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पकपक

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बकता हूँ मैं दिन औ रात,
आखिर इतना बकता क्यूँ हूँ,
सुनाई बस यही देता है,
पकपक पकपक पकपक पकपक|

एक ही बात दिन ब दिन,
आखिर नहीं मैं थकता क्यूँ हूँ,
कहते हैं सब, बंद कर अपनी,
कचकच कचकच कचकच कचकच|

एक बार जो बात हुई, सो हुई,
सौ सौ बार उसको करता क्यूँ हूँ,
समझ में बस इतना आता है,
भकभक भकभक भकभक भकभक|

दोहरा दोहरा, तिहरा तिहरा
बात की बात ही खत्म हुई,
बात में बस जो बात बची, वो थी,
पटपट पटपट पटपट पटपट|

पहले तो फिर भी सुनते थे जो,
कान बंद किये उन्होंने भी,
उनको भी अब लगने लगा था,
खटखट खटखट खटखट खटखट|

अब तो मैं खुद भी तंग आ चुका,
बेइज्जती अपनी करवा करवा कर,
मुझको भी अब सुनने लगा है,
बसकर बसकर बसकर बसकर|

चुप हो जाना चाहता हूँ मैं,
गुम हो जाना चाहता हूँ मैं,
चाहता हूँ मैं जीना फिर से,
मरकर मरकर मरकर मरकर||

Written by arpitgarg

December 14, 2013 at 3:44 am

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ऐसा कोई पल

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उसने मुझसे पूछा, बता ऐ साथी,
जो तू न भूला, ऐसा कोई पल,
जिस लम्हे की याद तुझे है आती,
उस हसीन राह तू ज़रा चल|

मैं सोच में पड़ा, क्या कहूं,
कहाँ से दूं, उत्तर मैं तुझे,
ज़िन्दगी टटोलूं, कभी झांकूं,
पर वो पल, न मिले मुझे|

आश्चर्य की है बात, हर दिन,
हम जीतें हैं पल कुछ हज़ार,
पर जब कोई कहता है गिन,
बेबस हो जाते, लगते लाचार|

असल में जीवन काटते बस,
पर जीते कभी नहीं हैं हम,
हँसते हैं, जब कोई बोलता हँस,
चाय पीते, वो भी चीनी कम|

मैंने कभी नहीं सहेजे वो पल,
कभी रूककर उन्हें नहीं पकड़ा,
सोचूँ कल, आज और कल,
मजबूरियां ने मुझे था जकड़ा|

इसी तरह जिए, इसी तरह जायेंगे,
न होंगी अपनी दो-चार यादें भी,
सपने भी नहीं अच्छे कभी आयेंगे,
जिंदगी बस उम्मीद के भरोसे की|

शायद तू ही है साकी, जिसका,
था इंतज़ार मैंने किया अबतक,
मुझे नहीं मालूम, पता उसका,
पर यादों को रोकूँ कबतक||

Written by arpitgarg

December 14, 2013 at 3:34 am

Posted in Hindi, Poetry

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वो पगला

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सब कहते थे वो पगला है,
नकारा है, एक झल्ला है,
मत उससे मिल, रहना दूर,
सपने सारे हो जायेंगे चूर|

सब कहते थे, आवारा है,
सागर का नहीं किनारा है,
कुछ ना मिलता है इस ओर,
दुःख से रात, दर्द से भोर|

सब कहते थे, वो फ़ोकट है,
जेब में नहीं है एक भी नोट,
क्या खायेगा, क्या खिलायेगा,
खुद हंसेगा, तुझे रुलाएगा|

सब कहते थे, वो बे-दिल है,
प्यार क्या है, नहीं जानता,
जब टूटेगा दिल, तब रोएगी,
पाया है कुछ, ज्यादा खोएगी|

सब कहते थे, तू सुनती थी,
बस सुनती थी, न हरती थी,
सब कहते रहे, बस कहते गए,
तू ख्वाब बुनती रही नए|

माना कि वो थोड़ा पगला है,
नकारा है, एक झल्ला है,
पर उससे न रह पाऊँ में दूर,
अब चाहे सपने ही हों चूर|

सबको लगता वो आवारा है,
सागर नहीं, प्यार का फव्वारा है,
जो कुछ है, वो है इस ओर,
उसी से रात, उसी से भोर|

राजे महाराजे क्या खुश थे,
पैसे से प्यार का क्या है तोल,
रूखा सूखा खा जी लेंगे,
संग हंस लेंगे, संग रो लेंगे|

बे-दिल वो नहीं, दुनिया है,
उसने तो सच्चा प्यार किया,
दिल टूटे अब, या कुछ हो,
पाने खोने का नहीं है मोह|

जब तक तू है साथ मेरे,
दुनिया से लड़ने का है दम,
सब कितना ही अब कहते रहें,
यह प्यार नहीं होगा कुछ कम||

Written by arpitgarg

December 14, 2013 at 3:32 am

Posted in Hindi, Love

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जब मिली थी तुम पहली बार

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न भूला मैं वो आखों का दीदार,
सकपकाहट औ सकुचाहट वो,
दबी सी हँसी, सीने पे वार,
जब मिली थी तुम पहली बार।

