ArpitGarg's Weblog

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This Animal and You

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I sneeze and you skip a breath,
I fall and you shed a tear,
So much good inside you, Stop.
This animal doesn’t deserve the care.

I err and you take the brunt,
I slur and you just listen,
Perplexes me why you are with me,
This animal doesn’t deserve the care.

Your time, you invest in me,
Your life, you trust with me,
I wonder am I worthy of it, no,
This animal doesn’t deserve the care.

When I hold your hand, the chill,
Your touch of assurance, I am still,
Don’t give me belief, wake up,
This animal doesn’t deserve the care.

My anxieties soothen by mere smile,
I am no substance, just style,
Worry you a lot about me, stop,
This animal doesn’t deserve the care.

The fast, the sacrifice you do for me,
That tied string under the banyan tree,
Quarrel with the maker for me, don’t,
This animal doesn’t deserve the care.

The future together, the hope,
I will make it happen, be assured,
Sadness be false, happiness be true,
This animal cares a lot about you.

Written by arpitgarg

October 3, 2011 at 12:16 pm

सात दिन बरसात के

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भीगी भागी रात थी वो,
घूंघट डाले साथ थी वो,
भूल नहीं मैं क्यूँ पाता,
वो सात दिन बरसात के|
 
असल नहीं वो सूद था बस,
जो मुझे लगा था रब जैसा,
वापस कर दो मुझको अब,
वो सात दिन बरसात के|
 
मुझको होती थी सिरहन सी,
उसकी आँखों की नश्तर से,
खो गए हैं जाने कहाँ गए,
वो सात दिन बरसात के|
 
बारिश की बूंदों का पड़ना,
बिना बात के भी तेरा लड़ना,
छप-छप करती चप्पल जब,
वो सात दिन बरसात के|
 
एक सौंधी सी मट्टी खुशबू,
ठण्ड लगी, सो लगी अलग,
गर्मी करती उसकी सांसें,
वो सात दिन बरसात के|
 
वो बात ना जाने क्या होती,
जो रात जहन में आती थी,
खुस-फुस करती फ़ोन पे तू
वो सात दिन बरसात के|
 
खुशियाँ आयीं बेहिसाब,
गम सारे मेरे हवा हुए,
फिर आयेंगे जल्दी से कब,
वो सात दिन बरसात के||

Written by arpitgarg

September 16, 2011 at 11:01 pm

Posted in Hindi, Love, Poetry

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Why O! Why

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Wipe off that beautiful smile,
I can’t resist it.
Cover up those bare toes,
Temptations building.
The piercing eyes,
All truth they know.
Those luscious lips, look away,
My feet trembling.
Oh that wiggly nose,
Red cherry passion.
A dancing belly perfect,
Why O! Why.
Open up the tied hairs,
Bring down the curtain.

Written by arpitgarg

September 6, 2011 at 2:24 pm

Posted in Love

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नन्ही परी, चंचलता भरी

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एक थी चुलबुल नन्ही सी परी,
चंचलता, चपलता, शरारत भरी,
मुस्कान से उसकी, रोशन था ज़माना,
पड़े सब पीछे, उसको था फंसाना|

आया एक राजकुमार तभी,
सबसे लड़ा और उसे ले उड़ा,
आह भरी, देखते रह गए सभी,
आसां न था, युद्ध हुआ था कड़ा|

पर किस्मत को था मंज़ूर नहीं,
नज़र लगी उसको जमाने की,
अभिमन्यु का भी चक्रव्यूह क्या होगा,
फंसी वो बेचारी जान थी जिसमें|

आंसू न बहा तू, आंसू का मोल है तेरे,
खुशियाँ हैं तेरी, सब गम हैं मेरे,
वक़्त बुरा ना रहता, चला जाता है,
तेरा यह उदास मुख, पर नहीं भाता है|

चहकती महकती सी गुड़िया जो है तू,
चहकती महकती सी गुड़िया ही रह तू,
चहकना महकना ही भाता ही तुझको,
चहकना तेरा, महकाता है सबको|

ठहराव थोड़ा बस आता है,
रुकती नहीं है चाल,
भूल के तू सबकुछ,
मचा वही पुराना धमाल|

कुछ होते हैं सच्चे, कुछ होते हैं कच्चे,
पर कुछ तुझ जैसे, बस होते हैं अच्छे,
आंसू न बहा तू, आंसू का मोल है तेरे,
खुशियाँ हैं तेरी, सब गम हैं मेरे|

