ArpitGarg's Weblog

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मैं हाय सौदागर बन न सका

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प्रेमी में कहा प्रेमिका से, कि वफ़ा न दिया, वफ़ा को मेरे ऐ जालिम,
फिर भी दिल यह मेरा, तेरे लिए धड़कता क्यों है?

प्रेमिका बोली, यह कोई अनबूझ पहेली नहीं, सुलझा न जिसको सकता तू,
क्यों देती मैं साथ तेरा, जब तू खुद से ही बदल गया,
तू लाता था हर दिन गुलाब मुझे, गुलदस्ता कब से खाली है,
दिखाता था मुझको ख्वाब नए, किस्मत भी कितनी साली है।

क्या सौगातों का मोह था यह, मुझसे तूने ना प्यार किया,
हीरे मोती, का मोल तुझे, आह मेरी तू सुन न सकी,
जेब से था मैं थोड़ा तंग, गुलदस्ता कैसे भर पाता,
फ़ाके कितने देखे मैंने, कितना तुझको बतलाता?

तंगी जो आयी तुझपे थी, उससे मुझे है क्या लेना,
मैं आज कल की लड़की हूँ, न हूँ कोई जूलिएट मैं,
गहने श्रृंगार सबका है दाम, कैसे मुझे दिलवाता,
तेरे जैसे कंगले पे, मेरा दिल कैसे टिक पाता?

तेरी याद मैं पीता हूँ, तेरे साथ की चाह मुझे,
तू पर कितनी जालिम है, हृदय है या पत्थर है?
मुक्ति ही मुझको दे दे, सांस को तूने छीन लिया,
सौदा ये था लिए तेरे, मैं हाय सौदागर बन न सका।।

Written by arpitgarg

December 14, 2013 at 4:42 am

Posted in Hindi, Love

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औ मैं सो जाऊं

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निकला था मंजिल की ओर,
अच्छा हो रास्ता खो जाऊं,
एक चाह अधूरी हो पूरी,
हो अँधेरा औ मैं सो जाऊं॥

हैं थकी थकी आँखें मेरी,
औ फटी फटी सी बातें हैं,
पूछ-२ पता मैं त्रस्त हुआ,
न ही मिले, अब यही दुआ॥

जब खाने को हो फ़क्त हवा,
औ पीने को आंसूं न कम हौं,
थर-२ कर काँपे देह मेरी,
चाहे भट्टी सी गरमाई हो॥

नाम ख़ाक, काहे की साख,
झुका के सर, औ कटा नाक,
केशों में रेंगती जूं भी अब,
मेरा लहू पीने से बचती है॥

देखा था सपना जो कभी,
बस धुंधला सा याद आता है,
ताश के पत्तों से बने महल,
क्या हवा का झोंका सह पाए?

जन्नत हैं जाना सब चाहते,
ऐसा हो जहन्नुम मैं जाऊं,
एक चाह अधूरी हो पूरी,
हो अँधेरा औ मैं सो जाऊं॥

Written by arpitgarg

September 20, 2013 at 6:36 pm

Posted in Hindi

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Office Meeting: Sketches

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Written by arpitgarg

February 7, 2013 at 8:50 pm

Posted in Sketches

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वो बातें अधूरी

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सही जाए ना अब यह दूरी,

करनी हैं तुझसे वो बातें अधूरी,

हाथों का मिलना, औ फूलों का खिलना,

वो सर्दी का आना, टटहलना, ठिठुरना,

छुपाकर रखा गुलाब दिया जो,

तेरा मुस्कराना, थोड़ा शर्माना,

साथ आना, साथ जाना,

लम्बा इंतज़ार, भी छोटा लगा था,

खिचड़ी पकाना, रोटी जलाना,

सागर की लहरें, अपना बनाना,

पागलपन कुछ तेरा, कुछ मेरा,

पलक झपकते, होना सवेरा,

लबों का मिलना,  आहों का भरना,

कभी रोना, कभी खिलखिलाना,

ज़माने का जलना, किसको थी परवाह,

सो सो के उठना, उठ उठ के सोना,

तुझे हर कभी गाली देने की आदत,

रूठी थी जब तू, लाया था गोबी,

याद आता है सब ये, उदासी है छाई,

सही जाए ना अब यह दूरी,

करनी हैं तुझसे वो बातें अधूरी।

Written by arpitgarg

January 30, 2013 at 2:32 pm

Posted in Hindi, Love, Poetry

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I can hear it, true

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Sleep seems not in sight,
Rest, reads a word too tight,
Run away, sounds a whisper,
I can hear it, true.

So much happening around,
Things on verge of out’o’bound,
Like something gotta go,
I can sense it, true.

Impatience, anxiety, restlessness,
Trying to clear out the mess,
Mess about to turn messier,
I can feel it, true.

Everything was in my hands,
Somehow all slipped away,
I held my fist quite tight,
It couldn’t be tighter, true.

Grappiling in shallow waters,
Can anytime drown in now,
Try hard to hold on to some,
It’s nothing but air, true.

Mountain high, Low of abyss,
Swinging to and fro hard,
About to snap anytime now,
I can’t pause it, true.

However you may shake me,
I hang in there, a strong will,
Will fight hard, try comeback,
I can commit it, true.

