ArpitGarg's Weblog

An opinion of the world around me

Posts Tagged ‘Hindi

सो पाऊँ

leave a comment »

confusion.jpg

थोड़ी असमंजस में हूँ यारों,
किस राह चलूँ ये बूझूँ मैं,
या खटिया डाल के सो जाऊं?

कुछ करने को करे न मन,
बांधूं औ हो जाऊं कण-२,
या चादर ओढ़ के सो जाऊं?

खा के डाकारूं, डकार के खाऊं,
कभी हफ्ते-२ नहीं नहाऊँ,
या तकिया लगा के सो जाऊं?

आधे अधूरे ख्वाब हैं आते,
पूरा कैसे उनको कर पाऊँ?
या बत्ती बुझा के सो जाऊं?

दिल धक-२ कर धड़क उठे,
लगे के जैसे मैं उड़ जाऊं?
या ख्वाब संजो के सो जाऊं?

कुछ राह मिले, तो चाह मिले,
सुकून आये, जब साँझ ढले,
अब उठूँ, ताकि कल सो पाऊँ॥

Written by arpitgarg

January 12, 2016 at 11:02 pm

Posted in Hindi, Poetry

Tagged with , ,

प्यार नहीं तो कुछ भी नहीं

leave a comment »

love.jpg

सुना बहुत था, जाना नहीं,
यह एहसास होता बड़ा हसीं,
लगा था बस कहकहा यही,
प्यार नहीं तो कुछ भी नहीं।

हम जीते हैं औ मरते हैं,
जीवन हैं क्यों यह नहीं पता,
मरने से पहले हो एक बार,
प्यार नहीं तो कुछ भी नहीं।

कभी बातों बातों में हो जाता है,
कभी सर्द रातों में हो जाता है,
होता है तब कहता है दिल,
प्यार नहीं तो कुछ भी नहीं।

जो लगते थे खंडर उजाड़,
उनमें रंग जैसे भर जाते हैं,
औ हमसे यह कह जाते हैं,
प्यार नहीं तो कुछ भी नहीं।

समय थम सा कुछ जाता है,
पल सब पल-छिन हो जाते हैं,
हर टिक टिक बस यही सन्देश,
प्यार नहीं तो कुछ भी नहीं।

हर सपने सच्चे लगते हैं,
बेगाने भी अपने लगते हैं,
खुद बचा मर ना जाऊं कहीं,
प्यार नहीं तो कुछ भी नहीं।

पर क्या यह सब सच्चा है?
या पल भर का एक गच्चा है?
पता चलता सबको है खुद ही,
प्यार नहीं तो कुछ भी नहीं।।

Written by arpitgarg

November 25, 2015 at 8:06 pm

Posted in Hindi, Love, Poetry

Tagged with , ,

सीने की चुभन

leave a comment »

heart

कुछ उसने कहा औ चुप मैं रहा,
औ चुप मैं रहा, पर उसने सुना,
दिल की धड़कन, आह साँसों की,
माथे की शिकन, सीने की चुभन।

प्यार को उसके ठुकरा कर के,
अँखियन उसकी नम मैंने करी,
सोचा था कि सही राह है यह,
जाने फिर क्यूँ दिल यह तरसे।

बाहों में मेरे ऐसे लिपट गयी,
न आज रात तुझे जाने दूँगी,
अब तो जीवन की विरह है,
कुछ पल हैं बचे, दिल रोता ये।

कितना मजबूर महसूस करूँ,
जैसे हाथ काटे जालिम ने किसी,
औ पैरों को बेड़ियां जकड़ी हैं,
जैसे सजी चिता की लकड़ी हैं।

बस लिपट-२ के तू रोती रही,
मैं बेबस सा यह सब देख रहा,
एक बड़े अंतर्द्वंद से हूँ रहा जूझ,
खतम हुई मेरी सब सूझ बूझ।

वो पल हसीन कैसे भूलूँ मैं,
जो काटे जुल्फों के साये में तेरे,
मदहोश करती जो महक तेरी,
उसका आलम है आज तलक।

