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ऐसा कोई पल
उसने मुझसे पूछा, बता ऐ साथी,
जो तू न भूला, ऐसा कोई पल,
जिस लम्हे की याद तुझे है आती,
उस हसीन राह तू ज़रा चल|
मैं सोच में पड़ा, क्या कहूं,
कहाँ से दूं, उत्तर मैं तुझे,
ज़िन्दगी टटोलूं, कभी झांकूं,
पर वो पल, न मिले मुझे|
आश्चर्य की है बात, हर दिन,
हम जीतें हैं पल कुछ हज़ार,
पर जब कोई कहता है गिन,
बेबस हो जाते, लगते लाचार|
असल में जीवन काटते बस,
पर जीते कभी नहीं हैं हम,
हँसते हैं, जब कोई बोलता हँस,
चाय पीते, वो भी चीनी कम|
मैंने कभी नहीं सहेजे वो पल,
कभी रूककर उन्हें नहीं पकड़ा,
सोचूँ कल, आज और कल,
मजबूरियां ने मुझे था जकड़ा|
इसी तरह जिए, इसी तरह जायेंगे,
न होंगी अपनी दो-चार यादें भी,
सपने भी नहीं अच्छे कभी आयेंगे,
जिंदगी बस उम्मीद के भरोसे की|
शायद तू ही है साकी, जिसका,
था इंतज़ार मैंने किया अबतक,
मुझे नहीं मालूम, पता उसका,
पर यादों को रोकूँ कबतक||
वो पगला
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सब कहते थे वो पगला है, सब कहते थे, आवारा है, सब कहते थे, वो फ़ोकट है, सब कहते थे, वो बे-दिल है, |
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| सब कहते थे, तू सुनती थी, बस सुनती थी, न हरती थी, सब कहते रहे, बस कहते गए, तू ख्वाब बुनती रही नए| |
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माना कि वो थोड़ा पगला है, सबको लगता वो आवारा है, राजे महाराजे क्या खुश थे, बे-दिल वो नहीं, दुनिया है, जब तक तू है साथ मेरे, |
जब मिली थी तुम पहली बार
न भूला मैं वो आखों का दीदार,
सकपकाहट औ सकुचाहट वो,
दबी सी हँसी, सीने पे वार,
जब मिली थी तुम पहली बार।
न भूला मैं वो उड़ती जुल्फें,
पलछिन करती सी पलकें,
सारी रात रहा बेकरार,
जब मिली थी तुम पहली बार।
न भूला मैं वो अंगुलियां,
दबोचे थे बाल जिससे मेरे,
हाथ ना आये, खाली वार,
जब मिली थी तुम पहली बार।
न भूला मैं वो लाली,
जो लबों पे छायी थी तेरे,
उसी पल गया था दिल को हार,
जब मिली थी तुम पहली बार।
न भूला मैं वो नयन तेरे,
कजरारे से, शरमाते से,
तपस्या मेरी करी तार-तार,
जब मिली थी तुम पहली बार।
न भूला मैं वो बातें तेरी,
जो मुझसे कर न पाती थी,
रहा है मुझे तबसे इंतज़ार,
जब मिली थी तुम पहली बार।
न भूला मैं वो इठलाना तेरा,
जो मन मेरा मचला जाता था,
हारा मैं मती, बन गया गवार,
जब मिली थी तुम पहली बार।
ऐसा ही रहे, न भूलूँ मैं,
तेरा एहसास, तेरी हर सांस,
जब देखूं तुझे, लगे मुझे ऐसा,
कि मिली हो तुम पहली बार।।
परदेसी
हवा का झोंका मध्यम-२,
अपने संग ले कुछ उड़ा,
एक गुलाबी पंखुड़ी सा,
फूल नहीं वो ख़त था तेरा।
खिड़की थी खुली हुई ऐसे,
बंद भी न मैं कर पाया,
फुर्ती से तो लपका मैं,
पर कम्बख्त उड़ता ही गया।
पढने को खोला भी न था,
देख-२ ही आहें भर पाया,
थोड़ी देर तो पीछे दौड़ा मैं,
पड़ा खुला मैदान भारी पर।
इतने दिन की आँख मिचोली,
एक चुरायी हुई हसीं,
दिया अचानक मुझको ख़त,
तूने जाने के आखरी दिन।
ख़त के साथ पता भी गया,
ढूंढूंगा तुझको कैसे अब,
किसी पराये शहर मैं,
यही सोच-२ के बैठा हूँ।
पर शायद अच्छा ही हुआ,
परदेसी से प्यार नहीं टिकता,
