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Archive for the ‘Hindi’ Category

परदेसी

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हवा का झोंका मध्यम-२,
अपने संग ले कुछ उड़ा,
एक गुलाबी पंखुड़ी सा,
फूल नहीं वो ख़त था तेरा।

खिड़की थी खुली हुई ऐसे,
बंद भी न मैं कर पाया,
फुर्ती से तो लपका मैं,
पर कम्बख्त उड़ता ही गया।

पढने को खोला भी न था,
देख-२ ही आहें भर पाया,
थोड़ी देर तो पीछे दौड़ा मैं,
पड़ा खुला मैदान भारी पर।

इतने दिन की आँख मिचोली,
एक चुरायी हुई हसीं,
दिया अचानक मुझको ख़त,
तूने जाने के आखरी दिन।

ख़त के साथ पता भी गया,
ढूंढूंगा तुझको कैसे अब,
किसी पराये शहर मैं,
यही सोच-२ के बैठा हूँ।

पर शायद अच्छा ही हुआ,
परदेसी से प्यार नहीं टिकता,
इस बात से ही खुश हो लूँगा,
आखिर तूने ख़त तो लिखा॥

Written by arpitgarg

September 22, 2013 at 9:47 pm

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औ मैं सो जाऊं

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निकला था मंजिल की ओर,
अच्छा हो रास्ता खो जाऊं,
एक चाह अधूरी हो पूरी,
हो अँधेरा औ मैं सो जाऊं॥

हैं थकी थकी आँखें मेरी,
औ फटी फटी सी बातें हैं,
पूछ-२ पता मैं त्रस्त हुआ,
न ही मिले, अब यही दुआ॥

जब खाने को हो फ़क्त हवा,
औ पीने को आंसूं न कम हौं,
थर-२ कर काँपे देह मेरी,
चाहे भट्टी सी गरमाई हो॥

नाम ख़ाक, काहे की साख,
झुका के सर, औ कटा नाक,
केशों में रेंगती जूं भी अब,
मेरा लहू पीने से बचती है॥

देखा था सपना जो कभी,
बस धुंधला सा याद आता है,
ताश के पत्तों से बने महल,
क्या हवा का झोंका सह पाए?

जन्नत हैं जाना सब चाहते,
ऐसा हो जहन्नुम मैं जाऊं,
एक चाह अधूरी हो पूरी,
हो अँधेरा औ मैं सो जाऊं॥

Written by arpitgarg

September 20, 2013 at 6:36 pm

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मन की सुन

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गम को लेकर दुनिया भर का,
खुद को क्यों ग़मगीन करूँ,
क्यों इंतज़ार दिन ढलने का,
मैं आँखें क्यों ना बंद करूं।

क्यों चौबेजी मैं बन बैठूँ,
जब छब्बे बनकर मस्त रहूं,
माथे पर क्यों पड़ने दूं बल,
जब खाऊं पियूं बलवान रहूँ।

सोच सोच के क्यों हारूं,
जब हरा हरा के सुचवाऊँ,
इज्जत पे मेरी बन आये,
इतना भी इज्जतदार नहीं।

आसां नहीं, इतना जीवन,
सुनते-सुनते जीवन बीता,
एक कसक रह गयी जीवन में,
क्यों बहिर ही मैं पैदा न हुआ?

हर पल रहना बोझ तले,
क्यों चाहूं मुझको ईश मिले,
बोझ तो गधा उठाता है,
औ पीता तो चीता भी है।

जटिल नहीं होता है कुछ,
जटिलता बस अनुभूति मात्र,
कैलाश ही सबको चढ़ना है,
कभी कुआं खोद के पानी पी।

जब लगे कि है शामत आयी,
क्षितिज ताक, जरा मुस्करा,
गुनगुना उठ मस्ती की धुन,
कान बंद, बस मन की सुन॥

