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जब मिली थी तुम पहली बार
न भूला मैं वो आखों का दीदार,
सकपकाहट औ सकुचाहट वो,
दबी सी हँसी, सीने पे वार,
जब मिली थी तुम पहली बार।
न भूला मैं वो उड़ती जुल्फें,
पलछिन करती सी पलकें,
सारी रात रहा बेकरार,
जब मिली थी तुम पहली बार।
न भूला मैं वो अंगुलियां,
दबोचे थे बाल जिससे मेरे,
हाथ ना आये, खाली वार,
जब मिली थी तुम पहली बार।
न भूला मैं वो लाली,
जो लबों पे छायी थी तेरे,
उसी पल गया था दिल को हार,
जब मिली थी तुम पहली बार।
न भूला मैं वो नयन तेरे,
कजरारे से, शरमाते से,
तपस्या मेरी करी तार-तार,
जब मिली थी तुम पहली बार।
न भूला मैं वो बातें तेरी,
जो मुझसे कर न पाती थी,
रहा है मुझे तबसे इंतज़ार,
जब मिली थी तुम पहली बार।
न भूला मैं वो इठलाना तेरा,
जो मन मेरा मचला जाता था,
हारा मैं मती, बन गया गवार,
जब मिली थी तुम पहली बार।
ऐसा ही रहे, न भूलूँ मैं,
तेरा एहसास, तेरी हर सांस,
जब देखूं तुझे, लगे मुझे ऐसा,
कि मिली हो तुम पहली बार।।
सोचा न था
चहकता है मन, गाता है दिल,
सुबह से शाम, कटती नहीं अब,
ख्वाब देखना भी भाने लगा है,
ऐसा होगा कभी, सोचा न था|
सुबह उठना अच्छा लगने लगा,
काम करना सच्चा लगने लगा,
समझदारी भी आने लगी है अभी,
ऐसा होगा कभी, सोचा न था|
ठण्ड छूने से जिसको लगी थी कभी,
तपन उसके ही आने से होने लगी,
सर्द रातें भी पल में कटती हैं अब,
ऐसा होगा कभी, सोचा न था|
चंद लम्हों में सो जाया करता था जो,
कितने पहर आँखों-आँखों में कटने लगे,
दर्द भी होता है न ताकीद अब,
ऐसा होगा कभी, सोचा न था|
अपनी बातों से फुर्सत नहीं थी जिसे,
बातें करना ही वो भूल बैठा है अब,
दर्द-ए-तन्हाई समझ में आने लगी,
ऐसा होगा कभी, सोचा न था|
जो होना था हो ही गया है तुझे,
राख पे रोने से कुछ पायेगा नहीं,
तमन्ना सरफरोशी की जग है गयी,
ऐसा होगा कभी, सोचा न था||
इंतज़ार
इस पत्र के पटल पर दिल की इबारत है लिखी,
इसी को मेरा प्रेम पत्र समझना तुम सखी|
दो-चार बार जो तुम मुझसे मिली,
दिल के आँगन में कली नई खिली।
नोट्स के बहाने हुए पहली मुलाक़ात,
उसी पल हमने अपना दिल दिया तुम्हारे हाथ।
चांदी के सिक्कों सा तेरा तन,
तेरी खिलखिलाहट और यह चंचल मन।
मेरे इशारों को तू न समझ पायी,
या मेरे खुदा तेरी दुहाई।
दिल की बात कहने की कच्ची है उमर,
पर जब भी कहूँगा तुझे ही कहूँगा ऐ जानेजिगर बन मेरी हमसफ़र।
इस दिल के बहकाने पर न चलूँगा मैं,
प्यार की कसौटी पर खुद को परखूँगा मैं।
हाय हैलो का यह प्रेम नहीं है,
इससे आगे भी न बढ़ सका यह भी सही है।
जब मैं बन जाऊंगा इस काबिल,
कि सकूँगा तेरा हाथ थाम, तभी समझूंगा तुझे अपनी रंगीन शाम।
बस तब तक मेरा इंतज़ार करना,
वरना …
