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सवा तीन रात के
गुमनाम अँधेरा छाया है,
चाँद भी खिल न पाया है,
नीरस मन बिन बरसात के,
सवा तीन बजें जब रात के।
झींगुर मधुर ध्वनि चेते,
कुकुर भी जैसे गूँज गान,
रोग अनिद्रा मारे जोर,
सवा तीन बजें जब रात के।
कोई फुटपाथ पे है सोया,
कोई बिन आंसूं के है रोया,
सब मारे हैं हालत के,
सवा तीन बजें जब रात के।
पंखा सर सर कर चलता,
जैसे सन्नाटे को दबा रहा,
डर लगता हल्की आहट से ,
सवा तीन बजें जब रात के।
पानी पी-२ कर बहला मन,
उत्तर दक्षिण, दक्षिण उत्त्तर,
संजीदा बिन ज़ज्बात के,
सवा तीन बजें जब रात के।
घोड़े दिमाग, दौड़े सरपट,
चेतना पहुंचे चरम सीमा,
सोच पाये पार संसार के,
सवा तीन बजें जब रात के।
ध्यान लगा, तो परम पहर,
अशांत तो काली रात बने,
मृत जीवित हो अंतर धूमिल,
सवा तीन बजें जब रात के।।
मुठ्ठी भर रेत
छोटी कभी, लम्बी कभी,
है जिंदगी भी कुछ अजीब,
सुलझी कभी, उलझी कभी,
कितनी दूर, कितनी करीब।
बदला मौसम, बादल छाए,
मझधार में नैया, गोते खाए,
पानी अँखियाँ, काली रतियाँ,
सब कुछ खोये, कुछ न पाये।
धड़कता दिल, चढ़ती सांस,
पीता पानी, लगती पर प्यास,
ऊपर से खुश, अंदर उदास,
चलती-फिरती जिन्दा लाश।
कैसी सी है दास्तां ये मेरी,
जाने क्यों हुई आने में देरी,
कहता रहता दिन औ रात,
बिखरे सपने, उजड़े जज्बात।
इस सपने का मोह न जाता है,
गम रह रह कर के आता है,
एक टीस सी अंदर उठती है,
खुद पर ही तरस आ जाता है।
अपने संग सबको दुखी किया,
हवा चली, बुझ गया दिया,
मुठ्ठी में जो दम ना था,
क्यों रेत समाने तू चला॥
दफ्तर
उत्तर दक्षिण, पूरब पक्षिम,
यहाँ बोध गया, यहाँ झाँसी है,
कुछ ऐसा है दफ्तर मेरा,
कुछ ऐसे इसके वासी हैं।
एक को है लड़की न मिलती,
हांफ-हांफ दूजे का बुरा हाल,
कोई ऊंचा है जैसे खम्बा,
गुसाए होत कोई जगदम्बा।
कोई दिखती है झांसी रानी,
कोई रोज़ सुनाता नयी कहानी,
एक बनता बड़ा है हिप हॉप,
सबको लगता पर लल्लन टॉप।
किसी को भ्रमण का चढ़ा शौक,
दूजा लगा वॉस-ऐप्प, जी-टॉक,
कोई अपने पे दम्भ दिखा रहा,
कोई जीवन जीना सिखा रहा।
हर बात पे एक रोता रहता,
दूजे की हसीं ही न रूकती,
वो गोलू मोलू बच्चे जैसा,
कोई करता है पैसा पैसा।
एक है रहता हर पल सोता,
दोनों बाजू वाले दादा पोता,
कोई खम्बे से प्यार जाता रहा,
कोई मेरे दिमाग की हटा रहा।
हर एक की है अपनी ही धुन,
सब खुश, न कोई उदासी है,
कुछ ऐसा है दफ्तर मेरा,
कुछ ऐसे इसके वासी हैं।।
मेला वोट का
देखो फिर से लगा है मेला,
तरह तरह के हैं नट-खेल,
कोई है पत्तों का जादूगर,
कोई सौदागर किस्मत का।
कोई दंगों के डर से डरा रहा,
कोई है घोटाले सुना रहा,
जात-पात की देता दुहाई,
कोई धर्म का हाथ भड़ा रहा।
एक करतबी मिला मुझे,
जो रस्सी पे चलता था,
इस ओर नहीं, उस ओर नहीं,
बीच रास्ते निकलता सा।
था एक मदारी वादों का,
बस वादों का, न इरादों का,
सब बंदर बनकर उछल रहे,
पैसे बटोर वो निकल लिया।
दाढ़ी वाला बाबा आया,
साथ अपने कुछ सपने लाया,
नयी तरक्की, दिशा नयी,
न हो बड़े व्यापारी की ढाल कहीं।
एक गोरा चिट्टा बच्चा आया,
बड़ा नाम और इतिहास लाया,
हर हाथ शक्ति की बात करी,
घोटालों का आरोप, न हुआ बरी।
हुंकार भरी एक बैरी ने,
कहता है मैं हूँ पाक साफ़,
जनता के मन में संशय है,
किस करवट ऊँठ ये बैठेगा।
सब हैं मेले की मस्ती में,
हर चीज़ बिके है सस्ती में,
जिसे भी मिले बंपर इनाम,
कर के देगा वो कुछ काम?