Written by arpitgarg

July 19, 2013 at 11:22 am

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बे-बस

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थका हारा चढ़ा मैं बस में,
बगल में आकर बैठ गयी वो,
नींद उसकी आँखों में झलकी,
मेरा कन्धा कब बना सिरहाना,
न वो समझी, न मैंने जाना,
उसको उठाने को मन न माना,
मेरा स्टॉप जाने कब निकला,
एक मक्खी परेशां करने लगी,
अखबार से पंखा करता रहा,
टिकट आखिर की ले दी उसकी,
टीटी कहीं उठा न दे उसको,
बस की यात्रा में जिंदगी सजा ली,
सोते में उसके चेहरे पर हँसी,
दिल ले गयी हमारा, कन्धा भी,
जैसे जैसे आखिर स्टॉप आने लगा,
हमारे दिल में टीस सी उठने लगी,
सोचा उठाऊँ उसको, पूछूं नाम,
पर कुछ कर न पाया,
आखिर बस रुक गयी,
आवाज लगी, सब उतरो,
वो उठ गयी, कुछ अनजान,
कंधे से उठी, शर्मिंदा सी,
हम कुछ कहने को हुए,
जो ख्वाब बुने थे बयां करूँ,
वो बाल सही करने लगी,
दुपट्टा भी ठीक किया उसने,
गला ठक रहा था अबतक,
तभी कुछ दिखा हमें,
फलक में शब्द रुक गए,
सारे अरमां खाख हुए,
छुपा हुआ था पल्लू में जो,
हमें दिखा उसका मंगलसूत्र।

Written by arpitgarg

March 9, 2013 at 11:00 pm

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युग

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दिल झर झर कर क्यूँ रोता है?
औ अँखियाँ सूखी सूखी क्यूँ?
जल भर भर कर वो पीता है,
प्यास है पर बुझती ही नहीं।

हैं सासें चढ़ी चढ़ी सी क्यूँ?
मन बैठा सा क्यूँ जाता है?
लब सूखे सूखे लगते हैं,
तन सावन से घबराता है।

दिन ढला ढला क्यूँ रहता है?
रातों को आँख क्यूँ चुँधियाती?
वो मीलों मीलों चलता है,
पर दूरी है घटती ही नहीं।

चढ़ते हैं रंग न होली में?
फुलझड़ी भी फुस्स हो जाती है।
पकवानों की सजी मंडी में,
मन खाने का न करता है।

वो तारे गिनने बैठा था,
एक हाथ खत्म न कर पाया,
सूरज की घनी तपन भी क्यूँ,
ठिठुरन सी देकर जाती है।

दुनिया की रीत परायी है,
लगता है कुछ अजब ग़जब।
हुआ है एक युग का अंत,
वो समझ न पाता है ये सब।।

Written by arpitgarg

February 5, 2013 at 9:01 pm

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वो बातें अधूरी

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सही जाए ना अब यह दूरी,

करनी हैं तुझसे वो बातें अधूरी,

हाथों का मिलना, औ फूलों का खिलना,

वो सर्दी का आना, टटहलना, ठिठुरना,

छुपाकर रखा गुलाब दिया जो,

तेरा मुस्कराना, थोड़ा शर्माना,

साथ आना, साथ जाना,

लम्बा इंतज़ार, भी छोटा लगा था,

खिचड़ी पकाना, रोटी जलाना,

सागर की लहरें, अपना बनाना,

पागलपन कुछ तेरा, कुछ मेरा,

पलक झपकते, होना सवेरा,

लबों का मिलना,  आहों का भरना,

कभी रोना, कभी खिलखिलाना,

ज़माने का जलना, किसको थी परवाह,

सो सो के उठना, उठ उठ के सोना,

तुझे हर कभी गाली देने की आदत,

रूठी थी जब तू, लाया था गोबी,

याद आता है सब ये, उदासी है छाई,

सही जाए ना अब यह दूरी,

करनी हैं तुझसे वो बातें अधूरी।

Written by arpitgarg

January 30, 2013 at 2:32 pm

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अध्याय

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गूँज उठी आवाज मेरी,

पसरा सन्नाटा था,

खाली मकान हुआ वो,

घर था मेरा जो कभी।

 

एक एक कर चुना था सब,

एक पल में सब छूट गया,

मुहँ से शब्द न निकले,

गले तक आकर थम गए।

 

वो बस ठहराव न था,

जीवन का था एक अध्याय,

सुहानी यादें, खुशनुमा पल,

आज था जो, बन गया कल।

 

कुछ और भी था जो छोड़ा था,

दूर अपने से उसको किया,

जीवन इतना कठिन होगा,

सोचा न था मैंने कभी।

 