मेरा अंतर्मन ये कहता मुझसे,
यह जीवन जो न तेरे नाम किया,
वह पल जो न जियूँगा साथ तेरे,
अगले सब जनम तुझे मैंने दिए।।

Written by arpitgarg

November 16, 2015 at 4:09 pm

Posted in Hindi, Love, Poetry

Tagged with , , ,

देखा तुझे तो जाना ये

leave a comment »

दिल में नहीं था कोई गम,
खुशियाँ भी थीं मुझे भरपूर,
फिर भी अधूरा था जीवन,
देखा तुझे तो जाना ये।

अपनी मस्ती में ही जीता,
मन करा तो जरा-२ पीता,
यह सब तो बस मिथ्या थी,
देखा तुझे तो जाना ये।

सारा संसार ये था मेरा,
उत्तर दक्षिण, पूरब पश्चिम,
अधूरा था कितना बिन तेरे,
देखा तुझे तो जाना ये।

जीत बहुत सी मिलीं मुझे,
बहुत इनां मैंने जीते,
ख़ुशी जीत की होती क्या,
देखा तुझे तो जाना ये।

गुस्सा हमेशा रहा खड़ा,
हर किसी से जा-२ के मैं लड़ा,
बिन लड़े हारने में भी मज़ा,
देखा तुझे तो जाना ये।

अपनी बुद्धि पे बड़ा ताब,
अपनी प्रशंसा आपों आप,
बनके पगला फिरना कैसा,
देखा तुझे तो जाना ये।

था सब कुछ, पर कुछ कम,
न कहने वाला कोई सनम,
आँखों की नमीं क्या होती,
देखा तुझे तो जाना ये।

Written by arpitgarg

September 23, 2015 at 3:08 pm

Posted in Hindi, Poetry

Tagged with , ,

सच है

leave a comment »

दिल में उठा है दर्द सा कुछ,
रह रह कर के आता है,
सह सह कर के जीता हूँ,
हाँ ये सच है, मैं पीता हूँ।

भुन्नैटा सा यह जीवन क्यों,
सपने धरे सब, ज्यों के त्यों,
ख्वाइश तोड़-२ के सीता हूँ,
हाँ ये सच है, मैं पीता हूँ।

चहुँओर मेरे है हलचल सी,
पगला सा हूँ मैं देख रहा,
लो हाथ रख गीता पे कहूँ,
हाँ ये सच है, मैं पीता हूँ।

आँखें भर आती जब-तब,
मेरे हाथ भी कापें जाते हैं,
बोझ ये कब तक मैं सहूँ,
हाँ ये सच है, मैं पीता हूँ।

अपना जिसको माना था,
दिल था जिसके नाम किया,
समेटता मैं वही फजीता हूँ,
हाँ ये सच है, मैं पीता हूँ।

सब फुर्ती फुर्र हुई मेरी,
चाहते हैं भागूं खूब तेज,
इंसान हूँ, न मैं चीता हूँ,
हाँ ये सच है, मैं पीता हूँ।

वाद-विवाद न करना अब,
ठान लिया बस ठान लिया,
उलझन सारी अब सुलझा दूँ,
हाँ ये सच है, मैं पीता हूँ।।

Written by arpitgarg

February 25, 2015 at 3:57 am

Posted in Hindi, Poetry

Tagged with , , ,

पगली की याद

with 2 comments

क्या तुमने मुझको याद किया,
जब तूने मुझसे पुछा उस दिन,
क्यों बोलूं झूठ, न याद किया,
पगली याद करूँ गर भूलूँ मैं।

बात कभी अब तुम न करते,
लगता है मुझसे ऊब गए हो,
ऊबने की बात है कहाँ से आई,
पगली दिलचस्पी पूरी ले तो लूँ।

मिलने को बुलाती, तुम न आते,
हर पल बस दूर ही भागे जाते,
अपनी दूरी कैसे बढ़ सकती है,
पगली पास तो पूरा आ जाऊं।

