ArpitGarg's Weblog

An opinion of the world around me

Archive for the ‘Hindi’ Category

देश मेरे देश मेरे

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आजादी की सौंधी खुशबू,
जब नथुनों में भर आती है,
सर उठाकर जीने की,
तब आदत सी हो जाती है|

संघर्ष किया था जब सबने,
वो साल पुराना लगता है,
खून बहाया था जिसने,
वो भाई बेगाना लगता है|

बापू की तस्वीर पर,
बस फूल चड़ाए जाते हैं,
१०% कमीशन पर,
सब काम कराये जाते हैं|

आजादी बोले कुछ, तू सुन,
६३ साल की हो गयी हूँ में,
अब मुझमें वैसी बात नहीं,
मेरे बूढ़े कन्धों में अब,
पहले जैसी जान नहीं|

मेरे बच्चों अब तुम पर है,
की देश का आगे क्या कुछ हो,
अपने सपने तुम खुद देखो,
तुम खुद ही उन्हें साकार करो|

हे माँ तू ऐसा क्यों बोले,
तूने तो बहुत कुछ है दिया,
हिम्मत, सोच और इज्जत का,
जीवन में हमारे प्रकाश किया|

महनत करेंगे सब मिलकर,
देश को आगे ले जायेंगे,
ज़रुरत पड़ी तो फिर एक बार,
हम अपना लहू बहाएंगे|

देश मेरे देश मेरे,
तू ही मेरा तीर्थ है,
तू ही मेरे चारों धाम,
मैं जी लूँगा फिर और कभी,
इस बार करी जां तेरे नाम|

Written by arpitgarg

December 7, 2010 at 12:00 am

नींद शर्मा गयी

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आखें उसके दीदार के नशे में डूबीं थी ऐसे,
की नींद भी शर्मा के रह गयी रात भर,
लफ्ज़ मिले नहीं बहुत सोच कर,
जब मिले तो जबाँ दगा दे गयी,
हाथ घायल थे उसके भर स्पर्श से,
कलम उठाई तो सियाही सूखी निकली,
बहुत हिम्मत कर उस दिन स्टेशन पहुंचे हम,
जालिम ट्रेन को भी उसी दिन समय पर आना था,
निगाहों ने बस उसको ढूँढा सारी तरफ,
जब दिखी तभी बारिश आ गयी,
मिलना था उससे जब, ख्वाबों में,
कातिल एक बार फिर नींद दगा दे गयी|

Written by arpitgarg

August 28, 2010 at 3:18 am

अनजान हँसी

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पिछली सर्दी की बात है ये
घर पर था छुट्टी मना रहा
धुंध की चादर ओड़े था
सूरज भी ठुर ठुर ठिठुर रहा |

सुबह सुबह सी दोपहर थी जो
तफरी करने को निकला मैं
सायें सायें कर हवा कटी
सुड सुड करती सी नाक बही |

साथ मैं मेरे जॉय थी था
गुस्से से मुझको घूर रहा
खुद को तो चले मारने तुम
मेरे को काहे खत्म करो |

तभी दिखी कुछ दूर तलक
एक जानी पहचानी अनजान झलक
वो खिल खिल करती एक मस्त हँसी
जॉय की भी पूँछ हिली |

छम छम करती वो हुस्न परी
गरमाती मौसम तरी तरी
जी भरकर देख ना पाया मैं
कुछ और धुंध सी बही तभी |

वो चेहरा ढूँढ रहा तबसे
एक झलक मांग रहा रबसे
पर मिल ना पाया मुझे कभी
भूलने की कोशिश करुँ अभी |

वो थी एक अनजान हसीं
मेरी धड़कन उसमें है फसीं
पिछली सर्दी की जो है बात
इस सर्दी मैं काश हो मुलाक़ात |

Written by arpitgarg

July 5, 2010 at 12:36 pm

रैगिंग

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बड़े जोश से चले निकल के,
नन्हे माँ के लाल रे|
मन में जैसे उछल रहे थे,
बन्दर डाल डाल रे||

स्कूल से जाना था कॉलेज,
फुदक रही थी चाल रे|
हृदय में थी नयी उमंगें,
खोजेंगे जल ताल रे||

कॉलेज का था एक हॉस्टल,
कमरे थे बेहाल रे|
देख उनको बुद्धि ठनकी,
आया घर का ख्याल रे||

घूर रहे थे सभी सीनिअर,
होठ थे उनके लाल रे|
सोच रहे थे आया मुर्गा,
रैगिंग ले ही डाल रे||

पुछा नाम पता frequency,
हुए शर्म से ला रे|
पकड़ के ले गए नाई के,
कटवाए हमारे बाल रे||

