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ढाई किलो आलू और प्याज

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aloo_pyaaj

भूख लगी मुझे आधी रात को,
सोचा रसोई में रखा हो कुछ,
नहीं मिला कुछ, पड़ा था बस,
ढाई किलो आलू और प्याज।

नींद भी थी और भूख भी थी,
कुछ मिल जाए जल्दी से बस,
पेट की आग बुझाएं कैसे ये,
ढाई किलो आलू और प्याज।

कुकर चढ़ाने को हुआ जो मैं,
देखा कि थी सीटी नदारद,
खाना नहीं मिल पायेगा आज,
ढाई किलो आलू और प्याज।

छीलूं कैसे अब आलू को मैं,
चाकू कहीं जो मुझे न मिलता,
थक गए पेट के चूहे भी नाच,
ढाई किलो आलू और प्याज।

कच्ची प्याज ही खा जाऊं क्या?
ऊपर से पी पानी भर गिलास,
इस व्यंजन पर मुझे नहीं है नाज,
ढाई किलो आलू और प्याज।

बनाऊं दो प्याज़ा या आलू दम,
भूख नहीं दिख रही होती कम,
कुछ है गड़बड़, गहरा है राज,
ढाई किलो आलू और प्याज।

मुहँ में पानी, महक और स्वाद,
मेरे अंदर का भुक्कड़ मुखर,
सपने भी आते खाने के अब,
ढाई किलो आलू और प्याज।

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Written by arpitgarg

February 21, 2016 at 2:40 am

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पूछो तो बतला दूँ मैं

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घुट घुट कर के जीना जैसे,
छुप छुप कर के रोना है,
पा कर सबकुछ खोना क्या?
पूछो तो बतला दूँ मैं।

आहट की राहत है क्या,
उसके चौखट पे आने की,
आँखों पे नमी की चादर क्यों?
पूछो तो बतला दूँ मैं।

बदल करवटें कटती रतियाँ,
पलछिन, लगे जैसे सदियाँ,
आवाज क्यों अटकी हलक तले?
पूछो तो बतला दूँ मैं।

खोजा तुझे मैंने कहाँ कहाँ,
बनके फ़कीर माँगा करता,
दिल बन पत्थर टूटा कैसे?
पूछो तो बतला दूँ मैं।

मैं सिसक सिसक के रोया हूँ,
पर आसूँ न आने दिए कभी,
क्या कसम तेरी मैं खा बैठा?
पूछो तो बतला दूँ मैं।

न दवा मिले, न दुआ सरे,
अंतर्मन अलग ही सुलग रहा,
है दर्द भरा क्या मन में मेरे?
पूछो तो बतला दूँ मैं।

शून्य को बैठा रहा ताक,
नापाक हुआ, न रहा पाक,
जो मन में दबाये बैठा हूँ,
पूछो तो बतला दूँ मैं।

Written by arpitgarg

February 19, 2016 at 1:53 am

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सो पाऊँ

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थोड़ी असमंजस में हूँ यारों,
किस राह चलूँ ये बूझूँ मैं,
या खटिया डाल के सो जाऊं?

कुछ करने को करे न मन,
बांधूं औ हो जाऊं कण-२,
या चादर ओढ़ के सो जाऊं?

खा के डाकारूं, डकार के खाऊं,
कभी हफ्ते-२ नहीं नहाऊँ,
या तकिया लगा के सो जाऊं?

आधे अधूरे ख्वाब हैं आते,
पूरा कैसे उनको कर पाऊँ?
या बत्ती बुझा के सो जाऊं?

दिल धक-२ कर धड़क उठे,
लगे के जैसे मैं उड़ जाऊं?
या ख्वाब संजो के सो जाऊं?

कुछ राह मिले, तो चाह मिले,
सुकून आये, जब साँझ ढले,
अब उठूँ, ताकि कल सो पाऊँ॥

Written by arpitgarg

January 12, 2016 at 11:02 pm

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प्यार नहीं तो कुछ भी नहीं

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सुना बहुत था, जाना नहीं,
यह एहसास होता बड़ा हसीं,
लगा था बस कहकहा यही,
प्यार नहीं तो कुछ भी नहीं।

हम जीते हैं औ मरते हैं,
जीवन हैं क्यों यह नहीं पता,
मरने से पहले हो एक बार,
प्यार नहीं तो कुछ भी नहीं।

कभी बातों बातों में हो जाता है,
कभी सर्द रातों में हो जाता है,
होता है तब कहता है दिल,
प्यार नहीं तो कुछ भी नहीं।

जो लगते थे खंडर उजाड़,
उनमें रंग जैसे भर जाते हैं,
औ हमसे यह कह जाते हैं,
प्यार नहीं तो कुछ भी नहीं।

समय थम सा कुछ जाता है,
पल सब पल-छिन हो जाते हैं,
हर टिक टिक बस यही सन्देश,
प्यार नहीं तो कुछ भी नहीं।

