Archive for the ‘Poetry’ Category
बेचैन दिल
दिल रहता है बेचैनी में,
जाने क्यों मेरा कबसे,
हर आहट से है लगता ये,
कि आई वो मेरी चौखट।
आँखें मेरी तरस गयीं,
न हुआ पर दीदार मुझे,
मर्ज़ जो है मुझे लगा,
कोई इलाज़ पता तुझे।
रातों को करता हूँ गिनती,
तारे तो अनगिनत ठहरे,
झींगुर की झन-झन भी अब,
मुझको लगने लगी लोरी।
हवा के हर एक झौंके से,
मन तड़पा मेरा जाता है,
स्पर्श नहीं कुछ सुगंध सही,
क्यों लाता अपने साथ नहीं।
कोई कोयल कूकी डाली पे,
लगा कि संदेशा है लायी,
न तू लायी कोई बात नहीं,
एक मेरा संदेशा पहुंचा दे।
चांदनी में भीगा हर कण,
मुझे अपना सा लगता है,
इसी चांदनी को यार मेरा,
ओढ़ रहा होगा इस पल।
कहते हैं घूमती धरती है,
धुरी पे अपनी हर एक पल,
थम जाऊं गर मैं इस क्षण,
क्या धरती मुझे मिला देगी॥
अच्छे दिन आने वाले हैं
अलग-२ दल लगाएं अलग-२ नारे,
सब दौड़ें हितैषी बनने को हमारे,
टर्राने लगे हैं जैसे मेंढक बरसात में,
कुछ दिन तो गुजारिये गुजरात में।
कोई फेंके है रोटी, ललचाये है पैसा,
निकाले हैं आंसू, नाटक कैसा कैसा,
वादे झूठे सुनाकर, करे सीट पक्की,
हर हाथ शक्ति, हर हाथ तरक्की।
अभी की नहीं, रीत है ये पुरानी,
राजा की बेटी, हुई मुल्क की रानी,
सालों तक रखा, सबको हक़ से दूर,
एक शेरनी सौ लंगूर, चिकमंगलूर।
रुक रुक के बोले, बड़े हौले हौले,
विरोध मेरा, ये अच्छी बात नहीं है,
सबका होगा भला, नर हो या नारी,
चुनो अबकी बारी अटल बिहारी।
बाप और बेटा, साईकल पे डोलें,
सद्भावना फ़ैलाने की बात बोलें,
फूल को मसलें, रोकें हाथी का दम,
यूपी में है दम, जुर्म हैं यहाँ कम।
सरपट मैं दौड़ा, हो रेस का घोडा,
दर-२ पे भटका, भूका औ प्यासा,
जीतते ही हम भर पेट खाना वाले हैं,
क्योंकि अच्छे दिन आने वाले हैं।।
दाढ़ी वाले बाबा
कुछ बचपन की यादें ताजा,
करता हूँ तो उठते कुछ सवाल,
सुना बहुत, पर होता क्या है?
