Archive for the ‘Poetry’ Category
तुमसे मिलके
मिलके तुमसे लगा ऐसा मुझे,
जैसे जीवन ये बे-मतलब नहीं,
एक झलक में कुछ ऐसा सुकून,
पूरे दिन फिर मैं थकता नहीं|
जिनके जवाब में ढूंढता था,
उन प्रशनों के मायने नहीं,
एक अजब सी शांति छाई,
जैसे मुक्ति कोई मैंने पायी|
तेरा मुस्कराना, नीदें उड़ाना,
नीदें उड़ाकर, बनना मासूम,
आज मुझे कुछ होश नहीं,
है किसीका इसमें दोष नहीं|
आँखें, पलकें, नज़रें, झलकें
मैं खुद पे कैसे काबू पाऊँ,
होठ गुलाबी, चाल शराबी,
कलपुर्जे मेरे, आई खराबी,
चाँद सितारे क्या चीज़ हैं,
मैं सूरज को गर्मी सिखलाऊँ,
एक बार बोल दे बस जो तू,
मैं खुद से भी बेगां हो जाऊं|
तेरा इठलाना हमें भा गया,
मुस्कराना तेरा गजब ढा गया
उलझी सुलझी जुल्फें तेरी,
यही लगे बस दुनिया मेरी,
आखें बंद करूं, बस तू दिखे,
बिन तेरे, सब फीका लगे,
मेरा दिल क्यों है बेकरार
क्या यही होता प्यार?
पकपक
बकता हूँ मैं दिन औ रात,
आखिर इतना बकता क्यूँ हूँ,
सुनाई बस यही देता है,
पकपक पकपक पकपक पकपक|
एक ही बात दिन ब दिन,
आखिर नहीं मैं थकता क्यूँ हूँ,
कहते हैं सब, बंद कर अपनी,
कचकच कचकच कचकच कचकच|
एक बार जो बात हुई, सो हुई,
सौ सौ बार उसको करता क्यूँ हूँ,
समझ में बस इतना आता है,
भकभक भकभक भकभक भकभक|
दोहरा दोहरा, तिहरा तिहरा
बात की बात ही खत्म हुई,
बात में बस जो बात बची, वो थी,
पटपट पटपट पटपट पटपट|
पहले तो फिर भी सुनते थे जो,
कान बंद किये उन्होंने भी,
उनको भी अब लगने लगा था,
खटखट खटखट खटखट खटखट|
अब तो मैं खुद भी तंग आ चुका,
बेइज्जती अपनी करवा करवा कर,
मुझको भी अब सुनने लगा है,
बसकर बसकर बसकर बसकर|
चुप हो जाना चाहता हूँ मैं,
गुम हो जाना चाहता हूँ मैं,
चाहता हूँ मैं जीना फिर से,
मरकर मरकर मरकर मरकर||
एक से दस
ऐसा कोई पल
उसने मुझसे पूछा, बता ऐ साथी,
जो तू न भूला, ऐसा कोई पल,
जिस लम्हे की याद तुझे है आती,
उस हसीन राह तू ज़रा चल|
मैं सोच में पड़ा, क्या कहूं,
कहाँ से दूं, उत्तर मैं तुझे,
ज़िन्दगी टटोलूं, कभी झांकूं,
पर वो पल, न मिले मुझे|
आश्चर्य की है बात, हर दिन,
हम जीतें हैं पल कुछ हज़ार,
पर जब कोई कहता है गिन,
बेबस हो जाते, लगते लाचार|
असल में जीवन काटते बस,
पर जीते कभी नहीं हैं हम,
हँसते हैं, जब कोई बोलता हँस,
चाय पीते, वो भी चीनी कम|
मैंने कभी नहीं सहेजे वो पल,
कभी रूककर उन्हें नहीं पकड़ा,
सोचूँ कल, आज और कल,
मजबूरियां ने मुझे था जकड़ा|
इसी तरह जिए, इसी तरह जायेंगे,
न होंगी अपनी दो-चार यादें भी,
सपने भी नहीं अच्छे कभी आयेंगे,
जिंदगी बस उम्मीद के भरोसे की|
शायद तू ही है साकी, जिसका,
था इंतज़ार मैंने किया अबतक,
मुझे नहीं मालूम, पता उसका,
पर यादों को रोकूँ कबतक||
असमंजस
एकटकी लगाये दूर कहीं,
बैठा रहता हूँ दिन-दिन मैं,
कहाँ से जाने आ धमका,
जीवन में इतना असमंजस|
है सोच वही, न कोई नयी
बातें भी वही बस घिसी-पिटी
दोहरा के कहीं, दोहरा के कहीं,
जीवन में बसरा असमंजस|
सुबह को उठा, रात सोया,
रहता हूँ कुछ खोया खोया,
माथे पे शिकन, सीने में चुभन,
जीवन में उलझा असमंजस|
जिस रात से प्यार हुआ था कभी,
वो रात काली लगती है मुझे,
ख्वाब दुस्वप्न में कब बदले,
जीवन में सोचूँ असमंजस|
हर हवा सुहानी लगती थी,
हर महक दीवानी लगती थी,
क्यूँ सांस भी न अब ले पाऊँ.
