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Joint Parliamentary Committee (JPC)?

with one comment

We have been exposed to a new phenomenon during the recent times. I am talking about the Joint Parliamentary Committee (JPC). Opposition wants to have a JPC, Ruling party does not want to give a JPC and Common man is left wondering what the JPC is?

By JPC, I understand a committee jointly constituted by parliamentarians across the party lines. How is it any different from any other gazillion committees that are formed to probe matters? Why the obsession? Will it prove to be of any help?

JPC is constituted mainly in the cases where people don’t have faith that the Govt. will allow an impartial probe or the Govt. wants to impress that it has nothing to hide. There are no specific rules to it and very few references to generalize from.  JPC does not have any punitive powers. It can only pass resolution and give recommendations.  Let’s delve in a bit of history. In all there have been four investigative JPC’s till now as below:

JPC 1

  • Cause: Bofors scam in ‘87.
  • Days Parliament was stalled before it was constituted: 45.
  • Effect: Recommendations were rejected by the opposition party.
  • Timeline: Aug ‘87- April ‘88.

JPC2

  • Cause: Harshad Mehta scandal in ‘92.
  • Days Parliament was stalled before it was constituted: 17.
  • Effect: Recommendations partially accepted but never implemented.
  • Ministers summoned: Dr Manmohan Singh (then Finance Minister).

JPC3

  • Cause: Ketan Parekh securities scam in ‘01.
  • Days Parliament was stalled before it was constituted: 15.
  • Effect: Recommended a lot of stringent changes to stock market regulations but were diluted later on.
  • Timeline: April ‘01-Dec ‘02.
  • Ministers summoned: Mr Yashwant Sinha (then Finance Minister).

JPC4

  • Cause: Pesticide in Soft dirnks in’ 03.
  • Effect: Recommended guidelines for water usage by Soft drink companies.
  • Timeline: Aug ‘03-Feb ‘04.

So what will the JPC achieve in this case and why is Govt. not allowing it? One thing for sure, it’s going to achieve nothing more than a set of recommendations that too in a year’s time. As to why the Govt. is not allowing it, is a bit tricky.

UPA has 259/545 in Lok Shabha and 91/243 in Rajya Sabha. Given these funny numbers from the coalition era and SP/BSP giving outside support, UPA will be in minority with strength of around 7 in a 15 member JPC. UPA might not be able to dictate terms in the JPC.

In the past the ministers summoned were Finance Ministers but this time the focus is on PM himself. Congress is worried that JPC might summon Dr. Manmohan Singh for questioning. Thus it is ready to sacrifice entire Winter session. If PM is summoned it would be highly embarrassing to the Govt.

Also the opposition will get a potent tool against the Govt. with leaks from investigation sprayed across the media. Govt. can ill afford it.

Verdict: Govt. might not allow a JPC in this matter. Winter session will be sacrificed.

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फिर वो पुरानी याद आई

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क्यों रह रह कर आते सपने,
उन पीर परायी रातों के,
क्यों होती है दिल में हलचल,
उन नई पुरानी बातों से,
क्यों जहन में अटकी हैं यादें,
जब गलियों की कच्ची सड़कें,
सावन में पक्की लगती थीं,
जब टूटी सायिकल की गद्दी,
मोटर से मुलायम लगती थी,
जब आंच पे पकती रोटी भी,
जायके में अव्वल लगती थी,
क्या दौर था वो, कुछ और था वो,
सुख चैन का बस सिरमौर था जो,

वो समां पुराना चला गया,
कुछ और देर तक रहता फिर,
मिल बैठ के बातें करते हम,
कोई रीत पुरानी गाता में,
कुछ गम मिल जुलकर करते कम|

मैदान में वो गिरना पड़ना,
हर बात पे बालक हठ करना,
जो हवा बनाई डींगे हांक,
सब अव्वल बैटिंग देते थे,
जो आड़े आया कोई सो,
अपने सुदबुध में ऐंठे थे,
जो पेड़ सुनहरा गुलमोहरी,
दिनभर हरिया बरसाता था,
वोह बेल हवा में टूट टूट,
और नीम का मस्ती लहराना,
क्या दौर था वो, कुछ और था वो,
सुख चैन का बस सिरमौर था जो,

वो समां पुराना चला गया,
कुछ और देर तक रहता फिर,
मिल बैठ के बातें करते हम,
कोई रीत पुरानी गाता में,
कुछ गम मिल जुलकर करते कम|

शादी का मौसम सुनते ही,
मुहँ में पानी का आ जाना,
ख्वाब में भी खुरचन लड्डू की,
आपस में कुश्ती करवाना,
और कचौड़ी पूड़ी  से,
घी का टप टप रिसते जाना,
और नहीं, बस और नहीं,
एक और तो लो, तुम्हें मेरी कसम,
भाभी देवर का टकराना,
क्या दौर था वो, कुछ और था वो,
सुख चैन का बस सिरमौर था जो,

वो समां पुराना चला गया,
कुछ और देर तक रहता फिर,
मिल बैठ के बातें करते हम,
कोई रीत पुरानी गाता में,
कुछ गम मिल जुलकर करते कम|

बीमार था जब, सब याद है अब,
दादी ने नजर उतारी थी,
अलाएँ बालाएं सब टल जाएँ,
इस बात की दुआ पुकारी थी,
दीवाली में पूरे कुनबे का,
मिल जुलकर बाड़ा चमकाना,
कुछ दीपक से, कुछ बत्ती से,
सब ओर प्रकाश का टिम टाना,
सब बच्चों को नगदी मिलना,
बड़ों का आशीर्वाद कहलाता था,
एक सुई, एक धागे में,
सारा संसार पिर जाता था,
क्या दौर था वो, कुछ और था वो,
सुख चैन का बस सिरमौर था जो,

वो समां पुराना चला गया,
कुछ और देर तक रहता फिर,
मिल बैठ के बातें करते हम,
कोई रीत पुरानी गाता में,
कुछ गम मिल जुलकर करते कम|

हो गई पुरानी सब बातें,
यादें भी धुंधली हो हैं चली,
पर मन जाने क्यों अटका है,
कभी ना जाना, उसी गली,
कभी कभी एक आस जगे,
क्यों ना कल जब सो के उठें,
तो सुबह उन्हीं गलियों में हो,
रात उन्हीं अठखलियों से हो,
पर बीत चुका कब आया है,
बीते की याद ही आई है,
क्या दौर था वो, कुछ और था वो,
सुख चैन का बस सिरमौर था जो,

वो समां पुराना चला गया,
कुछ और देर तक रहता फिर,
मिल बैठ के बातें करते हम,
कोई रीत पुरानी गाता में,
कुछ गम मिल जुलकर करते कम|

Written by arpitgarg

February 20, 2009 at 7:57 am

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