Archive for the ‘Hindi’ Category
लहू का सागर बहने दे
सुबह की पहली किरन,
होती कितनी कपटी है,
सारी दुनिया की बुद्धि,
उस एक ऊँगली में लिपटी है|
एक कश लगा जोर का तू,
छल्लों को फिर उड़ते देख,
सागर की गहराई में भी,
गहराई का वो आलम कहाँ|
सिक्का जो है खोटा वो,
उठा के उसको फेंकें सब,
तुझको तो मैं तब मानूं,
उस सिक्के को चमकाए जब|
हैं दुनिया में कितने इश्वर,
राम रहीम येशु भर भर,
करेगा क्या तू इश्वर चुन,
अपना एक नया ही इश्वर बुन|
रातों को जब सन्नाटा है,
चीर उसे जो पाता है,
उसे ही पूछा जाता है,
नहीं तो दूजा खाता है|
आग को थोड़ा दे और हवा,
थोड़ा तो संयम को कम कर,
उठा हाथ में एक पत्थर,
और हो जाने दे शीशा चूर,
युग नया कभी ना आता है,
तिल तिल के बनाया जाता है,
तिल तिल के अब मरना छोड़,
हवा के रुख को अब तू मोड़|
होली रंगों से कब तक,
क्या ऐसे क्रांति आएगी?
लगा तिलक तू माथे पर,
औ लहू का सागर बहने दे||
गया काम से तू
लबों की वो लाली,
पल पल की गाली,
चढ़ती मदहोशी साली,
गया काम से तू|
थी जुराबें गुलाबी,
छंछंनाती पाजेबें,
मोरनी से हैं पंजे,
गया काम से तू|
मटकती सी आँखें,
दिल में हैं झांकें,
हैं नश्तर चलाती,
गया काम से तू|
उलझी सी जुल्फें,
कि थोड़ी तो सुल्झा,
लगाती हैं फांसी
गया काम से तू|
इधर तिल उधर तिल,
थकता ना गिन गिन,
हैं नजरें चुराते,
गया काम से तू|
मजबूर है दिल,
बड़ा है ये कातिल,
जबसे उसे मिल
गया काम से तू||
पता चल न पाता कभी
दिल का धड़कना होता है क्या,
सांसें आखिर कैसे चढ़ जाती है,
नींद रातों की कैसे जाती है गुम,
तू न मिलती, पता चल न पाता कभी|
लटों की उलझन में फसना है क्या,
डूबकर आँखों में तैरते कैसे हैं,
मार खाने में आता है कैसा मज़ा,
तू न मिलती, पता चल न पाता कभी|
रात दिन, एक कैसे जाते हैं हो,
भूख लगती है, खा क्यों न पाते हैं हम,
एक चेहरे में पहर कैसे कट जाते हैं,
तू न मिलती, पता चल न पाता कभी|
रिश्ते नाते सब गैर लगते हैं क्यों,
क्यों बेगाना ज़माना ये हो जाता है,
प्यार भी सबका लानत क्यों लगने लगा,
तू न मिलती, पता चल न पाता कभी|
सर्द रातों की गर्मी में तपना है क्या,
चंद बातों में दुनिया का बसना है क्या,
चाँद तारे तोड़कर कैसे लाते हैं सब,
तू न मिलती, पता चल न पाता कभी|
इजहार-ऐ मोहब्बत होती है क्या.