Written by arpitgarg

March 26, 2011 at 6:34 pm

हुआ मनुष्य लाचार क्यों आखिर

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डरता हूँ मैं, डरता क्यों हूँ?
हर पल मैं आखिर मरता क्यों हूँ?
ऐसी कौन सी गली मैं मुडा,
राह सभी बे-राह हुई जो|

पीता जब हूँ, रब दिखता है,
परदे के पीछे सब दिखता है,
काल-चक्र का उल्टा चलता,
सभी सफलता, लगी विफलता|

डर-डर के जीवन, जीता हूँ में,
गम का सागर पीता हूँ में,
इस माहौल में और नहीं अब,
“एक दिन आएगा”, आएगा कब?

रो-रो के जीवन, जहन न होती,
दर-दर की ठोकर, सहन न होती,
हूँ मैं बेबस, जज्बात लदे हैं,
कुछ कर जाता, हाथ बंधे हैं|

हुआ ये कैसे, मनुष्य लाचार
मुझे पता ना, पता है तुमको?

Written by arpitgarg

March 15, 2011 at 2:30 pm

शादी मुबारक हो दोस्त!

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बात उन दिनों की है,
जब बेफिक्री का आलम था,
फ़ालतू थे, वक़्त नहीं कम था,
संग में छड़ी थी वो सीड़ियाँ,
संग में लिया था पहला कदम|
 
वो पहला कश, वो पहला जाम,
वो चुराया हुआ पल, वो अधूरा काम,
संग में छेड़ी थी कुडियां,
संग में डाला था दाना,
वो देना सफायियाँ, नया बहाना|
 
हर दिन नयी कसम,
बस आज से पढ़ेंगे,
नया अध्याय, शुरू करेंगे,
और वही हर बार का काम,
दिन को लुक्खागिरी, रात को जाम|
 
वो संपादकीय लेख,
वो अपनी धौंस जमाना,
देख लेंगे साले को, अगला लेख उस पे,
पता नहीं है पंगा लिया है किस से,
साथ-साथ थे, इसलिए सब कर गए,
वरना यही कहते कि, ‘… लग गए’|
 
वो पालतू बिल्ली जो थी,
आज भी याद आती है,
बिलोंटा देखते ही,
उसकी चीख निकल जाती थी|
 
संग में मिलकर दुनिया को गालियाँ दी,
अलग-अलग शहर चले गए,
नज़र लग गयी उसी ज़माने की|
 
तू अब नयी ज़िन्दगी शुरू करने जा रहा है,
बहुत खुश हूँ दोस्त तेरे लिए,
तू सलामत रहे यही दुआ करूंगा,
क्यूंकि करता हूँ में खुद से भी बहुत प्यार, 
मेरी उम्र तुझे लग जाए, यह नहीं कहूँगा|
 
तेरी होनी वाली जीवन साथी से,
तुझे मिले अपार प्रेम,
जब कभी तेरे घर आऊँ,
वैसे तो दोस्तों से कम ही मिल पाते हैं,
एक कप चाय पिला दे भाभी बस,
यह ना कहे, “कैसे-कैसे दोस्त आ जाते हैं”?

एक सताती बात

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एक सताती बात,
कि होता क्यूं है तांडव,
बने सब कौरव पांडव,
बीच बाज़ार के आगे,
न कोई पर्दा ढाके,
न कोई अपने क्यूं है,
न आते सपने क्यूँ हैं,
रात दिन, दिन रात|

एक सताती बात,
कि क्यूं कोई भूखा सोता,
क्यूं कोई बच्चा रोता,
अनाज है धरती देती,
मुफत, ना पैसे लेती,
क्यूं फिर सबको न मिलती,
फ़कत दो वक़्त की रोटी,
रात दिन, दिन रात|

एक सताती बात,
कि क्यूं कोई इतना लोभी,
ना आती लाज जराभी,
जब है कोई बहू जलाता,
चंद रुपयों की खातिर,
बने कोई इतना शातिर,
कि बस पैसा ललचाये,
रात दिन, दिन रात|

