ArpitGarg's Weblog

An opinion of the world around me

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Put right foot down

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When you see injustice,
Innocent blood spilled,
Don’t just stand and frown,
Put your right foot down.

When you see a child,
Molested by a savage,
Don’t laugh like a clown,
Put your right foot down.

When you see hoodlums,
Teasing a certain eve,
Don’t sip your coffee brown,
Put your right foot down.

When you see a teacher,
Beating up small kid,
Don’t just use proper noun,
Put your right foot down.

When you see poor laborer,
Being taken advantage of,
Don’t you too fill godown,
Put your right foot down.

When you see fake promises,
Made by your beloved leader,
Don’t still paint the red town,
Put your right foot down.

When you see injustice,
Innocent blood spilled,
Don’t just stand and frown,
Put your right foot down.

Written by arpitgarg

October 1, 2014 at 2:20 am

Posted in General/Society

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Should Have Been

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Should have been a fish,
Sometimes I do wish,
Swim across the ocean,
Splash aqua, lots of fun.

Should have been a bird,
If my voice was heard,
Fly front n back, low n high,
Mine would be whole sky.

Should have been a ‘roach,
But maker didn’t approach,
Nothing to care or to attend,
Be alive even if all else end.

Should have been a Sundae,
If they followed my fundae,
Chocolate fudge n Whipped cream,
Has been one of those dream.

Should have been a chicken,
Out of my wishful thinken’,
No fights, No shouts loud,
I could always chicken out.

Should have been a popcorn,
It’s what I want, why u scorn?
Poppin n Jumpin quite a lot,
Put in oven, my backside hot.

Should have been a turd,
Formed out of milk n curd,
Gave a fellow satisfaction,
As I came outta captivation.

Written by arpitgarg

September 30, 2014 at 6:30 pm

Posted in Funny

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बेचैन दिल

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दिल रहता है बेचैनी में,
जाने क्यों मेरा कबसे,
हर आहट से है लगता ये,
कि आई वो मेरी चौखट।

आँखें मेरी तरस गयीं,
न हुआ पर दीदार मुझे,
मर्ज़ जो है मुझे लगा,
कोई इलाज़ पता तुझे।

रातों को करता हूँ गिनती,
तारे तो अनगिनत ठहरे,
झींगुर की झन-झन भी अब,
मुझको लगने लगी लोरी।

हवा के हर एक झौंके से,
मन तड़पा मेरा जाता है,
स्पर्श नहीं कुछ सुगंध सही,
क्यों लाता अपने साथ नहीं।

कोई कोयल कूकी डाली पे,
लगा कि संदेशा है लायी,
न तू लायी कोई बात नहीं,
एक मेरा संदेशा पहुंचा दे।

चांदनी में भीगा हर कण,
मुझे अपना सा लगता है,
इसी चांदनी को यार मेरा,
ओढ़ रहा होगा इस पल।

कहते हैं घूमती धरती है,
धुरी पे अपनी हर एक पल,
थम जाऊं गर मैं इस क्षण,
क्या धरती मुझे मिला देगी॥

Written by arpitgarg

September 17, 2014 at 2:33 pm

Posted in Hindi, Love, Poetry

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अच्छे दिन आने वाले हैं

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अलग-२ दल लगाएं अलग-२ नारे,
सब दौड़ें हितैषी बनने को हमारे,
टर्राने लगे हैं जैसे मेंढक बरसात में,
कुछ दिन तो गुजारिये गुजरात में।

कोई फेंके है रोटी, ललचाये है पैसा,
निकाले हैं आंसू, नाटक कैसा कैसा,
वादे झूठे सुनाकर, करे सीट पक्की,
हर हाथ शक्ति, हर हाथ तरक्की।

अभी की नहीं, रीत है ये पुरानी,
राजा की बेटी, हुई मुल्क की रानी,
सालों तक रखा, सबको हक़ से दूर,
एक शेरनी सौ लंगूर, चिकमंगलूर।

रुक रुक के बोले, बड़े हौले हौले,
विरोध मेरा, ये अच्छी बात नहीं है,
सबका होगा भला, नर हो या नारी,
चुनो अबकी बारी अटल बिहारी।

बाप और बेटा, साईकल पे डोलें,
सद्भावना फ़ैलाने की बात बोलें,
फूल को मसलें, रोकें हाथी का दम,
यूपी में है दम, जुर्म हैं यहाँ कम।