जीवन में छाया असमंजस|
उन पलों में जाने अटका क्यूँ,
जो बीत चुके हैं जीवन के,
कैसे पर इनसे लड़ पाऊँ,
जीवन में आया असमंजस|
कभी हुआ नहीं यह पहले था,
इसलिए अजीब सा लगता है,
कब तक सोचेगा, अब बस कर
जीवन तो है ही असमंजस||
बेक़सूर दिल
कभी इधर, कभी उधर,
भटकातीं है मन मेरा,
सब गलतियां करती हैं हूर,
दिल का मेरे क्या कसूर।
खुद ने दिया इतना प्यार,
बाँट बाँट के थका हूँ मैं,
पर ख़त्म नहीं होता सुरूर,
दिल का मेरे क्या कसूर।
दुनिया ने किया बदनाम मुझे,
तितलियाँ पकड़ता तो बचपन से था,
ठरकी थोड़ा मैं था ज़रूर,
दिल का मेरे क्या कसूर।
आँखों से खिची चली आयीं,
इशारों तक बात नहीं आयी,
पर कभी मैंने न किया गुरूर,
दिल का मेरे क्या कसूर।
चाह नहीं, ठहराव नहीं,
रुका नहीं मैं किसके लिए,
अपनी धुन में रहता मगरूर,
दिल का मेरे क्या कसूर।
मैखाने के पैमाने से,
कुछ कसर नहीं रखी बाकी,
आखिर कुछ तो बहकेगा,
इसमें दिल का मेरे क्या है कसूर।।
जब मिली थी तुम पहली बार
न भूला मैं वो आखों का दीदार,
सकपकाहट औ सकुचाहट वो,
दबी सी हँसी, सीने पे वार,
जब मिली थी तुम पहली बार।
न भूला मैं वो उड़ती जुल्फें,
पलछिन करती सी पलकें,
सारी रात रहा बेकरार,
जब मिली थी तुम पहली बार।
न भूला मैं वो अंगुलियां,
दबोचे थे बाल जिससे मेरे,
हाथ ना आये, खाली वार,
जब मिली थी तुम पहली बार।
न भूला मैं वो लाली,
जो लबों पे छायी थी तेरे,
उसी पल गया था दिल को हार,
जब मिली थी तुम पहली बार।
न भूला मैं वो नयन तेरे,
कजरारे से, शरमाते से,
तपस्या मेरी करी तार-तार,
जब मिली थी तुम पहली बार।
न भूला मैं वो बातें तेरी,
जो मुझसे कर न पाती थी,
रहा है मुझे तबसे इंतज़ार,
जब मिली थी तुम पहली बार।
न भूला मैं वो इठलाना तेरा,
जो मन मेरा मचला जाता था,
हारा मैं मती, बन गया गवार,
जब मिली थी तुम पहली बार।
ऐसा ही रहे, न भूलूँ मैं,
तेरा एहसास, तेरी हर सांस,
जब देखूं तुझे, लगे मुझे ऐसा,
कि मिली हो तुम पहली बार।।
परदेसी
हवा का झोंका मध्यम-२,
अपने संग ले कुछ उड़ा,
एक गुलाबी पंखुड़ी सा,
फूल नहीं वो ख़त था तेरा।
खिड़की थी खुली हुई ऐसे,
बंद भी न मैं कर पाया,
फुर्ती से तो लपका मैं,
पर कम्बख्त उड़ता ही गया।
पढने को खोला भी न था,
देख-२ ही आहें भर पाया,
थोड़ी देर तो पीछे दौड़ा मैं,
पड़ा खुला मैदान भारी पर।
इतने दिन की आँख मिचोली,
एक चुरायी हुई हसीं,
दिया अचानक मुझको ख़त,
तूने जाने के आखरी दिन।
ख़त के साथ पता भी गया,
ढूंढूंगा तुझको कैसे अब,
किसी पराये शहर मैं,
यही सोच-२ के बैठा हूँ।
पर शायद अच्छा ही हुआ,
परदेसी से प्यार नहीं टिकता,
इस बात से ही खुश हो लूँगा,
आखिर तूने ख़त तो लिखा॥
बे-बस
थका हारा चढ़ा मैं बस में,
बगल में आकर बैठ गयी वो,
नींद उसकी आँखों में झलकी,
मेरा कन्धा कब बना सिरहाना,
न वो समझी, न मैंने जाना,
उसको उठाने को मन न माना,
मेरा स्टॉप जाने कब निकला,
एक मक्खी परेशां करने लगी,
अखबार से पंखा करता रहा,
टिकट आखिर की ले दी उसकी,
टीटी कहीं उठा न दे उसको,
बस की यात्रा में जिंदगी सजा ली,
सोते में उसके चेहरे पर हँसी,
दिल ले गयी हमारा, कन्धा भी,
जैसे जैसे आखिर स्टॉप आने लगा,
हमारे दिल में टीस सी उठने लगी,
सोचा उठाऊँ उसको, पूछूं नाम,
पर कुछ कर न पाया,
आखिर बस रुक गयी,
आवाज लगी, सब उतरो,
वो उठ गयी, कुछ अनजान,
कंधे से उठी, शर्मिंदा सी,
हम कुछ कहने को हुए,
जो ख्वाब बुने थे बयां करूँ,
वो बाल सही करने लगी,
दुपट्टा भी ठीक किया उसने,
गला ठक रहा था अबतक,
तभी कुछ दिखा हमें,
फलक में शब्द रुक गए,
सारे अरमां खाख हुए,
छुपा हुआ था पल्लू में जो,
हमें दिखा उसका मंगलसूत्र।
