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Archive for the ‘Hindi’ Category

पगली की याद

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क्या तुमने मुझको याद किया,
जब तूने मुझसे पुछा उस दिन,
क्यों बोलूं झूठ, न याद किया,
पगली याद करूँ गर भूलूँ मैं।

बात कभी अब तुम न करते,
लगता है मुझसे ऊब गए हो,
ऊबने की बात है कहाँ से आई,
पगली दिलचस्पी पूरी ले तो लूँ।

मिलने को बुलाती, तुम न आते,
हर पल बस दूर ही भागे जाते,
अपनी दूरी कैसे बढ़ सकती है,
पगली पास तो पूरा आ जाऊं।

सुनते ही नहीं, मैं बड़-२ करती,
बिलकुल भी मुझपे ध्यान नहीं,
अरे सोचूँ मैं कुछ और तो तब,
पगली ध्यान से पहले हटे तो तू।

सजके सँवरके आई थी मैं,
एक स्वर भी प्रशंसा नहीं करी,
कितनी मैं करूँ तारीफ तेरी,
पगली हर रोज परी है लगती तू।

व्रत था तुम्हारे लिए रखना,
डांट के तुमने मना किया क्यों,
तू सुनती मेरी क्या डांट बिना,
पगली तुझे भूखा कैसे देख सकूँ।

क्या तुमने मुझको याद किया,
जब तूने मुझसे पुछा उस दिन,
क्यों बोलूं झूठ, न याद किया,
पगली याद करूँ गर भूलूँ मैं।।

Written by arpitgarg

September 25, 2014 at 10:41 pm

Posted in Hindi, Love, Poetry

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गोलू मेरे पास है

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मुझे पढ़ते वक़्त कलम से कुछ भी लिखने/बनाने की आदत है। कोई चित्र, कोई शब्द, कुछ भी। यह मेरे ख्यालों से अपने आप निकलते हैं। “मैं गोलू के पास हूँ, गोलू मेरे पास है”, एक दिन पढ़ते वक़्त मैं यह लिख बैठा किताब पे। कुछ देर के पश्चात, मेरा एक मित्र मुझसे मिलने आया और उसकी नज़र इस लाइन पे पड़ गयी। वह हंस-२ के लोटपोट हो गया।

इस किस्से को करीब १० साल हो गए, पर मेरा मित्र इसे भूल नहीं पाया। न ही उसने मुझे भूलने दिया। जबतब वह मेरी टांग खींचता रहता है, इस बात पर।

मित्रों ऐसे कितने ही किस्से हो जाते हैं जीवन में। कुछ हम संजोह पाते हैं, कुछ धुंधले हो जाते हैं। दोस्त भी ऐसे ही एक किस्से की तरह होते हैं। कुछ से हम संपर्क में रहते हैं, कुछ अतीत का हिस्सा बनकर रह जाते हैं। कितना अच्छा हो अगर हम ऐसी हर याद को अपने पास रख पाएं, जब तब अनुभव कर पाएं उस एहसास का।

एक अंग्रेजी चित्रपट में दिखाया गया था की कैसे हम अपने मष्तिष्क में अपनी हर याद को संझोह के रख सकते हैं। हम एक ऐसी दुनिया बसा सकते हैं जिसमें हमें अपने सारे मित्र, परिवार, एक साथ रहने का आभास दें। बस आँखें बंद करें और डूब जाएँ अपनी यादों के समुन्दर में।

गोलू भी वही दर्शाता है। मैं गोलू के करीब उतना ही हूँ, जितना गोलू मेरे करीब रहना चाहता है। यह एक दुराही मार्ग है। कोई याद अगर कड़वी है, तो उसे हम कहीं गहराई में दफना देते हैं। गोलू और मैं दूरी बना लेते हैं।

जिन लोगों से हम संपर्क में रहते हैं, वह लोग हमसे संपर्क में रहना चाहते हैं। वह हमारे लिए गोलू होते हैं, हम उनके लिए गोलू होते हैं। अत: मैं गोलू के पास हूँ, गोलू मेरे पास है।

Written by arpitgarg

September 23, 2014 at 8:56 pm

Posted in Hindi, Prose

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बेचैन दिल

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दिल रहता है बेचैनी में,
जाने क्यों मेरा कबसे,
हर आहट से है लगता ये,
कि आई वो मेरी चौखट।

आँखें मेरी तरस गयीं,
न हुआ पर दीदार मुझे,
मर्ज़ जो है मुझे लगा,
कोई इलाज़ पता तुझे।

रातों को करता हूँ गिनती,
तारे तो अनगिनत ठहरे,
झींगुर की झन-झन भी अब,
मुझको लगने लगी लोरी।

हवा के हर एक झौंके से,
मन तड़पा मेरा जाता है,
स्पर्श नहीं कुछ सुगंध सही,
क्यों लाता अपने साथ नहीं।

कोई कोयल कूकी डाली पे,
लगा कि संदेशा है लायी,
न तू लायी कोई बात नहीं,
एक मेरा संदेशा पहुंचा दे।

चांदनी में भीगा हर कण,
मुझे अपना सा लगता है,
इसी चांदनी को यार मेरा,
ओढ़ रहा होगा इस पल।