कैसे दर्द-ऐ-जुदाई तड़पा जाती है,
प्यार का रंग खूनी लगता है क्यों,
तू न मिलती, पता चल न पाता कभी||
miao
जीवन जीना क्या है
कुछ दिन से सोच रहा था कि लिख डालूँ,
आते आते हाथ पे बात रुक जाती थी पर,
कुछ खट्टे मीठे अनुभव हुए हाल में,
उनसे मैंने जाना, जीवन जीना क्या है|
गर उस रोज़ सड़क से मैं गुजरा न होता,
मौत को अपनी बाहों में सिमटा न होता,
खून का रंग लाल कभी जान न पाता,
मृत्यु क्या होती अकाल पहचान न पाता|
उस दिन गर मैं भूखा सोया न होता,
करवट बदल बदल तडपा रोया न होता,
बेकारी क्या होती है, चुभ न पाती,
पी कर पानी भी डकार कभी न आती|
उस दिन उस कुकुर ने नोचा न होता,
मैंने अगर उसे गुस्से से दुत्कारा न होता,
पता न चल पाता कि अपना होता क्या है,
दुलार दुत्कार में अंतर न कभी मैं पाता|
उस दिन उस पीड़ित को गर छोड़ा न होता,
कराह कि आह को कभी महसूस न पाता,
धूप छाँव पैसे से जो सब एक हुई थी, बदली,
पैरों के छाले क्या होते मैंने आखिर जाना|
सन्नाटे की आहट से मैं गुजरा न होता,
उस सर्द भरी रात में गर ठिठुरा न होता,
नंग, ठण्ड की तपन से मैं वाकिफ न होता,
पल पल लुटने के डर से सहमा न होता|
पर जो कुछ भी हो, आग से गुजर के देखा,
बिन खडाऊं के काटों पर चलकर देखा,
गहरे पानी में सांसों की तड़प को देखा ,
औ चक्की के दो पाटों में पिसकर देखा|
कुछ दिन से सोच रहा था कि लिख डालूँ,
आते आते हाथ पे बात रुक जाती थी पर,
कुछ खट्टे मीठे अनुभव हुए हाल में,
उनसे मैंने जाना, जीवन जीना क्या है||
जबसे गयी हो दूर
जबसे गयी हो तुम दूर, एक दर्द सा होता है,
होता है क्यों दर्द ये, है मुझे मालूम नहीं,
मालूम मुझे बस इतना है, कि नींद मुझे न आती है,
नींद कभी जो आ जाए, सपनों में याद सताती है||
दिन कटते हैं जैसे तैसे, रात काटने को आती,
कैसे काटूं रात ये दिन, मुझे समझ न आता है,
समझदार मैं था तो बहुत, पगला मैं बन बैठा हूँ,
बैठे बैठे, बस सोचूँ ये, किस्मत से मैं क्यों ऐंठा हूँ||
वो रास्ते, वो गलियाँ, जिनपर चलते थे हम तुम,
चलना भी दुष्वार हुआ, छाले क़दमों पे पड़ते हैं,
कदम मुझे ले जाते हैं, तेरे दरवाज़े की ओर,
दरवाज़े बंद पड़ जाते हैं, बिन तेरे किस्मत के||
तू जब थी बेहोश, वो पल लम्बे थे जीवन के,
एक बेचैनी छाई थी, तड़प रहा था मन ही मन,
तुझे कभी जो दर्द हुआ, चुभन मुझे महसूस हुई,
कब जाने ऐसा होने लगा, मुझसे पहले तू आने लगी||
वापस आजा जान तू अब, विरह सहन न होती है,
सहन जाऊंगा दुत्कार तेरी, पास जो तू मेरे होगी,
पास नहीं जो मेरे तू, जीवन जीने की आस नहीं,
इसी आस में बैठा हूँ, की आने वाली तू जल्दी है||
मानेगा रब
शाम थी कुछ अनजान,
थम सा गया था समां,
दूर कहीं एक अहाट थी,
दस्तक देने को तयार|
बेरंग जिंदगी थी जो मेरी,
तेरी नजरों को चुभ सी गयी,
हुई तभी से तू इसमें,
रंग भरने को तत्पर|
तेरी मुस्कराहट में ऐसा खोया,
आज तलक न मिल पाया,
डूब डूब कर मैं जानूं,
सच है, कोई ख्वाब नहीं|
परछाई से भी डरता था,
अब हठ कर ऐसा ऐंठा है,