हर सपने सच्चे लगते हैं,
बेगाने भी अपने लगते हैं,
खुद बचा मर ना जाऊं कहीं,
प्यार नहीं तो कुछ भी नहीं।

पर क्या यह सब सच्चा है?
या पल भर का एक गच्चा है?
पता चलता सबको है खुद ही,
प्यार नहीं तो कुछ भी नहीं।।

Written by arpitgarg

November 25, 2015 at 8:06 pm

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सीने की चुभन

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heart

कुछ उसने कहा औ चुप मैं रहा,
औ चुप मैं रहा, पर उसने सुना,
दिल की धड़कन, आह साँसों की,
माथे की शिकन, सीने की चुभन।

प्यार को उसके ठुकरा कर के,
अँखियन उसकी नम मैंने करी,
सोचा था कि सही राह है यह,
जाने फिर क्यूँ दिल यह तरसे।

बाहों में मेरे ऐसे लिपट गयी,
न आज रात तुझे जाने दूँगी,
अब तो जीवन की विरह है,
कुछ पल हैं बचे, दिल रोता ये।

कितना मजबूर महसूस करूँ,
जैसे हाथ काटे जालिम ने किसी,
औ पैरों को बेड़ियां जकड़ी हैं,
जैसे सजी चिता की लकड़ी हैं।

बस लिपट-२ के तू रोती रही,
मैं बेबस सा यह सब देख रहा,
एक बड़े अंतर्द्वंद से हूँ रहा जूझ,
खतम हुई मेरी सब सूझ बूझ।

वो पल हसीन कैसे भूलूँ मैं,
जो काटे जुल्फों के साये में तेरे,
मदहोश करती जो महक तेरी,
उसका आलम है आज तलक।

मेरा अंतर्मन ये कहता मुझसे,
यह जीवन जो न तेरे नाम किया,
वह पल जो न जियूँगा साथ तेरे,
अगले सब जनम तुझे मैंने दिए।।

Written by arpitgarg

November 16, 2015 at 4:09 pm

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देखा तुझे तो जाना ये

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दिल में नहीं था कोई गम,
खुशियाँ भी थीं मुझे भरपूर,
फिर भी अधूरा था जीवन,
देखा तुझे तो जाना ये।

अपनी मस्ती में ही जीता,
मन करा तो जरा-२ पीता,
यह सब तो बस मिथ्या थी,
देखा तुझे तो जाना ये।

सारा संसार ये था मेरा,
उत्तर दक्षिण, पूरब पश्चिम,
अधूरा था कितना बिन तेरे,
देखा तुझे तो जाना ये।

जीत बहुत सी मिलीं मुझे,
बहुत इनां मैंने जीते,
ख़ुशी जीत की होती क्या,
देखा तुझे तो जाना ये।

गुस्सा हमेशा रहा खड़ा,
हर किसी से जा-२ के मैं लड़ा,
बिन लड़े हारने में भी मज़ा,
देखा तुझे तो जाना ये।

अपनी बुद्धि पे बड़ा ताब,
अपनी प्रशंसा आपों आप,
बनके पगला फिरना कैसा,
देखा तुझे तो जाना ये।

था सब कुछ, पर कुछ कम,
न कहने वाला कोई सनम,
आँखों की नमीं क्या होती,
देखा तुझे तो जाना ये।

Written by arpitgarg

September 23, 2015 at 3:08 pm

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सच है

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दिल में उठा है दर्द सा कुछ,
रह रह कर के आता है,
सह सह कर के जीता हूँ,
हाँ ये सच है, मैं पीता हूँ।

भुन्नैटा सा यह जीवन क्यों,
सपने धरे सब, ज्यों के त्यों,
ख्वाइश तोड़-२ के सीता हूँ,
हाँ ये सच है, मैं पीता हूँ।

चहुँओर मेरे है हलचल सी,
पगला सा हूँ मैं देख रहा,
लो हाथ रख गीता पे कहूँ,
हाँ ये सच है, मैं पीता हूँ।

आँखें भर आती जब-तब,
मेरे हाथ भी कापें जाते हैं,
बोझ ये कब तक मैं सहूँ,
हाँ ये सच है, मैं पीता हूँ।

अपना जिसको माना था,
दिल था जिसके नाम किया,
समेटता मैं वही फजीता हूँ,
हाँ ये सच है, मैं पीता हूँ।

सब फुर्ती फुर्र हुई मेरी,
चाहते हैं भागूं खूब तेज,
इंसान हूँ, न मैं चीता हूँ,
हाँ ये सच है, मैं पीता हूँ।

वाद-विवाद न करना अब,
ठान लिया बस ठान लिया,
उलझन सारी अब सुलझा दूँ,
हाँ ये सच है, मैं पीता हूँ।।

Written by arpitgarg

February 25, 2015 at 3:57 am

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