थोड़े दिन की बात है ये,

फिर से कमल खिल जाएगा,

राहें मंजिल को पहुंचेंगी,

मौसम जब रंग बदल लेगा।

 

बस तब तक न भूलना होगा,

लक्ष्य पर रखनी होगी नज़र,

जिस कारण से विरह चुनी हमनें,

उसको सार्थक करना होगा।।

Written by arpitgarg

December 3, 2012 at 4:26 pm

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लहू का सागर बहने दे

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सुबह की पहली किरन,
होती कितनी कपटी है,
सारी दुनिया की बुद्धि,
उस एक ऊँगली में लिपटी है|

एक कश लगा जोर का तू,
छल्लों को फिर उड़ते देख,
सागर की गहराई में भी,
गहराई का वो आलम कहाँ|

सिक्का जो है खोटा वो,
उठा के उसको फेंकें सब,
तुझको तो मैं तब मानूं,
उस सिक्के को चमकाए जब|

हैं दुनिया में कितने इश्वर,
राम रहीम येशु भर भर,
करेगा क्या तू इश्वर चुन,
अपना एक नया ही इश्वर बुन|

रातों को जब सन्नाटा है,
चीर उसे जो पाता है,
उसे ही पूछा जाता है,
नहीं तो दूजा खाता है|

आग को थोड़ा दे और हवा,
थोड़ा तो संयम को कम कर,
उठा हाथ में एक पत्थर,
और हो जाने दे शीशा चूर,

युग नया कभी ना आता है,
तिल तिल के बनाया जाता है,
तिल तिल के अब मरना छोड़,
हवा के रुख को अब तू मोड़|

होली रंगों से कब तक,
क्या ऐसे क्रांति आएगी?
लगा तिलक तू माथे पर,
औ लहू का सागर बहने दे||

Written by arpitgarg

September 15, 2012 at 12:12 am

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गया काम से तू

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लबों की वो लाली,
पल पल की गाली,
चढ़ती मदहोशी साली,
गया काम से तू|

थी जुराबें गुलाबी,
छंछंनाती पाजेबें,
मोरनी से हैं पंजे,
गया काम से तू|

मटकती सी आँखें,
दिल में हैं झांकें,
हैं नश्तर चलाती,
गया काम से तू|

उलझी सी जुल्फें,
कि थोड़ी तो सुल्झा,
लगाती हैं फांसी
गया काम से तू|

इधर तिल उधर तिल,
थकता ना गिन गिन,
हैं नजरें चुराते,
गया काम से तू|

मजबूर है दिल,
बड़ा है ये कातिल,
जबसे उसे मिल
गया काम से तू||

Written by arpitgarg

September 2, 2012 at 12:16 am

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पता चल न पाता कभी

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दिल का धड़कना होता है क्या,
सांसें आखिर कैसे चढ़ जाती है,
नींद रातों की कैसे जाती है गुम,
तू न मिलती, पता चल न पाता कभी|

लटों की उलझन में फसना है क्या,
डूबकर आँखों में तैरते कैसे हैं,
मार खाने में आता है कैसा मज़ा,
तू न मिलती, पता चल न पाता कभी|

रात दिन, एक कैसे जाते हैं हो,
भूख लगती है, खा क्यों न पाते हैं हम,
एक चेहरे में पहर कैसे कट जाते हैं,
तू न मिलती, पता चल न पाता कभी|

रिश्ते नाते सब गैर लगते हैं क्यों,
क्यों बेगाना ज़माना ये हो जाता है,
प्यार भी सबका लानत क्यों लगने लगा,
तू न मिलती, पता चल न पाता कभी|

सर्द रातों की गर्मी में तपना है क्या,
चंद बातों में दुनिया का बसना है क्या,
चाँद तारे तोड़कर कैसे लाते हैं सब,
तू न मिलती, पता चल न पाता कभी|

इजहार-ऐ मोहब्बत होती है क्या.
कैसे दर्द-ऐ-जुदाई तड़पा जाती है,
प्यार का रंग खूनी लगता है क्यों,
तू न मिलती, पता चल न पाता कभी||

miao

Written by arpitgarg

March 19, 2012 at 10:29 pm

Posted in Hindi, Love, Poetry

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