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भक् साला

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जब दिखी कोई सुन्दर कन्या,
मन मचला सा क्यों जाता है,
जैसे बिन चाबी का ताला,
दिल करे कि बोलूं भक् साला।

उस दिन तो यारों हद हो गयी,
घर का रास्ता ही भटक गया,
कोई वशी-इत्र उसने डाला,
दिल करे कि बोलूं भक् साला।

सब्जी लेने को गया था मैं,
वहां किलो-२ भर तोल रही,
धनिया भी मुफ्त में न डाला,
दिल करे कि बोलूं भक् साला।

सोचा चलो जांच मैं करवा लूँ,
आँखें हैं ठीक, बोली डॉक्टर,
पर चरित्र है तेरा कुछ काला,
दिल करे कि बोलूं भक् साला।

फूलों की टोकरी, रख सर पर,
बेच रही वो, लगा पुकार,
मेरे मन ने बना ली वरमाला,
दिल करे कि बोलूं भक् साला।

सोचा कई बार, त्याग दूँ सब,
आखिर कब तक करूंगा मैं,
मस्ती तफरी, और मधुशाला,
चल हट दिल नौटंकी साला।।

Written by arpitgarg

September 15, 2014 at 3:01 am

Posted in Funny, Hindi, Poetry

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वो रात

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बहुत दिनों चली आंखों-२ में बात,
आज हो गयी सच में मुलाक़ात,
बहाने मिले, न ढूँढने पड़े,
तभी थे आमने सामने खड़े।

वो आई कपड़े पहनकर गुलाबी,
उसके कजरारे नैन लग रहे शराबी,
बड़ी मासूमियत से मुखवाणी निकाली,
है उसकी जुल्फें या घटा काली-काली।

आज लग रही वो सम्पूर्ण नारी,
पांडू के बाद हाय मेरी मती हारी,
कामदेव का बाण चल ही गया,
सारा संसार लगने लगा नया।

होने लगी पुष्प की वर्षा,
बजने लगी प्रेम की त्रिवेणी,
इतने दिनों का इंतज़ार,
कर रहा था हमें जार-जार।

लगा था जैसे बीती हों सदियाँ,
बहने दो आज स्नेह की नदियाँ
बंधे सारे तार, झुके सारे नैन,
दिल को करार औ हृदय को चैन।

दो जिस्म एक हो ही गए,
दोनों के नयन भी एक हुए,
उसके गाल पर काला तिल,
बन ही गया हमारा दिल।।

Written by arpitgarg

September 10, 2014 at 5:38 pm

Posted in Hindi, Poetry

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Best Hindi News Anchor

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In this era of 24×7 media, the number of news channels is increasing day by day. Most look clones of each other though. For those who doubt, here are some names, India News, News India, India TV, News Nation, News 24 and News Express.

The fight is on for the prime-time with each channel lining up its own set of debate moderators. I claim to be one of the avid viewers of these debates. Even then if you ask me who the best Hindi debate anchor is, I will struggle.

Each one has his/her own style. There are likes of Gentle Shweta Singh Aajtak, Probing Neha Pant Abp News, On the money Saurav Sharma India TV, No nonsense Abhigyan Prakash NDTV, Luxuriously lazy Deepak Chaurasia India News among others.

But one Gentleman that stands out for me is Ravish Kumar NDTV. Hailing from the Hindi heartland, Mr. Kumar is one person who holds debates in the true sense. He eases the participants into such a comfort zone where there are no high pitch voices, no headaches. He passes such canny silent remarks which rattle even the toughest. He gives everyone so much time that the real nuances of the debate come to the fore.

He take no side, lose no temper and raise no voice; still is able to bring out the story. He laughs; he seems lazy; he jokes; he uses vintage proverbs and brings in a mystic touch. He proves that to make your voice heard, you need not be loud. He believes that all views need to be heard, however absurd they may be.

He speaks the least, still is able to steer the debate with his wit and wisdom. He shows that true value of a smile is not lost as yet.

Well done Mr. Ravish Kumar.