इस बात से ही खुश हो लूँगा,
आखिर तूने ख़त तो लिखा॥
जबसे गयी हो दूर
जबसे गयी हो तुम दूर, एक दर्द सा होता है,
होता है क्यों दर्द ये, है मुझे मालूम नहीं,
मालूम मुझे बस इतना है, कि नींद मुझे न आती है,
नींद कभी जो आ जाए, सपनों में याद सताती है||
दिन कटते हैं जैसे तैसे, रात काटने को आती,
कैसे काटूं रात ये दिन, मुझे समझ न आता है,
समझदार मैं था तो बहुत, पगला मैं बन बैठा हूँ,
बैठे बैठे, बस सोचूँ ये, किस्मत से मैं क्यों ऐंठा हूँ||
वो रास्ते, वो गलियाँ, जिनपर चलते थे हम तुम,
चलना भी दुष्वार हुआ, छाले क़दमों पे पड़ते हैं,
कदम मुझे ले जाते हैं, तेरे दरवाज़े की ओर,
दरवाज़े बंद पड़ जाते हैं, बिन तेरे किस्मत के||
तू जब थी बेहोश, वो पल लम्बे थे जीवन के,
एक बेचैनी छाई थी, तड़प रहा था मन ही मन,
तुझे कभी जो दर्द हुआ, चुभन मुझे महसूस हुई,
कब जाने ऐसा होने लगा, मुझसे पहले तू आने लगी||
वापस आजा जान तू अब, विरह सहन न होती है,
सहन जाऊंगा दुत्कार तेरी, पास जो तू मेरे होगी,
पास नहीं जो मेरे तू, जीवन जीने की आस नहीं,
इसी आस में बैठा हूँ, की आने वाली तू जल्दी है||
रात जवां, अभी ढली नहीं
नश्तर से नैन तेरे चल जाते,
जब तब, घायल कर जाते,
दिल को मेरे हाय, तब तब,
थोडा ठहर, न हो रुखसत,
रात जवां, अभी ढली नहीं|
प्यारी सी हँसी, कोमल पंखुडियां,
होठ तेरे, ललचाते मुझको,
शर्म से लाल गाल तेरे,
कितना रोकूँ, तड़पाते मुझको,
थोडा ठहर, न हो रुखसत,
रात जवां, अभी ढली नहीं|
जब होती है तू उदास, रोता है,
मन मेरा, दुखता अन्दर कुछ मेरे,
मत बहाना कभी तू आंसू,
बहुत कीमती हैं, पूछ मुझसे,
थोडा ठहर, न हो रुखसत,
रात जवां, अभी ढली नहीं|
जुल्फें तेरी, उलझी सुलझी,
हर वक़्त तेरा जूझना उनसे,
पर जैसी भी हैं, भाता है मुझे,
उंगलियाँ जब फसती हैं मेरी,
थोडा ठहर, न हो रुखसत,
रात जवां, अभी ढली नहीं|
बचपना तेरा, इतराना, कट्टी,
हंस पड़ता हूँ, बंद आँखें करके,
मेरे छूने से होती सिरहन तुझे,
तुझे परेशां करता मैं हक़ से हूँ,
थोडा ठहर, न हो रुखसत,
रात जवान, अभी ढली नहीं|
जाना है तो जा, न पीछा
करूंगा मैं, बस निगाहें मेरी,
रुखसत भी हो गयी जो तू,
अहसास को कैसे ले जायेगी,
कितना भी दूर चली जा,
यह रात लौटकर फिर आएगी||
ऐसा नहीं है
ऐसा नहीं था कि मुझे कुछ गम था,
पर जीवन में लगता कुछ कम था|
पत्र तो था पर मंजिल थी लापता,
अगले मोड़ पे टकराइगी, क्या था पता||
ऐसा नहीं था कि मैं कोई विश्वामित्र था,
पर तपस्या थी हकीकत, न चल-चित्र था|
इन्द्र की बारिश, ये दिल सह न सका,
जब तन मन तपाने बनी तू मेनका|
ऐसा नहीं था कि कभी मस्ती नहीं थी,
पर अपनी कोई अलग हस्ती नहीं थी|
दौड़ा गयी तू सिरहन, मिली नयी राह,
कट रहा था जीवन, आई नयी चाह|
ऐसा नहीं था कि कोई पगला था मैं,
हाँ समझदारी में थोडा कंगला था मैं|
‘हड़बड़ी कबतक, आदतें सुधारो’, तूने ज्ञान दिया,
ज्यादा नहीं गर थोड़ा तो समझदार किया|
ऐसा नहीं था कि दिल ये पत्थर था,
पर धड़कने को नहीं ये तत्पर था|
मौत के जैसे आई औ जिंदगी दे गयी,
दिल को धड़का, मेरी सांसें ले गयी|
ऐसा नहीं है तू मुझे भाती नहीं,
या सुबह शाम तेरी याद आती नहीं|
सहे हैं दुःख तूने, और दे नहीं सकता,
असमंजस है मेरा, वक़्त ले नहीं सकता|