सरपट मैं दौड़ा, हो रेस का घोडा,
दर-२ पे भटका, भूका औ प्यासा,
जीतते ही हम भर पेट खाना वाले हैं,
क्योंकि अच्छे दिन आने वाले हैं।।

Written by arpitgarg

September 17, 2014 at 3:03 am

दाढ़ी वाले बाबा

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कुछ बचपन की यादें ताजा,
करता हूँ तो उठते कुछ सवाल,
सुना बहुत, पर होता क्या है?
टिंडे की जड़ औ बाल की खाल।

बाजार से जा दो टिंडे लाया,
सुबह से शाम किया उन्हें हलाल,
लेकिन फिर भी ढूंढ न पाया,
टिंडे की जड़ औ बाल की खाल।

सुबह मैं तड़के नाई के पहुंचा,
औ सफा कराया एक एक बाल,
घिर गयी रात पर हाथ न आई,
टिंडे की जड़ औ बाल की खाल।

जब कभी मचाया था ऊधम,
जोर से मरोड़ा गया था कान,
एक बार जो तू हाथ में आएगा,
चूहे की कोठरी में डाला जाएगा।

पूरे दो दिन से जगा हुआ हूँ,
चूहों के पीछे ही लगा हुआ हूँ,
हर संभव मैंने कोशिश की,
पर न मिली कोठरी चूहे की।

एक और किस्सा याद आता है,
डराया करती थी जब माँ मुझको,
बेटा अगर तू खाना नहीं खायेगा,
दाढ़ी वाला बाबा उठा ले जाएगा।

एक दिन सोचा कि व्रत मैं करूँ,
औ दिन भर कुछ न खाऊँ पियूं,
चौखट पर बैठा टकटकी लगाये,
पर दाढ़ी वाले बाबा नहीं आये।।

Written by arpitgarg

September 16, 2014 at 1:24 am

भक् साला

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जब दिखी कोई सुन्दर कन्या,
मन मचला सा क्यों जाता है,
जैसे बिन चाबी का ताला,
दिल करे कि बोलूं भक् साला।

उस दिन तो यारों हद हो गयी,
घर का रास्ता ही भटक गया,
कोई वशी-इत्र उसने डाला,
दिल करे कि बोलूं भक् साला।

सब्जी लेने को गया था मैं,
वहां किलो-२ भर तोल रही,
धनिया भी मुफ्त में न डाला,
दिल करे कि बोलूं भक् साला।

सोचा चलो जांच मैं करवा लूँ,
आँखें हैं ठीक, बोली डॉक्टर,
पर चरित्र है तेरा कुछ काला,
दिल करे कि बोलूं भक् साला।

फूलों की टोकरी, रख सर पर,
बेच रही वो, लगा पुकार,
मेरे मन ने बना ली वरमाला,
दिल करे कि बोलूं भक् साला।

सोचा कई बार, त्याग दूँ सब,
आखिर कब तक करूंगा मैं,
मस्ती तफरी, और मधुशाला,
चल हट दिल नौटंकी साला।।

Written by arpitgarg

September 15, 2014 at 3:01 am

Posted in Funny, Hindi, Poetry

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इतना हक़ भी नहीं?

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रूठा जो मुझसे उस दिन,
कहीं वो मेरा रब तो नहीं,
पुछा था तूने जिस दिन,
अब मेरा इतना हक़ भी नहीं?

तक़दीर ने कैसी चाल चली,
मुड़ बैठा, जाना न जिस गली,
धड़का दिल, इसमें तो शक नहीं,
अब मेरा इतना हक़ भी नहीं?

कसूर न इसमें दोनों का,
खेल नहीं था खिलौनों का,
पत्तों की इमारत, ऐसी ढही,
अब मेरा इतना हक़ भी नहीं?

खुश हो तू, इतनी दुआ करूँ,
तेरे अश्रु झरे, बहुतेरा डरूँ,
कुछ देर की अब ये बात रही,
अब मेरा इतना हक़ भी नहीं?

वादे न थे कुछ हमने किये,
फिर भी क्यों ऐसी उठे तीस ,
जैसे लहू लाल हो जाए बही,
अब मेरा इतना हक़ भी नहीं?

समय का पहिया सीधा चलता,
साँझ पहर ही सूरज ढलता,
उल्टा चल दे, ये आस रही,
अब मेरा इतना हक़ भी नहीं?