बिन तेरे सब कुछ सून सून,
संग में ही जीवन जीना है|
गोभी का वो फूल नहीं,
दिल था मेरा जो तुझे दिया,
तू रूठ रूठ के मान गयी,
मैं मना मना कर थका नहीं|
एक झल्ली सी पहली बार लगी,
तेरी लट में, मैं अटक गया,
तब कमर पे तेरे हाथ रखा जो,
आज तक वहीँ रखा है देख|
कुछ गम था ऐसी बात नहीं,
कुछ कम था पर जज्बात सही,
कुछ नम फिर तेरे लिए हुआ,
कुछ थम गया, समय था वो|
तेरी गर्दन पे स्नेह किया,
प्यार से तू करहा थी गयी,
मीनू, रिंकू औ पिंकी सब,
जाने कब मेरे अपने हुए|
लबों की तेरी लाली थी,
मेरे लबों पर चमकी देख,
तेरे मुहं का स्वाद भी अब,
मुझको रह रहकर आता है|
साँसों की तेरी गरम हवा,
मेरी साँसों से टकराई जब,
झुक गए सारे नैन तभी,
सीने से तुझको लगा लिया|
छुपा ले अपने आँचल में,
यह दुनिया सब बेगानी है,
संग तेरे जो जीना पड़े मुझे,
वो जीवन मुझे बेमानी है|
एक बार जो थामा हाथ तेरा,
एक बार जो तुझको स्नेह किया,
अनंत तक न छूटेगा अब,
चाहें न मानें सब, मानेगा पर रब||
सोचा न था
चहकता है मन, गाता है दिल,
सुबह से शाम, कटती नहीं अब,
ख्वाब देखना भी भाने लगा है,
ऐसा होगा कभी, सोचा न था|
सुबह उठना अच्छा लगने लगा,
काम करना सच्चा लगने लगा,
समझदारी भी आने लगी है अभी,
ऐसा होगा कभी, सोचा न था|
ठण्ड छूने से जिसको लगी थी कभी,
तपन उसके ही आने से होने लगी,
सर्द रातें भी पल में कटती हैं अब,
ऐसा होगा कभी, सोचा न था|
चंद लम्हों में सो जाया करता था जो,
कितने पहर आँखों-आँखों में कटने लगे,
दर्द भी होता है न ताकीद अब,
ऐसा होगा कभी, सोचा न था|
अपनी बातों से फुर्सत नहीं थी जिसे,
बातें करना ही वो भूल बैठा है अब,
दर्द-ए-तन्हाई समझ में आने लगी,
ऐसा होगा कभी, सोचा न था|
जो होना था हो ही गया है तुझे,
राख पे रोने से कुछ पायेगा नहीं,
तमन्ना सरफरोशी की जग है गयी,
ऐसा होगा कभी, सोचा न था||
रात जवां, अभी ढली नहीं
नश्तर से नैन तेरे चल जाते,
जब तब, घायल कर जाते,
दिल को मेरे हाय, तब तब,
थोडा ठहर, न हो रुखसत,
रात जवां, अभी ढली नहीं|
प्यारी सी हँसी, कोमल पंखुडियां,
होठ तेरे, ललचाते मुझको,
शर्म से लाल गाल तेरे,
कितना रोकूँ, तड़पाते मुझको,
थोडा ठहर, न हो रुखसत,
रात जवां, अभी ढली नहीं|
जब होती है तू उदास, रोता है,
मन मेरा, दुखता अन्दर कुछ मेरे,
मत बहाना कभी तू आंसू,
बहुत कीमती हैं, पूछ मुझसे,
थोडा ठहर, न हो रुखसत,
रात जवां, अभी ढली नहीं|
जुल्फें तेरी, उलझी सुलझी,
हर वक़्त तेरा जूझना उनसे,
पर जैसी भी हैं, भाता है मुझे,
उंगलियाँ जब फसती हैं मेरी,
थोडा ठहर, न हो रुखसत,
रात जवां, अभी ढली नहीं|
बचपना तेरा, इतराना, कट्टी,
हंस पड़ता हूँ, बंद आँखें करके,
मेरे छूने से होती सिरहन तुझे,
तुझे परेशां करता मैं हक़ से हूँ,
थोडा ठहर, न हो रुखसत,
रात जवान, अभी ढली नहीं|
जाना है तो जा, न पीछा
करूंगा मैं, बस निगाहें मेरी,
रुखसत भी हो गयी जो तू,
अहसास को कैसे ले जायेगी,
कितना भी दूर चली जा,
यह रात लौटकर फिर आएगी||