सुनते ही नहीं, मैं बड़-२ करती,
बिलकुल भी मुझपे ध्यान नहीं,
अरे सोचूँ मैं कुछ और तो तब,
पगली ध्यान से पहले हटे तो तू।

सजके सँवरके आई थी मैं,
एक स्वर भी प्रशंसा नहीं करी,
कितनी मैं करूँ तारीफ तेरी,
पगली हर रोज परी है लगती तू।

व्रत था तुम्हारे लिए रखना,
डांट के तुमने मना किया क्यों,
तू सुनती मेरी क्या डांट बिना,
पगली तुझे भूखा कैसे देख सकूँ।

क्या तुमने मुझको याद किया,
जब तूने मुझसे पुछा उस दिन,
क्यों बोलूं झूठ, न याद किया,
पगली याद करूँ गर भूलूँ मैं।।

Written by arpitgarg

September 25, 2014 at 10:41 pm

Posted in Hindi, Love, Poetry

Tagged with , ,

गोलू मेरे पास है

leave a comment »

मुझे पढ़ते वक़्त कलम से कुछ भी लिखने/बनाने की आदत है। कोई चित्र, कोई शब्द, कुछ भी। यह मेरे ख्यालों से अपने आप निकलते हैं। “मैं गोलू के पास हूँ, गोलू मेरे पास है”, एक दिन पढ़ते वक़्त मैं यह लिख बैठा किताब पे। कुछ देर के पश्चात, मेरा एक मित्र मुझसे मिलने आया और उसकी नज़र इस लाइन पे पड़ गयी। वह हंस-२ के लोटपोट हो गया।

इस किस्से को करीब १० साल हो गए, पर मेरा मित्र इसे भूल नहीं पाया। न ही उसने मुझे भूलने दिया। जबतब वह मेरी टांग खींचता रहता है, इस बात पर।

मित्रों ऐसे कितने ही किस्से हो जाते हैं जीवन में। कुछ हम संजोह पाते हैं, कुछ धुंधले हो जाते हैं। दोस्त भी ऐसे ही एक किस्से की तरह होते हैं। कुछ से हम संपर्क में रहते हैं, कुछ अतीत का हिस्सा बनकर रह जाते हैं। कितना अच्छा हो अगर हम ऐसी हर याद को अपने पास रख पाएं, जब तब अनुभव कर पाएं उस एहसास का।

एक अंग्रेजी चित्रपट में दिखाया गया था की कैसे हम अपने मष्तिष्क में अपनी हर याद को संझोह के रख सकते हैं। हम एक ऐसी दुनिया बसा सकते हैं जिसमें हमें अपने सारे मित्र, परिवार, एक साथ रहने का आभास दें। बस आँखें बंद करें और डूब जाएँ अपनी यादों के समुन्दर में।

गोलू भी वही दर्शाता है। मैं गोलू के करीब उतना ही हूँ, जितना गोलू मेरे करीब रहना चाहता है। यह एक दुराही मार्ग है। कोई याद अगर कड़वी है, तो उसे हम कहीं गहराई में दफना देते हैं। गोलू और मैं दूरी बना लेते हैं।

जिन लोगों से हम संपर्क में रहते हैं, वह लोग हमसे संपर्क में रहना चाहते हैं। वह हमारे लिए गोलू होते हैं, हम उनके लिए गोलू होते हैं। अत: मैं गोलू के पास हूँ, गोलू मेरे पास है।

Written by arpitgarg

September 23, 2014 at 8:56 pm

Posted in Hindi, Prose

Tagged with , , ,

बेचैन दिल

with 2 comments

दिल रहता है बेचैनी में,
जाने क्यों मेरा कबसे,
हर आहट से है लगता ये,
कि आई वो मेरी चौखट।

आँखें मेरी तरस गयीं,
न हुआ पर दीदार मुझे,
मर्ज़ जो है मुझे लगा,
कोई इलाज़ पता तुझे।

रातों को करता हूँ गिनती,
तारे तो अनगिनत ठहरे,
झींगुर की झन-झन भी अब,
मुझको लगने लगी लोरी।