न भूला मैं वो उड़ती जुल्फें,
पलछिन करती सी पलकें,
सारी रात रहा बेकरार,
जब मिली थी तुम पहली बार।

न भूला मैं वो अंगुलियां,
दबोचे थे बाल जिससे मेरे,
हाथ ना आये, खाली वार,
जब मिली थी तुम पहली बार।

न भूला मैं वो लाली,
जो लबों पे छायी थी तेरे,
उसी पल गया था दिल को हार,
जब मिली थी तुम पहली बार।

न भूला मैं वो नयन तेरे,
कजरारे से, शरमाते से,
तपस्या मेरी करी तार-तार,
जब मिली थी तुम पहली बार।

न भूला मैं वो बातें तेरी,
जो मुझसे कर न पाती थी,
रहा है मुझे तबसे इंतज़ार,
जब मिली थी तुम पहली बार।

न भूला मैं वो इठलाना तेरा,
जो मन मेरा मचला जाता था,
हारा मैं मती, बन गया गवार,
जब मिली थी तुम पहली बार।

ऐसा ही रहे, न भूलूँ मैं,
तेरा एहसास, तेरी हर सांस,
जब देखूं तुझे, लगे मुझे ऐसा,
कि मिली हो तुम पहली बार।।

Written by arpitgarg

November 24, 2013 at 11:53 pm

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परदेसी

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हवा का झोंका मध्यम-२,
अपने संग ले कुछ उड़ा,
एक गुलाबी पंखुड़ी सा,
फूल नहीं वो ख़त था तेरा।

खिड़की थी खुली हुई ऐसे,
बंद भी न मैं कर पाया,
फुर्ती से तो लपका मैं,
पर कम्बख्त उड़ता ही गया।

पढने को खोला भी न था,
देख-२ ही आहें भर पाया,
थोड़ी देर तो पीछे दौड़ा मैं,
पड़ा खुला मैदान भारी पर।

इतने दिन की आँख मिचोली,
एक चुरायी हुई हसीं,
दिया अचानक मुझको ख़त,
तूने जाने के आखरी दिन।

ख़त के साथ पता भी गया,
ढूंढूंगा तुझको कैसे अब,
किसी पराये शहर मैं,
यही सोच-२ के बैठा हूँ।

पर शायद अच्छा ही हुआ,
परदेसी से प्यार नहीं टिकता,
इस बात से ही खुश हो लूँगा,
आखिर तूने ख़त तो लिखा॥

Written by arpitgarg

September 22, 2013 at 9:47 pm

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मन की सुन

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गम को लेकर दुनिया भर का,
खुद को क्यों ग़मगीन करूँ,
क्यों इंतज़ार दिन ढलने का,
मैं आँखें क्यों ना बंद करूं।

क्यों चौबेजी मैं बन बैठूँ,
जब छब्बे बनकर मस्त रहूं,
माथे पर क्यों पड़ने दूं बल,
जब खाऊं पियूं बलवान रहूँ।

सोच सोच के क्यों हारूं,
जब हरा हरा के सुचवाऊँ,
इज्जत पे मेरी बन आये,
इतना भी इज्जतदार नहीं।

आसां नहीं, इतना जीवन,
सुनते-सुनते जीवन बीता,
एक कसक रह गयी जीवन में,
क्यों बहिर ही मैं पैदा न हुआ?

हर पल रहना बोझ तले,
क्यों चाहूं मुझको ईश मिले,
बोझ तो गधा उठाता है,
औ पीता तो चीता भी है।

जटिल नहीं होता है कुछ,
जटिलता बस अनुभूति मात्र,
कैलाश ही सबको चढ़ना है,
कभी कुआं खोद के पानी पी।

जब लगे कि है शामत आयी,
क्षितिज ताक, जरा मुस्करा,
गुनगुना उठ मस्ती की धुन,
कान बंद, बस मन की सुन॥

Written by arpitgarg

July 19, 2013 at 11:22 am

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जबसे गयी हो दूर

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जबसे गयी हो तुम दूर, एक दर्द सा होता है,
होता है क्यों दर्द ये, है मुझे मालूम नहीं,
मालूम मुझे बस इतना है, कि नींद मुझे न आती है,
नींद कभी जो आ जाए, सपनों में याद सताती है||
 
दिन कटते हैं जैसे तैसे, रात काटने को आती,
कैसे काटूं रात ये दिन, मुझे समझ न आता है,
समझदार मैं था तो बहुत, पगला मैं बन बैठा हूँ,
बैठे बैठे, बस सोचूँ ये, किस्मत से मैं क्यों ऐंठा हूँ||
 
वो रास्ते, वो गलियाँ, जिनपर चलते थे हम तुम,
चलना भी दुष्वार हुआ, छाले क़दमों पे पड़ते हैं,
कदम मुझे ले जाते हैं, तेरे दरवाज़े की ओर,
दरवाज़े बंद पड़ जाते हैं, बिन तेरे किस्मत के||
 