हूँ खुशियों में तेरी शामिल,
गम को मैं तुझसे गलत करूँ,
खोजूं ईश्वर, होगा तो कहीं,
अब मेरा इतना हक़ भी नहीं?

Written by arpitgarg

September 2, 2014 at 9:41 pm

Posted in Hindi, Poetry

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गुमसुम

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शून्य को बैठा ताक रहा,
जाने क्यों बगलें झाँक रहा,
अपनी मस्ती में था झूमा,
रहने लगा तू क्यों गुमसुम।

हर ओर तरंगें बिखरी थी,
घनघोर घटाएं छितरी सी,
हंसने से सवेरा होता था,
रहने लगा तू क्यों गुमसुम।

चलने से थिरकन होती थी,
धू-२ के शिकन न होती थी,
हर वाद-विवाद में था अव्वल,
रहने लगा तू क्यों गुमसुम।

कुल दीपक तू कहलाया था,
माहौल हुआ गरमाया सा,
अग्नि तपिश थी लगती नम,
रहने लगा तू क्यों गुमसुम।

सर माथे तुझे लगाते सब,
मूरत न कोई, अपना तू रब,
तू कलाबाज, मस्ती करतब,
रहने लगा तू क्यों गुमसुम।

प्रश्न का हर, तू था उत्तर,
हर दांव रहा मीले पत्थर,
ध्वनि तेरी धरती कम्पन,
रहने लगा तू क्यों गुमसुम।

काजल से काली रात है यह,
डूबे सब, कहर बरसात ठहे,
कठिन पहर, न आये समझ,
रहने लगा तू क्यों गुमसुम।।

Written by arpitgarg

September 2, 2014 at 2:05 am

Posted in Hindi, Poetry

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एक-दो दिन

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वो ट्यूशन पढ़ने आती थी,
औ मन को मेरे भाती थी,
जरा जरा इठलाती थी,
कुछ ज्यादा ही इतराती थी।

मैं रहता था आगे बैठा,
वो पीछे बैठी हुई कहीं,
अपनी किस्मत से था चैंटा,
कि बात तो अबतक हुई नहीं।

घुंघराले बाल जो थे उसके,
कभी आँखों पे आ जाते थे,
कर दिए जाने कितने नुस्के,
शब्द हलक में ही रह जाते थे।

ऊब भरा एक दौर था वो,
दिमाग भी कुछ और था वो,
नंबर लाने में लगा रहा,
दिल से अपने ही दगा रहा।

हंसी कुछ उसकी वैसी थी,
कि तितली भी शर्मा जाए,
सुंदरता उसकी ऐसी थी,
नीरसता में बहार छाए।

कुर्ती उसकी जो रंग पीला,
मुझपे पक्का कुछ ऐसा चढ़ा,
आसमान फिर क्या नीला,
बुद्धि पे पत्थर जैसे पड़ा।

पहल नहीं पर मैंने करी,
कर्म में खुद को झौंक दिया,
चाहे फिर हो वो स्वप्न-परी,
दृढ़ प्रण कुछ ऐसा लिया।

पत्थर दिल पहुंचे कालेज ,
प्यार तो बस उससे ही था,
एक-दो दिन की देर थी बस,
किसी और पे जा अटका॥

Written by arpitgarg

August 27, 2014 at 11:47 pm

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बात चली

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लब पे लगा के मैखाने को,
झूमा मैं हर गली गली,
रखनी मुझको छुपा के थी पर,
रात चली तो बात चली।

ताश के पत्ते हाथ में आकर,
नोट की गड्डी खुली खुली,
अड्डा किसीको पता न था पर,
रात चली तो बात चली।

सुट्टे के धुएं के छल्ले,
निकले जैसे हो नली नली,
घर पहुंचा खुशबू लगा के था पर,
रात चली तो बात चली।

नाच गान औ मनोरंजन,
तोते संग थिरकी थी तितली,
पैसे बटोर वो चली गयी पर,
रात चली तो बात चली।

रात की बात रात के संग,
कैसे कैसे थे मन मचली,
उड़ गया मैं जैसे कटी पतंग पर,
रात चली तो बात चली।

गुम हुआ था ऐसी मस्ती में,
तसवीरें थीं सब हिली हिली,
इधर उधर कर देता मैं पर,
रात चली तो बात चली।।

Written by arpitgarg

August 26, 2014 at 5:31 am

Posted in Hindi, Poetry

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