हवा के हर एक झौंके से,
मन तड़पा मेरा जाता है,
स्पर्श नहीं कुछ सुगंध सही,
क्यों लाता अपने साथ नहीं।

कोई कोयल कूकी डाली पे,
लगा कि संदेशा है लायी,
न तू लायी कोई बात नहीं,
एक मेरा संदेशा पहुंचा दे।

चांदनी में भीगा हर कण,
मुझे अपना सा लगता है,
इसी चांदनी को यार मेरा,
ओढ़ रहा होगा इस पल।

कहते हैं घूमती धरती है,
धुरी पे अपनी हर एक पल,
थम जाऊं गर मैं इस क्षण,
क्या धरती मुझे मिला देगी॥

Written by arpitgarg

September 17, 2014 at 2:33 pm

Posted in Hindi, Love, Poetry

Tagged with , , , ,

अच्छे दिन आने वाले हैं

leave a comment »

अलग-२ दल लगाएं अलग-२ नारे,
सब दौड़ें हितैषी बनने को हमारे,
टर्राने लगे हैं जैसे मेंढक बरसात में,
कुछ दिन तो गुजारिये गुजरात में।

कोई फेंके है रोटी, ललचाये है पैसा,
निकाले हैं आंसू, नाटक कैसा कैसा,
वादे झूठे सुनाकर, करे सीट पक्की,
हर हाथ शक्ति, हर हाथ तरक्की।

अभी की नहीं, रीत है ये पुरानी,
राजा की बेटी, हुई मुल्क की रानी,
सालों तक रखा, सबको हक़ से दूर,
एक शेरनी सौ लंगूर, चिकमंगलूर।

रुक रुक के बोले, बड़े हौले हौले,
विरोध मेरा, ये अच्छी बात नहीं है,
सबका होगा भला, नर हो या नारी,
चुनो अबकी बारी अटल बिहारी।

बाप और बेटा, साईकल पे डोलें,
सद्भावना फ़ैलाने की बात बोलें,
फूल को मसलें, रोकें हाथी का दम,
यूपी में है दम, जुर्म हैं यहाँ कम।

सरपट मैं दौड़ा, हो रेस का घोडा,
दर-२ पे भटका, भूका औ प्यासा,
जीतते ही हम भर पेट खाना वाले हैं,
क्योंकि अच्छे दिन आने वाले हैं।।

Written by arpitgarg

September 17, 2014 at 3:03 am

दाढ़ी वाले बाबा

leave a comment »

कुछ बचपन की यादें ताजा,
करता हूँ तो उठते कुछ सवाल,
सुना बहुत, पर होता क्या है?
टिंडे की जड़ औ बाल की खाल।

बाजार से जा दो टिंडे लाया,
सुबह से शाम किया उन्हें हलाल,
लेकिन फिर भी ढूंढ न पाया,
टिंडे की जड़ औ बाल की खाल।

सुबह मैं तड़के नाई के पहुंचा,
औ सफा कराया एक एक बाल,
घिर गयी रात पर हाथ न आई,
टिंडे की जड़ औ बाल की खाल।

जब कभी मचाया था ऊधम,
जोर से मरोड़ा गया था कान,
एक बार जो तू हाथ में आएगा,
चूहे की कोठरी में डाला जाएगा।

पूरे दो दिन से जगा हुआ हूँ,
चूहों के पीछे ही लगा हुआ हूँ,
हर संभव मैंने कोशिश की,
पर न मिली कोठरी चूहे की।

एक और किस्सा याद आता है,
डराया करती थी जब माँ मुझको,
बेटा अगर तू खाना नहीं खायेगा,
दाढ़ी वाला बाबा उठा ले जाएगा।

एक दिन सोचा कि व्रत मैं करूँ,
औ दिन भर कुछ न खाऊँ पियूं,
चौखट पर बैठा टकटकी लगाये,
पर दाढ़ी वाले बाबा नहीं आये।।

Written by arpitgarg

September 16, 2014 at 1:24 am