सायें सायें
सोचा मैंने एक दिन ऐसा,
होता होगा नर्क भी कैसा,
जहाँ गर्म सर्द का भेद न हो,
चलती हो हवा बस सायें सायें।
चीख हलक से न निकले,
जहाँ लौह भी बन बर्फ पिघले,
हर ओर सन्नाटा पसरा हो,
कौआ भी चुप, न काएं काएं।
घनघोर तबाही मंजर हो,
बस खूनी भूतानी खंडर हो,
ढहते सपने, बहते अपने,
फिस्स होता महल, टाएं टाएं।
बस मार काट और सर्वनाश,
जलते से बदन, उड़ते चिथड़े,
गर कुछ समझायी आता है,
ढिशुम ढिशुम और धायें धायें।
सोने को नसीब न तल कोई,
खाने को फक्त कंकड़ हो,
पीने को मिले बस अपना लहू,
ज्वालामुखी में लावा से नहाएं।
जहाँ दर्द की कोई थाह न हो,
हो यातनाएं बस दिन औ रात,
नुचता हो बदन, रूह भी कापें,
जिन्दा शरीर गिद्ध खाएं जाएँ।
सोच के ही मैं सहम गया,
क्या ऐसा नर्क हो सकता है?
जहाँ गर्म सर्द का भेद न हो,
चलती हो हवा बस सायें सायें।।
मैं हाय सौदागर बन न सका
प्रेमी में कहा प्रेमिका से, कि वफ़ा न दिया, वफ़ा को मेरे ऐ जालिम,
फिर भी दिल यह मेरा, तेरे लिए धड़कता क्यों है?
प्रेमिका बोली, यह कोई अनबूझ पहेली नहीं, सुलझा न जिसको सकता तू,
क्यों देती मैं साथ तेरा, जब तू खुद से ही बदल गया,
तू लाता था हर दिन गुलाब मुझे, गुलदस्ता कब से खाली है,
दिखाता था मुझको ख्वाब नए, किस्मत भी कितनी साली है।
क्या सौगातों का मोह था यह, मुझसे तूने ना प्यार किया,
हीरे मोती, का मोल तुझे, आह मेरी तू सुन न सकी,
जेब से था मैं थोड़ा तंग, गुलदस्ता कैसे भर पाता,
फ़ाके कितने देखे मैंने, कितना तुझको बतलाता?
तंगी जो आयी तुझपे थी, उससे मुझे है क्या लेना,
मैं आज कल की लड़की हूँ, न हूँ कोई जूलिएट मैं,
गहने श्रृंगार सबका है दाम, कैसे मुझे दिलवाता,
तेरे जैसे कंगले पे, मेरा दिल कैसे टिक पाता?
तेरी याद मैं पीता हूँ, तेरे साथ की चाह मुझे,
तू पर कितनी जालिम है, हृदय है या पत्थर है?
मुक्ति ही मुझको दे दे, सांस को तूने छीन लिया,
सौदा ये था लिए तेरे, मैं हाय सौदागर बन न सका।।
वारिस
तेज बारिश के साथ उस रात तूफ़ान भी जोरों पे था| एक तो बारिश से पूरा बदन भीग चूका था ऊपर से हवा के कारण कुद्कुड़ी बंधे जा रही थी| “मुझे भी आज ही छतरी घर भूल के आनी थी|”, वो बडबडा हुआ जा रहा था| अपने दिल को ही बहला रहा था वो| छतरी जार जार हो घर के किसी कोने में पड़ी थी| “अगली तनख्वाह से पहले एक रेनकोट खरीदूंगा|” मुंबई की बारिश से बचना आसान नहीं होता| उसने कुछ सोचा और जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाने लगा| कल से सब ठीक हो जाएगा, कल से|
वो रात को फैक्ट्री से ओवर-टाइम करके लौट रहा था| चार बच्चों की परवरिश आसान नहीं होती| बीवी फिर पेट से थी| इस बार लड़का हो जाए, तो गंगा नहाऊँगा| पिछले ५ साल यही सोच रहा था वो| इस बार लड़का नहीं हुआ तो दूसरी शादी पक्की| माँ नें बुथिया की लड़की देख रखी थी| लंगड़ी है वो, पर वारिस तो दे ही देगी| न तो पहली बीवी दहेज़ लायी थी, न वारिस ही दे पायी है। उफ़ ये बारिश भी रुकने का नाम ही नहीं लेती।