Written by arpitgarg

September 10, 2014 at 12:32 am

Posted in General/Society

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अगले जनम

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झटक हाथ तेरा चल दिया,
अकेला तुझे छोड़ कर,
जीता हूँ अब इसी भरम,
अगले जनम हो पूरी कसम।

गलती नहीं की मैंने कोई,
शायद ईश्वर की थी मर्जी,
इस जीवन रहा अधूरा करम,
अगले जनम हो पूरी कसम।

समय से न कोई जीत सका,
मैं भी ठहरा बस हाड मांस,
न बदले सच, कर-२ परिश्रम,
अगले जनम हो पूरी कसम।

बेगाना तुझे बनाकर रोता हूँ,
दिन रात आंसू पी पीकर,
तुझे अपना कहा बिना शरम,
अगले जनम हो पूरी कसम।

कुछ ज्यादा ही मजबूर हूँ मैं,
अपने फंदों में फंसा हुआ,
जो मैंने किया वो मेरा धरम,
अगले जनम हो पूरी कसम।

रात ढली कुछ काली ये,
आगे कुछ न दिख रहा अभी,
कठिन डगर, न पड़ तू नरम,
अगले जनम हो पूरी कसम।

बस दुआ यही मैं करता हूँ,
खुशहाल रहे तेरा जीवन,
रह गयी अधूरी जो इस जनम,
अगले जनम हो पूरी कसम।।

Written by arpitgarg

September 8, 2014 at 1:31 am

Posted in Hindi, Love, Poetry

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इतना हक़ भी नहीं?

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रूठा जो मुझसे उस दिन,
कहीं वो मेरा रब तो नहीं,
पुछा था तूने जिस दिन,
अब मेरा इतना हक़ भी नहीं?

तक़दीर ने कैसी चाल चली,
मुड़ बैठा, जाना न जिस गली,
धड़का दिल, इसमें तो शक नहीं,
अब मेरा इतना हक़ भी नहीं?

कसूर न इसमें दोनों का,
खेल नहीं था खिलौनों का,
पत्तों की इमारत, ऐसी ढही,
अब मेरा इतना हक़ भी नहीं?

खुश हो तू, इतनी दुआ करूँ,
तेरे अश्रु झरे, बहुतेरा डरूँ,
कुछ देर की अब ये बात रही,
अब मेरा इतना हक़ भी नहीं?

वादे न थे कुछ हमने किये,
फिर भी क्यों ऐसी उठे तीस ,
जैसे लहू लाल हो जाए बही,
अब मेरा इतना हक़ भी नहीं?

समय का पहिया सीधा चलता,
साँझ पहर ही सूरज ढलता,
उल्टा चल दे, ये आस रही,
अब मेरा इतना हक़ भी नहीं?

हूँ खुशियों में तेरी शामिल,
गम को मैं तुझसे गलत करूँ,
खोजूं ईश्वर, होगा तो कहीं,
अब मेरा इतना हक़ भी नहीं?

Written by arpitgarg

September 2, 2014 at 9:41 pm

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गुमसुम

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शून्य को बैठा ताक रहा,
जाने क्यों बगलें झाँक रहा,
अपनी मस्ती में था झूमा,
रहने लगा तू क्यों गुमसुम।

हर ओर तरंगें बिखरी थी,
घनघोर घटाएं छितरी सी,
हंसने से सवेरा होता था,
रहने लगा तू क्यों गुमसुम।

चलने से थिरकन होती थी,
धू-२ के शिकन न होती थी,
हर वाद-विवाद में था अव्वल,
रहने लगा तू क्यों गुमसुम।

कुल दीपक तू कहलाया था,
माहौल हुआ गरमाया सा,
अग्नि तपिश थी लगती नम,
रहने लगा तू क्यों गुमसुम।

सर माथे तुझे लगाते सब,
मूरत न कोई, अपना तू रब,
तू कलाबाज, मस्ती करतब,
रहने लगा तू क्यों गुमसुम।

प्रश्न का हर, तू था उत्तर,
हर दांव रहा मीले पत्थर,
ध्वनि तेरी धरती कम्पन,
रहने लगा तू क्यों गुमसुम।

काजल से काली रात है यह,
डूबे सब, कहर बरसात ठहे,
कठिन पहर, न आये समझ,
रहने लगा तू क्यों गुमसुम।।

Written by arpitgarg

September 2, 2014 at 2:05 am

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एक-दो दिन

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वो ट्यूशन पढ़ने आती थी,
औ मन को मेरे भाती थी,
जरा जरा इठलाती थी,
कुछ ज्यादा ही इतराती थी।

मैं रहता था आगे बैठा,
वो पीछे बैठी हुई कहीं,
अपनी किस्मत से था चैंटा,
कि बात तो अबतक हुई नहीं।

घुंघराले बाल जो थे उसके,
कभी आँखों पे आ जाते थे,
कर दिए जाने कितने नुस्के,
शब्द हलक में ही रह जाते थे।

ऊब भरा एक दौर था वो,
दिमाग भी कुछ और था वो,
नंबर लाने में लगा रहा,
दिल से अपने ही दगा रहा।