कहते हैं घूमती धरती है,
धुरी पे अपनी हर एक पल,
थम जाऊं गर मैं इस क्षण,
क्या धरती मुझे मिला देगी॥

Written by arpitgarg

September 17, 2014 at 2:33 pm

Posted in Hindi, Love, Poetry

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अच्छे दिन आने वाले हैं

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अलग-२ दल लगाएं अलग-२ नारे,
सब दौड़ें हितैषी बनने को हमारे,
टर्राने लगे हैं जैसे मेंढक बरसात में,
कुछ दिन तो गुजारिये गुजरात में।

कोई फेंके है रोटी, ललचाये है पैसा,
निकाले हैं आंसू, नाटक कैसा कैसा,
वादे झूठे सुनाकर, करे सीट पक्की,
हर हाथ शक्ति, हर हाथ तरक्की।

अभी की नहीं, रीत है ये पुरानी,
राजा की बेटी, हुई मुल्क की रानी,
सालों तक रखा, सबको हक़ से दूर,
एक शेरनी सौ लंगूर, चिकमंगलूर।

रुक रुक के बोले, बड़े हौले हौले,
विरोध मेरा, ये अच्छी बात नहीं है,
सबका होगा भला, नर हो या नारी,
चुनो अबकी बारी अटल बिहारी।

बाप और बेटा, साईकल पे डोलें,
सद्भावना फ़ैलाने की बात बोलें,
फूल को मसलें, रोकें हाथी का दम,
यूपी में है दम, जुर्म हैं यहाँ कम।

सरपट मैं दौड़ा, हो रेस का घोडा,
दर-२ पे भटका, भूका औ प्यासा,
जीतते ही हम भर पेट खाना वाले हैं,
क्योंकि अच्छे दिन आने वाले हैं।।

Written by arpitgarg

September 17, 2014 at 3:03 am

दाढ़ी वाले बाबा

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कुछ बचपन की यादें ताजा,
करता हूँ तो उठते कुछ सवाल,
सुना बहुत, पर होता क्या है?
टिंडे की जड़ औ बाल की खाल।

बाजार से जा दो टिंडे लाया,
सुबह से शाम किया उन्हें हलाल,
लेकिन फिर भी ढूंढ न पाया,
टिंडे की जड़ औ बाल की खाल।

सुबह मैं तड़के नाई के पहुंचा,
औ सफा कराया एक एक बाल,
घिर गयी रात पर हाथ न आई,
टिंडे की जड़ औ बाल की खाल।

जब कभी मचाया था ऊधम,
जोर से मरोड़ा गया था कान,
एक बार जो तू हाथ में आएगा,
चूहे की कोठरी में डाला जाएगा।

पूरे दो दिन से जगा हुआ हूँ,
चूहों के पीछे ही लगा हुआ हूँ,
हर संभव मैंने कोशिश की,
पर न मिली कोठरी चूहे की।

एक और किस्सा याद आता है,
डराया करती थी जब माँ मुझको,
बेटा अगर तू खाना नहीं खायेगा,
दाढ़ी वाला बाबा उठा ले जाएगा।

एक दिन सोचा कि व्रत मैं करूँ,
औ दिन भर कुछ न खाऊँ पियूं,
चौखट पर बैठा टकटकी लगाये,
पर दाढ़ी वाले बाबा नहीं आये।।

Written by arpitgarg

September 16, 2014 at 1:24 am

भक् साला

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जब दिखी कोई सुन्दर कन्या,
मन मचला सा क्यों जाता है,
जैसे बिन चाबी का ताला,
दिल करे कि बोलूं भक् साला।

उस दिन तो यारों हद हो गयी,
घर का रास्ता ही भटक गया,
कोई वशी-इत्र उसने डाला,
दिल करे कि बोलूं भक् साला।

सब्जी लेने को गया था मैं,
वहां किलो-२ भर तोल रही,
धनिया भी मुफ्त में न डाला,
दिल करे कि बोलूं भक् साला।

सोचा चलो जांच मैं करवा लूँ,
आँखें हैं ठीक, बोली डॉक्टर,
पर चरित्र है तेरा कुछ काला,
दिल करे कि बोलूं भक् साला।

फूलों की टोकरी, रख सर पर,
बेच रही वो, लगा पुकार,
मेरे मन ने बना ली वरमाला,
दिल करे कि बोलूं भक् साला।

सोचा कई बार, त्याग दूँ सब,
आखिर कब तक करूंगा मैं,
मस्ती तफरी, और मधुशाला,
चल हट दिल नौटंकी साला।।

Written by arpitgarg

September 15, 2014 at 3:01 am

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कश्मीर त्रासदी: माँ के आंसू

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न देखा कभी सैलाब ऐसा,
क्या ऐसी भूल मुझसे हुई,
चहुंओर नीर तांडव पसरा,
लगा रात रोई है माँ मेरी।

प्रकृति कहर था सुना बहुत,
दिखा तो मेरी रूह काँपी,
जल-थल आपस में समा गए,
लगा रात रोई है माँ मेरी।