Written by arpitgarg

September 21, 2012 at 9:05 pm

Posted in Literary

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जबसे गयी हो दूर

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जबसे गयी हो तुम दूर, एक दर्द सा होता है,
होता है क्यों दर्द ये, है मुझे मालूम नहीं,
मालूम मुझे बस इतना है, कि नींद मुझे न आती है,
नींद कभी जो आ जाए, सपनों में याद सताती है||
 
दिन कटते हैं जैसे तैसे, रात काटने को आती,
कैसे काटूं रात ये दिन, मुझे समझ न आता है,
समझदार मैं था तो बहुत, पगला मैं बन बैठा हूँ,
बैठे बैठे, बस सोचूँ ये, किस्मत से मैं क्यों ऐंठा हूँ||
 
वो रास्ते, वो गलियाँ, जिनपर चलते थे हम तुम,
चलना भी दुष्वार हुआ, छाले क़दमों पे पड़ते हैं,
कदम मुझे ले जाते हैं, तेरे दरवाज़े की ओर,
दरवाज़े बंद पड़ जाते हैं, बिन तेरे किस्मत के||
 
तू जब थी बेहोश, वो पल लम्बे थे जीवन के,
एक बेचैनी छाई थी, तड़प रहा था मन ही मन,
तुझे कभी जो दर्द हुआ, चुभन मुझे महसूस हुई,
कब जाने ऐसा होने लगा, मुझसे पहले तू आने लगी||
 
वापस आजा जान तू अब, विरह सहन न होती है,
सहन जाऊंगा दुत्कार तेरी, पास जो तू मेरे होगी,
पास नहीं जो मेरे तू, जीवन जीने की आस नहीं,
इसी आस में बैठा हूँ, की आने वाली तू जल्दी है||

Written by arpitgarg

January 17, 2012 at 9:29 pm

Posted in Hindi, Love, Poetry

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ऐसा नहीं है

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ऐसा नहीं था कि मुझे कुछ गम था,
पर जीवन में लगता कुछ कम था|
पत्र तो था पर मंजिल थी लापता,
अगले मोड़ पे टकराइगी, क्या था पता||

ऐसा नहीं था कि मैं कोई विश्वामित्र था,
पर तपस्या थी हकीकत, न चल-चित्र था|
इन्द्र की बारिश, ये दिल सह न सका,
जब तन मन तपाने बनी तू मेनका|

ऐसा नहीं था कि कभी मस्ती नहीं थी,
पर अपनी कोई अलग हस्ती नहीं थी|
दौड़ा गयी तू सिरहन, मिली नयी राह,
कट रहा था जीवन, आई नयी चाह|

ऐसा नहीं था कि कोई पगला था मैं,
हाँ समझदारी में थोडा कंगला था मैं|
‘हड़बड़ी कबतक, आदतें सुधारो’, तूने ज्ञान दिया,
ज्यादा नहीं गर थोड़ा तो समझदार किया|

ऐसा नहीं था कि दिल ये पत्थर था,
पर धड़कने को नहीं ये तत्पर था|
मौत के जैसे आई औ जिंदगी दे गयी,
दिल को धड़का, मेरी सांसें ले गयी|

ऐसा नहीं है तू मुझे भाती नहीं,
या सुबह शाम तेरी याद आती नहीं|
सहे हैं दुःख तूने, और दे नहीं सकता,
असमंजस है मेरा, वक़्त ले नहीं सकता|

Written by arpitgarg

August 20, 2011 at 2:45 am

जल उठी धरती फिर

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जल उठी धरती फिर धू धू करके,
फिर हुआ स्तम्भ विस्तंभ आज,
छाती चौड़ी, अब जीता डरके,
गम में मुस्कराना, गहरा राज|

कुछ घना, कुछ गहरा, एक साया,
चहचहा उठे पंची सारे, सांझ भई,
धड़कन बढ़ी, सकुचा, दिल घबराया,
पुराने सब काल हुए, दुर्घटना नई|

कितने हँसे, कितने रोये, क्या गिनती,
मुखौटे से दिखे सब, मूक मय अवाक,
ग्रसित हैं, मुक्त करो, बस यही विनती,
कुछ न बचा, साथ गयी झूठी साख|

एक बटन दबा, एक घनघोर ध्वनी,
चिथड़े उड़े, हर ओर गिरे, सब शांत,
चीख भी उसकी, न निकली, न सुनी,
रो उठे सागर, हिंद से लेकर प्रशांत|

लाचार लगे अब, कुछ न कर पाऊँ,
शीश महल, अब नहीं बचा, चूर-चूर,
घर कब्जाया, खतरा, अब कहाँ जाऊं,
पास था साहिल, लगे अब दूर-दूर|

शैतान था वो, कुकृत्य किया जिसने,
बेबाक जिंदगी, न कभी जिए डरके,
सरफ़रोश हुआ, तृप्त-अमृत पिया उसने
जल उठी धरती जब धू धू करके|

Written by arpitgarg

July 15, 2011 at 9:17 pm

Midnight Sketches: Imitation

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Written by arpitgarg

June 22, 2011 at 10:46 am

Shootout in the Rain

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First full-fledged down pour of the season and Mumbai was left reeling. My weekend plans stood canceled as they involved a bit of travelling. I decided to cool my heels at home instead.

Late afternoon, a news came trickling in about shootout of a veteran journalist. Given the violent times we live in, I would not have given the story, a second hearing. But few keywords caught my attention. Apparently the shootout took place near to my house; on the road that I take daily. Another of such tragedies that I have come up close. The last being when an air hostess leaped off the building I lived in.

These incidents do leave a sad feeling. However as cold as it may sound, they don’t affect us anymore as far as personal security is concerned. I didn’t leave the building after the said suicide. I will take the same road tomorrow. It becomes just news. And then the calls, “Heard a shootout happened where you live. Were you there? Did you see anything?” and other such queries.

In another hour or so I had almost forgotten what had happened. I was just waiting for the rains to subside to get on with the evening. But they never did. I decided to go for a stroll to the park nearby. No sooner had I stepped out of my building did I see dozens of media satellite vans lined up. I wondered why. Then I remembered the shootout. My building is adjacent to the police station and whole media was there to cover the story.

I abandoned the idea of the walk and came back to the apartment. It was time for my evening snacks.