहम गया,
क्या ऐसा नर्क हो सकता है?
जहाँ गर्म सर्द का भेद न हो,
चलती हो हवा बस सायें सायें।।