टिंडे की जड़ औ बाल की खाल।
बाजार से जा दो टिंडे लाया,
सुबह से शाम किया उन्हें हलाल,
लेकिन फिर भी ढूंढ न पाया,
टिंडे की जड़ औ बाल की खाल।
सुबह मैं तड़के नाई के पहुंचा,
औ सफा कराया एक एक बाल,
घिर गयी रात पर हाथ न आई,
टिंडे की जड़ औ बाल की खाल।
जब कभी मचाया था ऊधम,
जोर से मरोड़ा गया था कान,
एक बार जो तू हाथ में आएगा,
चूहे की कोठरी में डाला जाएगा।
पूरे दो दिन से जगा हुआ हूँ,
चूहों के पीछे ही लगा हुआ हूँ,
हर संभव मैंने कोशिश की,
पर न मिली कोठरी चूहे की।
एक और किस्सा याद आता है,
डराया करती थी जब माँ मुझको,
बेटा अगर तू खाना नहीं खायेगा,
दाढ़ी वाला बाबा उठा ले जाएगा।
एक दिन सोचा कि व्रत मैं करूँ,
औ दिन भर कुछ न खाऊँ पियूं,
चौखट पर बैठा टकटकी लगाये,
पर दाढ़ी वाले बाबा नहीं आये।।
भक् साला
जब दिखी कोई सुन्दर कन्या,
मन मचला सा क्यों जाता है,
जैसे बिन चाबी का ताला,
दिल करे कि बोलूं भक् साला।
उस दिन तो यारों हद हो गयी,
घर का रास्ता ही भटक गया,
कोई वशी-इत्र उसने डाला,
दिल करे कि बोलूं भक् साला।
सब्जी लेने को गया था मैं,
वहां किलो-२ भर तोल रही,
धनिया भी मुफ्त में न डाला,
दिल करे कि बोलूं भक् साला।
सोचा चलो जांच मैं करवा लूँ,
आँखें हैं ठीक, बोली डॉक्टर,
पर चरित्र है तेरा कुछ काला,
दिल करे कि बोलूं भक् साला।
फूलों की टोकरी, रख सर पर,
बेच रही वो, लगा पुकार,
मेरे मन ने बना ली वरमाला,
दिल करे कि बोलूं भक् साला।
सोचा कई बार, त्याग दूँ सब,
आखिर कब तक करूंगा मैं,
मस्ती तफरी, और मधुशाला,
चल हट दिल नौटंकी साला।।
कश्मीर त्रासदी: माँ के आंसू
न देखा कभी सैलाब ऐसा,
क्या ऐसी भूल मुझसे हुई,
चहुंओर नीर तांडव पसरा,
लगा रात रोई है माँ मेरी।
प्रकृति कहर था सुना बहुत,
दिखा तो मेरी रूह काँपी,
जल-थल आपस में समा गए,
लगा रात रोई है माँ मेरी।
धन-धान सबकुछ तबाह हुआ,
मुह मोड़ तूने न सुनी दुआ,
हिम्मत भी मेरी डगा गयी,
लगा रात रोई है माँ मेरी।
बन्दूक से दुश्मन करता वार,
सह जाता वो भी एक बार,
पन-हमले से ऐसा लाचार,
लगा रात रोई है माँ मेरी।
हूँ दाने-दाने को मोहताज,
अपनों से भी मैं बिछड़ गया,
है नदी जहाँ था भरा बाजार,
लगा रात रोई है माँ मेरी।
मानव, जंतु सब बहे निढाल,
मेरा घर क्यों तूने छीन लिया,
अमृत ही है विष बन बैठा ,
लगा रात रोई है माँ मेरी।
डर लगता मुझको सन्नाटा,
दुआ आज मैं बस यही करूँ,
हिम्मत मुझको देना दाता,
माँ के आंसू मैं पौंछ सकूँ।।
वो रात
बहुत दिनों चली आंखों-२ में बात,
आज हो गयी सच में मुलाक़ात,
बहाने मिले, न ढूँढने पड़े,
तभी थे आमने सामने खड़े।
वो आई कपड़े पहनकर गुलाबी,
उसके कजरारे नैन लग रहे शराबी,
बड़ी मासूमियत से मुखवाणी निकाली,
है उसकी जुल्फें या घटा काली-काली।
आज लग रही वो सम्पूर्ण नारी,
पांडू के बाद हाय मेरी मती हारी,
कामदेव का बाण चल ही गया,
सारा संसार लगने लगा नया।
होने लगी पुष्प की वर्षा,
बजने लगी प्रेम की त्रिवेणी,
इतने दिनों का इंतज़ार,
कर रहा था हमें जार-जार।
लगा था जैसे बीती हों सदियाँ,
बहने दो आज स्नेह की नदियाँ
बंधे सारे तार, झुके सारे नैन,
दिल को करार औ हृदय को चैन।
दो जिस्म एक हो ही गए,
दोनों के नयन भी एक हुए,
उसके गाल पर काला तिल,
बन ही गया हमारा दिल।।
इतना हक़ भी नहीं?
रूठा जो मुझसे उस दिन,
कहीं वो मेरा रब तो नहीं,
पुछा था तूने जिस दिन,
अब मेरा इतना हक़ भी नहीं?