सोचते सोचते कब सड़क पर से ध्यान हटा पता ही चला। बस एक रौशनी सी दिखी और उसके बाद अंधकार छा गया। जब आँखें खुली तो कुछ अजीब सा लगा। कौन सी जगह थी यह? सर भी भारी सा था। “होश आ गया, होश आ गया“, कुछ चहल कदमी सी होने लगी। पास में बैठी औरत रोने लगी। मैं २ साल से कोमा में था।
सबने उम्मीद छोड़ दी थी। नहीं छोड़ी थी तो बस इस पागल औरत और मेरी ४ नन्ही परियों ने। वही जिसको मैं छोड़ने कि सोच रहा था, २ साल पहले उस काली रात में। वही जिनके पैदा होने कि मुझे कभी ख़ुशी न हुई थी। २ साल से मेरी सेवा कर रही हैं। आज मैं जीवित हूँ सिर्फ इनकी वजह से।
यही मेरी धरोहर हैं, यही मेरी वारिस हैं।
तुमसे मिलके
मिलके तुमसे लगा ऐसा मुझे,
जैसे जीवन ये बे-मतलब नहीं,
एक झलक में कुछ ऐसा सुकून,
पूरे दिन फिर मैं थकता नहीं|
जिनके जवाब में ढूंढता था,
उन प्रशनों के मायने नहीं,
एक अजब सी शांति छाई,
जैसे मुक्ति कोई मैंने पायी|
तेरा मुस्कराना, नीदें उड़ाना,
नीदें उड़ाकर, बनना मासूम,
आज मुझे कुछ होश नहीं,
है किसीका इसमें दोष नहीं|
आँखें, पलकें, नज़रें, झलकें
मैं खुद पे कैसे काबू पाऊँ,
होठ गुलाबी, चाल शराबी,
कलपुर्जे मेरे, आई खराबी,
चाँद सितारे क्या चीज़ हैं,
मैं सूरज को गर्मी सिखलाऊँ,
एक बार बोल दे बस जो तू,
मैं खुद से भी बेगां हो जाऊं|
तेरा इठलाना हमें भा गया,
मुस्कराना तेरा गजब ढा गया
उलझी सुलझी जुल्फें तेरी,
यही लगे बस दुनिया मेरी,
आखें बंद करूं, बस तू दिखे,
बिन तेरे, सब फीका लगे,
मेरा दिल क्यों है बेकरार
क्या यही होता प्यार?
हॉस्टल की यादें
सुट्टे का धुंआ, पसरा था हर ओर,
नशे की चुप्पी, न होता कोई शोर,
किस राह चलें, क्यों सोचें हम,
हॉस्टल, दोस्त, मस्ती हरदम|
ठहर जाता था वक़्त, आकर वहां,
वो धरती, आसमान, वही सारा जहाँ,
खेले कूदे, लड़े झगड़े, सब वहां,
किसने कहा जन्नत नहीं होती यहाँ|
वो किला था हमारा, हम सिपह:सलार,
सजती थी महफ़िल, लगता दरबार,
औरत जात का आना मना है इधर,
हर दीवार पर यही लिखा था उधर,
पहली बार का जश्न, जोरदार,
पहली हार का मातम, खूंखार,
किताबों की जली होली, मज़ा,
छुट्टी में घर जाना लगती थी सज़ा|
मारपीट की नौबत, कुछ कहा हो,
किसीने हॉस्टल के खिलाफ, जो,
हो जाते सब तयार, जान देने को,
जब उसकी इज्ज़त ताक पर हो|
वहीँ सब सीखा, वहीँ सब किया,
वहां नहीं रहा, तो क्या ही जिया,
हॉस्टल की ज़िन्दगी न हूँ भुला पाता,
न चाहते हुए भी ख्याल है आ जाता||
पकपक
बकता हूँ मैं दिन औ रात,
आखिर इतना बकता क्यूँ हूँ,
सुनाई बस यही देता है,
पकपक पकपक पकपक पकपक|
एक ही बात दिन ब दिन,
आखिर नहीं मैं थकता क्यूँ हूँ,
कहते हैं सब, बंद कर अपनी,
कचकच कचकच कचकच कचकच|
एक बार जो बात हुई, सो हुई,
सौ सौ बार उसको करता क्यूँ हूँ,
समझ में बस इतना आता है,
भकभक भकभक भकभक भकभक|
दोहरा दोहरा, तिहरा तिहरा
बात की बात ही खत्म हुई,
बात में बस जो बात बची, वो थी,
पटपट पटपट पटपट पटपट|
पहले तो फिर भी सुनते थे जो,
कान बंद किये उन्होंने भी,
उनको भी अब लगने लगा था,
खटखट खटखट खटखट खटखट|
अब तो मैं खुद भी तंग आ चुका,
बेइज्जती अपनी करवा करवा कर,
मुझको भी अब सुनने लगा है,
बसकर बसकर बसकर बसकर|
चुप हो जाना चाहता हूँ मैं,
गुम हो जाना चाहता हूँ मैं,
चाहता हूँ मैं जीना फिर से,
मरकर मरकर मरकर मरकर||