धन-धान सबकुछ तबाह हुआ,
मुह मोड़ तूने न सुनी दुआ,
हिम्मत भी मेरी डगा गयी,
लगा रात रोई है माँ मेरी।

बन्दूक से दुश्मन करता वार,
सह जाता वो भी एक बार,
पन-हमले से ऐसा लाचार,
लगा रात रोई है माँ मेरी।

हूँ दाने-दाने को मोहताज,
अपनों से भी मैं बिछड़ गया,
है नदी जहाँ था भरा बाजार,
लगा रात रोई है माँ मेरी।

मानव, जंतु सब बहे निढाल,
मेरा घर क्यों तूने छीन लिया,
अमृत ही है विष बन बैठा ,
लगा रात रोई है माँ मेरी।

डर लगता मुझको सन्नाटा,
दुआ आज मैं बस यही करूँ,
हिम्मत मुझको देना दाता,
माँ के आंसू मैं पौंछ सकूँ।।

Written by arpitgarg

September 14, 2014 at 4:23 am

वो रात

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बहुत दिनों चली आंखों-२ में बात,
आज हो गयी सच में मुलाक़ात,
बहाने मिले, न ढूँढने पड़े,
तभी थे आमने सामने खड़े।

वो आई कपड़े पहनकर गुलाबी,
उसके कजरारे नैन लग रहे शराबी,
बड़ी मासूमियत से मुखवाणी निकाली,
है उसकी जुल्फें या घटा काली-काली।

आज लग रही वो सम्पूर्ण नारी,
पांडू के बाद हाय मेरी मती हारी,
कामदेव का बाण चल ही गया,
सारा संसार लगने लगा नया।

होने लगी पुष्प की वर्षा,
बजने लगी प्रेम की त्रिवेणी,
इतने दिनों का इंतज़ार,
कर रहा था हमें जार-जार।

लगा था जैसे बीती हों सदियाँ,
बहने दो आज स्नेह की नदियाँ
बंधे सारे तार, झुके सारे नैन,
दिल को करार औ हृदय को चैन।

दो जिस्म एक हो ही गए,
दोनों के नयन भी एक हुए,
उसके गाल पर काला तिल,
बन ही गया हमारा दिल।।

Written by arpitgarg

September 10, 2014 at 5:38 pm

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अगले जनम

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झटक हाथ तेरा चल दिया,
अकेला तुझे छोड़ कर,
जीता हूँ अब इसी भरम,
अगले जनम हो पूरी कसम।

गलती नहीं की मैंने कोई,
शायद ईश्वर की थी मर्जी,
इस जीवन रहा अधूरा करम,
अगले जनम हो पूरी कसम।

समय से न कोई जीत सका,
मैं भी ठहरा बस हाड मांस,
न बदले सच, कर-२ परिश्रम,
अगले जनम हो पूरी कसम।

बेगाना तुझे बनाकर रोता हूँ,
दिन रात आंसू पी पीकर,
तुझे अपना कहा बिना शरम,
अगले जनम हो पूरी कसम।

कुछ ज्यादा ही मजबूर हूँ मैं,
अपने फंदों में फंसा हुआ,
जो मैंने किया वो मेरा धरम,
अगले जनम हो पूरी कसम।

रात ढली कुछ काली ये,
आगे कुछ न दिख रहा अभी,
कठिन डगर, न पड़ तू नरम,
अगले जनम हो पूरी कसम।

बस दुआ यही मैं करता हूँ,
खुशहाल रहे तेरा जीवन,
रह गयी अधूरी जो इस जनम,
अगले जनम हो पूरी कसम।।

Written by arpitgarg

September 8, 2014 at 1:31 am

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इतना हक़ भी नहीं?

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रूठा जो मुझसे उस दिन,
कहीं वो मेरा रब तो नहीं,
पुछा था तूने जिस दिन,
अब मेरा इतना हक़ भी नहीं?

तक़दीर ने कैसी चाल चली,
मुड़ बैठा, जाना न जिस गली,
धड़का दिल, इसमें तो शक नहीं,
अब मेरा इतना हक़ भी नहीं?

कसूर न इसमें दोनों का,
खेल नहीं था खिलौनों का,
पत्तों की इमारत, ऐसी ढही,
अब मेरा इतना हक़ भी नहीं?

खुश हो तू, इतनी दुआ करूँ,
तेरे अश्रु झरे, बहुतेरा डरूँ,
कुछ देर की अब ये बात रही,
अब मेरा इतना हक़ भी नहीं?

वादे न थे कुछ हमने किये,
फिर भी क्यों ऐसी उठे तीस ,
जैसे लहू लाल हो जाए बही,
अब मेरा इतना हक़ भी नहीं?

समय का पहिया सीधा चलता,
साँझ पहर ही सूरज ढलता,
उल्टा चल दे, ये आस रही,
अब मेरा इतना हक़ भी नहीं?

हूँ खुशियों में तेरी शामिल,
गम को मैं तुझसे गलत करूँ,
खोजूं ईश्वर, होगा तो कहीं,
अब मेरा इतना हक़ भी नहीं?

Written by arpitgarg

September 2, 2014 at 9:41 pm

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