तक़दीर ने कैसी चाल चली,
मुड़ बैठा, जाना न जिस गली,
धड़का दिल, इसमें तो शक नहीं,
अब मेरा इतना हक़ भी नहीं?
कसूर न इसमें दोनों का,
खेल नहीं था खिलौनों का,
पत्तों की इमारत, ऐसी ढही,
अब मेरा इतना हक़ भी नहीं?
खुश हो तू, इतनी दुआ करूँ,
तेरे अश्रु झरे, बहुतेरा डरूँ,
कुछ देर की अब ये बात रही,
अब मेरा इतना हक़ भी नहीं?
वादे न थे कुछ हमने किये,
फिर भी क्यों ऐसी उठे तीस ,
जैसे लहू लाल हो जाए बही,
अब मेरा इतना हक़ भी नहीं?
समय का पहिया सीधा चलता,
साँझ पहर ही सूरज ढलता,
उल्टा चल दे, ये आस रही,
अब मेरा इतना हक़ भी नहीं?
हूँ खुशियों में तेरी शामिल,
गम को मैं तुझसे गलत करूँ,
खोजूं ईश्वर, होगा तो कहीं,
अब मेरा इतना हक़ भी नहीं?
गुमसुम
शून्य को बैठा ताक रहा,
जाने क्यों बगलें झाँक रहा,
अपनी मस्ती में था झूमा,
रहने लगा तू क्यों गुमसुम।
हर ओर तरंगें बिखरी थी,
घनघोर घटाएं छितरी सी,
हंसने से सवेरा होता था,
रहने लगा तू क्यों गुमसुम।
चलने से थिरकन होती थी,
धू-२ के शिकन न होती थी,
हर वाद-विवाद में था अव्वल,
रहने लगा तू क्यों गुमसुम।
कुल दीपक तू कहलाया था,
माहौल हुआ गरमाया सा,
अग्नि तपिश थी लगती नम,
रहने लगा तू क्यों गुमसुम।
सर माथे तुझे लगाते सब,
मूरत न कोई, अपना तू रब,
तू कलाबाज, मस्ती करतब,
रहने लगा तू क्यों गुमसुम।
प्रश्न का हर, तू था उत्तर,
हर दांव रहा मीले पत्थर,
ध्वनि तेरी धरती कम्पन,
रहने लगा तू क्यों गुमसुम।
काजल से काली रात है यह,
डूबे सब, कहर बरसात ठहे,
कठिन पहर, न आये समझ,
रहने लगा तू क्यों गुमसुम।।
एक-दो दिन
वो ट्यूशन पढ़ने आती थी,
औ मन को मेरे भाती थी,
जरा जरा इठलाती थी,
कुछ ज्यादा ही इतराती थी।
मैं रहता था आगे बैठा,
वो पीछे बैठी हुई कहीं,
अपनी किस्मत से था चैंटा,
कि बात तो अबतक हुई नहीं।
घुंघराले बाल जो थे उसके,
कभी आँखों पे आ जाते थे,
कर दिए जाने कितने नुस्के,
शब्द हलक में ही रह जाते थे।
ऊब भरा एक दौर था वो,
दिमाग भी कुछ और था वो,
नंबर लाने में लगा रहा,
दिल से अपने ही दगा रहा।
हंसी कुछ उसकी वैसी थी,
कि तितली भी शर्मा जाए,
सुंदरता उसकी ऐसी थी,
नीरसता में बहार छाए।
कुर्ती उसकी जो रंग पीला,
मुझपे पक्का कुछ ऐसा चढ़ा,
आसमान फिर क्या नीला,
बुद्धि पे पत्थर जैसे पड़ा।
पहल नहीं पर मैंने करी,
कर्म में खुद को झौंक दिया,
चाहे फिर हो वो स्वप्न-परी,
दृढ़ प्रण कुछ ऐसा लिया।
पत्थर दिल पहुंचे कालेज ,
प्यार तो बस उससे ही था,
एक-दो दिन की देर थी बस,
किसी और पे जा अटका॥