तू जब थी बेहोश, वो पल लम्बे थे जीवन के,
एक बेचैनी छाई थी, तड़प रहा था मन ही मन,
तुझे कभी जो दर्द हुआ, चुभन मुझे महसूस हुई,
कब जाने ऐसा होने लगा, मुझसे पहले तू आने लगी||
 
वापस आजा जान तू अब, विरह सहन न होती है,
सहन जाऊंगा दुत्कार तेरी, पास जो तू मेरे होगी,
पास नहीं जो मेरे तू, जीवन जीने की आस नहीं,
इसी आस में बैठा हूँ, की आने वाली तू जल्दी है||

Written by arpitgarg

January 17, 2012 at 9:29 pm

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सात दिन बरसात के

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भीगी भागी रात थी वो,
घूंघट डाले साथ थी वो,
भूल नहीं मैं क्यूँ पाता,
वो सात दिन बरसात के|
 
असल नहीं वो सूद था बस,
जो मुझे लगा था रब जैसा,
वापस कर दो मुझको अब,
वो सात दिन बरसात के|
 
मुझको होती थी सिरहन सी,
उसकी आँखों की नश्तर से,
खो गए हैं जाने कहाँ गए,
वो सात दिन बरसात के|
 
बारिश की बूंदों का पड़ना,
बिना बात के भी तेरा लड़ना,
छप-छप करती चप्पल जब,
वो सात दिन बरसात के|
 
एक सौंधी सी मट्टी खुशबू,
ठण्ड लगी, सो लगी अलग,
गर्मी करती उसकी सांसें,
वो सात दिन बरसात के|
 
वो बात ना जाने क्या होती,
जो रात जहन में आती थी,
खुस-फुस करती फ़ोन पे तू
वो सात दिन बरसात के|
 
खुशियाँ आयीं बेहिसाब,
गम सारे मेरे हवा हुए,
फिर आयेंगे जल्दी से कब,
वो सात दिन बरसात के||

Written by arpitgarg

September 16, 2011 at 11:01 pm

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रात जवां, अभी ढली नहीं

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नश्तर से नैन तेरे चल जाते,
जब तब, घायल कर जाते,
दिल को मेरे हाय, तब तब,
थोडा ठहर, न हो रुखसत,
रात जवां, अभी ढली नहीं|

प्यारी सी हँसी, कोमल पंखुडियां,
होठ तेरे, ललचाते मुझको,
शर्म से लाल गाल तेरे,
कितना रोकूँ, तड़पाते मुझको,
थोडा ठहर, न हो रुखसत,
रात जवां, अभी ढली नहीं|

जब होती है तू उदास, रोता है,
मन मेरा, दुखता अन्दर कुछ मेरे,
मत बहाना कभी तू आंसू,
बहुत कीमती हैं, पूछ मुझसे,
थोडा ठहर, न हो रुखसत,
रात जवां, अभी ढली नहीं|

जुल्फें तेरी, उलझी सुलझी,
हर वक़्त तेरा जूझना उनसे,
पर जैसी भी हैं, भाता है मुझे,
उंगलियाँ जब फसती हैं मेरी,
थोडा ठहर, न हो रुखसत,
रात जवां, अभी ढली नहीं|

बचपना तेरा, इतराना, कट्टी,
हंस पड़ता हूँ, बंद आँखें करके,
मेरे छूने से होती सिरहन तुझे,
तुझे परेशां करता मैं हक़ से हूँ,
थोडा ठहर, न हो रुखसत,
रात जवान, अभी ढली नहीं|

जाना है तो जा, न पीछा
करूंगा मैं, बस निगाहें मेरी,
रुखसत भी हो गयी जो तू,
अहसास को कैसे ले जायेगी,
कितना भी दूर चली जा,
यह रात लौटकर फिर आएगी||

Written by arpitgarg

September 5, 2011 at 12:30 am

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चार भौंकते कुत्ते

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सपने में आते हैं मेरे,
डरता हूँ मैं, खौफनाक ,
क्यों न मुझको सोने देते,
वो चार भौंकते कुत्ते|

मैंने क्या बिगाड़ा तेरा है,
क्या ऐसा पाप किया है,
सुख चैन हर ले गए जो,
वो चार भौंकते कुत्ते|

एक बेचैनी सी छाई है,
पसीना पसीना हुआ हूँ मैं,
क्यों दिल को मेरे धड्काते,
वो चार भौंकते कुत्ते|

सुनसान गली, रास्ता तंग,
घेर लिया मुझे चारों ओर,
मेरे पापों की गिनती करवाते,
वो चार भौंकते कुत्ते|

काँप रहा मैं, ठण्ड लगी,
मुख में मेरे आवाज दबी,
राम नाम मुझसे जपवाते,
वो चार भौंकते कुत्ते|

तभी एक तेज रोशनी दिखी,
आँखें खुली, कुछ साफ़ हुआ,
मुझे साहस देने आये थे,
मेरे डर को भागने आये थे,
मुझे हिम्मत देके चले गए,
मेरे डर को लेके चले गए,
वो चार भौंकते कुत्ते|

Written by arpitgarg

August 29, 2011 at 6:27 pm

Posted in Hindi, Poetry

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