हंसी कुछ उसकी वैसी थी,
कि तितली भी शर्मा जाए,
सुंदरता उसकी ऐसी थी,
नीरसता में बहार छाए।

कुर्ती उसकी जो रंग पीला,
मुझपे पक्का कुछ ऐसा चढ़ा,
आसमान फिर क्या नीला,
बुद्धि पे पत्थर जैसे पड़ा।

पहल नहीं पर मैंने करी,
कर्म में खुद को झौंक दिया,
चाहे फिर हो वो स्वप्न-परी,
दृढ़ प्रण कुछ ऐसा लिया।

पत्थर दिल पहुंचे कालेज ,
प्यार तो बस उससे ही था,
एक-दो दिन की देर थी बस,
किसी और पे जा अटका॥

Written by arpitgarg

August 27, 2014 at 11:47 pm

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बात चली

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लब पे लगा के मैखाने को,
झूमा मैं हर गली गली,
रखनी मुझको छुपा के थी पर,
रात चली तो बात चली।

ताश के पत्ते हाथ में आकर,
नोट की गड्डी खुली खुली,
अड्डा किसीको पता न था पर,
रात चली तो बात चली।

सुट्टे के धुएं के छल्ले,
निकले जैसे हो नली नली,
घर पहुंचा खुशबू लगा के था पर,
रात चली तो बात चली।

नाच गान औ मनोरंजन,
तोते संग थिरकी थी तितली,
पैसे बटोर वो चली गयी पर,
रात चली तो बात चली।

रात की बात रात के संग,
कैसे कैसे थे मन मचली,
उड़ गया मैं जैसे कटी पतंग पर,
रात चली तो बात चली।

गुम हुआ था ऐसी मस्ती में,
तसवीरें थीं सब हिली हिली,
इधर उधर कर देता मैं पर,
रात चली तो बात चली।।

Written by arpitgarg

August 26, 2014 at 5:31 am

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आजादी

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न लेते इजाजत जीने की,
कर छाती चौड़ी सीने की,
अब सुकूं में पूरी आबादी,
है लहू बहा, ली आजादी।

अब मर्जी अपनी चलती है,
हवा मुफत में मिलती है,
खुल कर करते सब संवादी,
है लहू बहा, ली आजादी।

दादा नाना से पूछो तुम,
स्वाभिमान रहता था गुम,
पूर्णिमा भी लगती आधी,
है लहू बहा, ली आजादी।

काले गोरे का भेद मिटा,
बर्फ की सिल्ली, भगत लिटा,
देते प्रताड़ना अत्यादि,
है लहू बहा, ली आजादी।

रात पहर था सोने का,
अंत हुआ था खोने का,
हर ओर हुई थी उन्मादी,
है लहू बहा, ली आजादी।

दंगे फसाद भी खूब हुए,
आगजनी और धुएं धुएं,
जान माल की बर्बादी,
है लहू बहा, ली आजादी।

क्या महसूस हुआ उस पल,
गर पूछ सकूँ बलवानों से,
निकला सूरज, या थी आंधी,
है लहू बहा, ली आजादी।।

Written by arpitgarg

August 26, 2014 at 1:57 am

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दिल

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कितना कुछ पाया तूने,
सब कुछ क्यों अब खोता है,
सुख ही सुख है मुख पर,
पर दिल जाने क्यों रोता है।

बातों ही बातों में जब,
रातें सब कट जाती हैं,
दिन खर्राटे भर सोता है,
पर दिल जाने क्यों रोता है।

चिंताएं हुई सब खाख खाख,
अंतर्मन भी अब पाक पाक,
अमृत की खेप को जोता है,
पर दिल जाने क्यों रोता है।

खिला चाँद, छन छन रोशन,
हर कोना कोना होता है,
चांदनी में भीगा मन तेरा,
पर दिल जाने क्यों रोता है।

मादक मदहोशी छायी है,
यौवन मद-मस्ती आई है,
रूहानी शाम का न्योता है,
पर दिल जाने क्यों रोता है।

सुन्दर स्वच्छ निर्मल शीतल,
जैसे प्रयाग में लिया गोता है,
धुले पाप सब, मुक्त हुआ अब,
पर दिल जाने क्यों रोता है।

कोई बात है जो टीस रही,
जाने अनजाने कुछ तो हुआ,
समझ कुछ नहीं आता है,
औ दिल बस रोता जाता है।।

Written by arpitgarg

August 25, 2014 at 4:36 am

Posted in Hindi, Poetry

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