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This Animal and You
I sneeze and you skip a breath,
I fall and you shed a tear,
So much good inside you, Stop.
This animal doesn’t deserve the care.
I err and you take the brunt,
I slur and you just listen,
Perplexes me why you are with me,
This animal doesn’t deserve the care.
Your time, you invest in me,
Your life, you trust with me,
I wonder am I worthy of it, no,
This animal doesn’t deserve the care.
When I hold your hand, the chill,
Your touch of assurance, I am still,
Don’t give me belief, wake up,
This animal doesn’t deserve the care.
My anxieties soothen by mere smile,
I am no substance, just style,
Worry you a lot about me, stop,
This animal doesn’t deserve the care.
The fast, the sacrifice you do for me,
That tied string under the banyan tree,
Quarrel with the maker for me, don’t,
This animal doesn’t deserve the care.
The future together, the hope,
I will make it happen, be assured,
Sadness be false, happiness be true,
This animal cares a lot about you.
Why O! Why
Wipe off that beautiful smile,
I can’t resist it.
Cover up those bare toes,
Temptations building.
The piercing eyes,
All truth they know.
Those luscious lips, look away,
My feet trembling.
Oh that wiggly nose,
Red cherry passion.
A dancing belly perfect,
Why O! Why.
Open up the tied hairs,
Bring down the curtain.
नन्ही परी, चंचलता भरी
एक थी चुलबुल नन्ही सी परी,
चंचलता, चपलता, शरारत भरी,
मुस्कान से उसकी, रोशन था ज़माना,
पड़े सब पीछे, उसको था फंसाना|
आया एक राजकुमार तभी,
सबसे लड़ा और उसे ले उड़ा,
आह भरी, देखते रह गए सभी,
आसां न था, युद्ध हुआ था कड़ा|
पर किस्मत को था मंज़ूर नहीं,
नज़र लगी उसको जमाने की,
अभिमन्यु का भी चक्रव्यूह क्या होगा,
फंसी वो बेचारी जान थी जिसमें|
आंसू न बहा तू, आंसू का मोल है तेरे,
खुशियाँ हैं तेरी, सब गम हैं मेरे,
वक़्त बुरा ना रहता, चला जाता है,
तेरा यह उदास मुख, पर नहीं भाता है|
चहकती महकती सी गुड़िया जो है तू,
चहकती महकती सी गुड़िया ही रह तू,
चहकना महकना ही भाता ही तुझको,
चहकना तेरा, महकाता है सबको|
ठहराव थोड़ा बस आता है,
रुकती नहीं है चाल,
भूल के तू सबकुछ,
मचा वही पुराना धमाल|
कुछ होते हैं सच्चे, कुछ होते हैं कच्चे,
पर कुछ तुझ जैसे, बस होते हैं अच्छे,
आंसू न बहा तू, आंसू का मोल है तेरे,
खुशियाँ हैं तेरी, सब गम हैं मेरे|
हुआ मनुष्य लाचार क्यों आखिर
डरता हूँ मैं, डरता क्यों हूँ?
हर पल मैं आखिर मरता क्यों हूँ?
ऐसी कौन सी गली मैं मुडा,
राह सभी बे-राह हुई जो|
पीता जब हूँ, रब दिखता है,
परदे के पीछे सब दिखता है,
काल-चक्र का उल्टा चलता,
सभी सफलता, लगी विफलता|
डर-डर के जीवन, जीता हूँ में,
गम का सागर पीता हूँ में,
इस माहौल में और नहीं अब,
“एक दिन आएगा”, आएगा कब?
रो-रो के जीवन, जहन न होती,
दर-दर की ठोकर, सहन न होती,
हूँ मैं बेबस, जज्बात लदे हैं,
कुछ कर जाता, हाथ बंधे हैं|
हुआ ये कैसे, मनुष्य लाचार
मुझे पता ना, पता है तुमको?
देश मेरे देश मेरे
आजादी की सौंधी खुशबू,
जब नथुनों में भर आती है,
सर उठाकर जीने की,
तब आदत सी हो जाती है|
संघर्ष किया था जब सबने,
वो साल पुराना लगता है,
खून बहाया था जिसने,
वो भाई बेगाना लगता है|
बापू की तस्वीर पर,
बस फूल चड़ाए जाते हैं,
१०% कमीशन पर,
सब काम कराये जाते हैं|
आजादी बोले कुछ, तू सुन,
६३ साल की हो गयी हूँ में,
अब मुझमें वैसी बात नहीं,
मेरे बूढ़े कन्धों में अब,
पहले जैसी जान नहीं|
मेरे बच्चों अब तुम पर है,
की देश का आगे क्या कुछ हो,
अपने सपने तुम खुद देखो,
तुम खुद ही उन्हें साकार करो|
हे माँ तू ऐसा क्यों बोले,
तूने तो बहुत कुछ है दिया,
हिम्मत, सोच और इज्जत का,
जीवन में हमारे प्रकाश किया|
महनत करेंगे सब मिलकर,
देश को आगे ले जायेंगे,
ज़रुरत पड़ी तो फिर एक बार,
हम अपना लहू बहाएंगे|
देश मेरे देश मेरे,
तू ही मेरा तीर्थ है,
तू ही मेरे चारों धाम,
मैं जी लूँगा फिर और कभी,
इस बार करी जां तेरे नाम|
नींद शर्मा गयी
आखें उसके दीदार के नशे में डूबीं थी ऐसे,
की नींद भी शर्मा के रह गयी रात भर,
लफ्ज़ मिले नहीं बहुत सोच कर,
जब मिले तो जबाँ दगा दे गयी,
हाथ घायल थे उसके भर स्पर्श से,
कलम उठाई तो सियाही सूखी निकली,
बहुत हिम्मत कर उस दिन स्टेशन पहुंचे हम,
जालिम ट्रेन को भी उसी दिन समय पर आना था,
निगाहों ने बस उसको ढूँढा सारी तरफ,
जब दिखी तभी बारिश आ गयी,
मिलना था उससे जब, ख्वाबों में,
कातिल एक बार फिर नींद दगा दे गयी|
अनजान हँसी
पिछली सर्दी की बात है ये
घर पर था छुट्टी मना रहा
धुंध की चादर ओड़े था
सूरज भी ठुर ठुर ठिठुर रहा |
सुबह सुबह सी दोपहर थी जो
तफरी करने को निकला मैं
सायें सायें कर हवा कटी
सुड सुड करती सी नाक बही |
साथ मैं मेरे जॉय थी था
गुस्से से मुझको घूर रहा
खुद को तो चले मारने तुम
मेरे को काहे खत्म करो |
तभी दिखी कुछ दूर तलक
एक जानी पहचानी अनजान झलक
वो खिल खिल करती एक मस्त हँसी
जॉय की भी पूँछ हिली |
छम छम करती वो हुस्न परी
गरमाती मौसम तरी तरी
जी भरकर देख ना पाया मैं
कुछ और धुंध सी बही तभी |
वो चेहरा ढूँढ रहा तबसे
एक झलक मांग रहा रबसे
पर मिल ना पाया मुझे कभी
भूलने की कोशिश करुँ अभी |
वो थी एक अनजान हसीं
मेरी धड़कन उसमें है फसीं
पिछली सर्दी की जो है बात
इस सर्दी मैं काश हो मुलाक़ात |