एक सताती बात,
बुढ़िया की किस्मत कैसी,
कि उसकी आँखें तरसी,
पर उसका पूत ना पूछे,
उसे तो बोझ लगे अब,
जब निकले सब मतलब,
कहाँ पे हुई थी गलती,
यही ईश्वर से पूछे,
रात दिन, दिन रात|

एक सताती बात,
कि देखो खाखी-खादी,
करें देश बर्बादी,
औ हम सब चुप कर देखें,
बेबस धृतराष्ट्र के जैसे,
वतन का हरते चीर,
अरे अब जाग भी जा तू,
तुझे धरती है पुकारे,
रात दिन, दिन रात|

देश मेरे देश मेरे

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आजादी की सौंधी खुशबू,
जब नथुनों में भर आती है,
सर उठाकर जीने की,
तब आदत सी हो जाती है|

संघर्ष किया था जब सबने,
वो साल पुराना लगता है,
खून बहाया था जिसने,
वो भाई बेगाना लगता है|

बापू की तस्वीर पर,
बस फूल चड़ाए जाते हैं,
१०% कमीशन पर,
सब काम कराये जाते हैं|

आजादी बोले कुछ, तू सुन,
६३ साल की हो गयी हूँ में,
अब मुझमें वैसी बात नहीं,
मेरे बूढ़े कन्धों में अब,
पहले जैसी जान नहीं|

मेरे बच्चों अब तुम पर है,
की देश का आगे क्या कुछ हो,
अपने सपने तुम खुद देखो,
तुम खुद ही उन्हें साकार करो|

हे माँ तू ऐसा क्यों बोले,
तूने तो बहुत कुछ है दिया,
हिम्मत, सोच और इज्जत का,
जीवन में हमारे प्रकाश किया|

महनत करेंगे सब मिलकर,
देश को आगे ले जायेंगे,
ज़रुरत पड़ी तो फिर एक बार,
हम अपना लहू बहाएंगे|

देश मेरे देश मेरे,
तू ही मेरा तीर्थ है,
तू ही मेरे चारों धाम,
मैं जी लूँगा फिर और कभी,
इस बार करी जां तेरे नाम|

Written by arpitgarg

December 7, 2010 at 12:00 am

नींद शर्मा गयी

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आखें उसके दीदार के नशे में डूबीं थी ऐसे,
की नींद भी शर्मा के रह गयी रात भर,
लफ्ज़ मिले नहीं बहुत सोच कर,
जब मिले तो जबाँ दगा दे गयी,
हाथ घायल थे उसके भर स्पर्श से,
कलम उठाई तो सियाही सूखी निकली,
बहुत हिम्मत कर उस दिन स्टेशन पहुंचे हम,
जालिम ट्रेन को भी उसी दिन समय पर आना था,
निगाहों ने बस उसको ढूँढा सारी तरफ,
जब दिखी तभी बारिश आ गयी,
मिलना था उससे जब, ख्वाबों में,
कातिल एक बार फिर नींद दगा दे गयी|

Written by arpitgarg

August 28, 2010 at 3:18 am

अनजान हँसी

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पिछली सर्दी की बात है ये
घर पर था छुट्टी मना रहा
धुंध की चादर ओड़े था
सूरज भी ठुर ठुर ठिठुर रहा |

सुबह सुबह सी दोपहर थी जो
तफरी करने को निकला मैं
सायें सायें कर हवा कटी
सुड सुड करती सी नाक बही |

साथ मैं मेरे जॉय थी था
गुस्से से मुझको घूर रहा
खुद को तो चले मारने तुम
मेरे को काहे खत्म करो |

तभी दिखी कुछ दूर तलक
एक जानी पहचानी अनजान झलक
वो खिल खिल करती एक मस्त हँसी
जॉय की भी पूँछ हिली |

छम छम करती वो हुस्न परी
गरमाती मौसम तरी तरी
जी भरकर देख ना पाया मैं
कुछ और धुंध सी बही तभी |

वो चेहरा ढूँढ रहा तबसे
एक झलक मांग रहा रबसे
पर मिल ना पाया मुझे कभी
भूलने की कोशिश करुँ अभी |

वो थी एक अनजान हसीं
मेरी धड़कन उसमें है फसीं
पिछली सर्दी की जो है बात
इस सर्दी मैं काश हो मुलाक़ात |

Written by arpitgarg

July 5, 2010 at 12:36 pm