फिर चला चल चित्र का दौर,
इज्जत ली निकाल रे|
Superman हमें बनाया,
He-man बनकर किया धमाल रे||

गर्ल्स हॉस्टल के चक्कर लगवाए,
क्या क्या सवाल न हमसे पुछवाये|

चवन्नी अठन्नी थी हमने निकाली,
हस हस के बेहाल रे|
दुपक रहे थे हम कमरों में,
सीना अन्दर दाल रे||

धीरे धीरे थी बात खुली,
पूरी तस्वीर थी साफ़ धुली,
वो तो सिर्फ एक मुखौटा था,
सच्चाई से कुछ छोटा था||

पूरा परिदृश्य ही बदल गया,
हॉस्टल लगने लगा नया,
सब सीनिअर अपने दोस्त बने,
साथ में मौज मस्ती करे,
P.D.P तो एक बहाना था,
सबको नजदीक जो आना था||

Written by arpitgarg

May 13, 2010 at 12:23 pm

बदिरा

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केशव के काले कुंज से,
कहा था किशन की कुटीर से,
कब तक करोगे कोप कल्लोल,
काले केश से काले मेघों ने,
कबसे कहीं न काज किया,
कुपित हुए वे कलयुग के कर्मा के कर्मों से,
किसने क्या कर दिया,
कबसे कोख ने फल ना दिया,
काहे का ये कोप भवन,
काहे की ये कठिनाई,
कबसे कह रहे हैं कब आओगे,
काले केशों से कुछ कोमल बरसाओगे,
कोनों तक में कालिख छाई,
ज्ञान का कमरक पियो कृपाई,
कभी कुछ कुबेर के कानों में,
कूकेगी कोयल कूँ कूँ,
कुछ तो कवलित हो कठिनाई,
कह कुछ मत कर्म कर भाई|

Written by arpitgarg

February 15, 2010 at 1:43 pm

Chatur Speech in Hindi: 3 Idiots

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आदरणीय सभापति महोदय, अतिथि विशेष शिक्षण मंत्री श्री आर. डी. त्रिपति [त्रिपाठी] जी, माननीय शिक्षकगण और मेरे पियारे [प्यारे] सहपतियो [सहपाठियों]| आज अगर I.C.E आसमान की बुलांदियो [बुलंदियों] को छू राहा [रहा] है, तो उसका श्रेय सिर्रफ [सिर्फ] एकिंसान [एक इंसान] को जाता है, श्री वीरू सहस्त्र बुद्धे| Give him a a big hand . He is a great guy really .

पिछले बत्तीस साल से इन्होने निरंतर इस कॉलेज में बलत्कार [बलात्कार] पे बलत्कार किये, उम्मीद है आगे बी [भी] करते रहेगे [रहेंगे ]| हमें तो आश्चर्य होता है कि एक इंसान अपने जीवन काल में इतनी बलत्कार कैसी कर सकता है| इन्होने कड़ी तपस्या से अपने आपको इस काबिल बुनाया [बनाया ] है| वक़्त का सही उपयोग, घंटे का पूर्ण इस्तेमाल कोई इनसे सीके [सीखे ]| सीके, इनसे सीके| आज हम सब छात्र यहाँ हैं, कल देश-विदेश में फेल [फैल] जायेंगे| वादा है आपसे जिस देश में होंगे वहां बलत्कार करेंगे| I.C.E का नाम रोशन करेंगे| दिका [दिखा] देंगे सबको जो बलत्कार करने की शमता यहाँ के छात्रों में है वो संसार के किसी छात्रों में नहीं| No other छात्र,  No other छात्र|

आदरणीय मंत्रीजी नमस्कार, आपने इस संस्थान को वो चीस [चीज़] दी जिसकी हमें सख्त ज़रुरत थी| स्तन! स्तन होता सबी [सभी] के पास है, सब छुपा के रकते है, देता कोई नई [नहीं]| आपने अपना स्तन इस बलत्कारी पुरुष के हाथ में दिया है| अब देकिये यह कैसा इसका उपयोग करता है|

इस स्वर्ण अवसर पर एक श्लोक याद आ रहे है…

उत्तमम दधददात पादम,
मध्यम पादम थुचुक थुचुक,
घनिष्ठः थुड़थुडी पादम,
सुरसुरी प्राण घातकम|

Written by arpitgarg

January 7, 2010 at 3:12 pm

Lyrics (Hindi): Jeene Do, 3 Idiots

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Once in a while you hear a song that makes you nostalgic. Well this one does. Took me back to the inter hostel singing competitions. Don’t know where this song will be inserted in the movie. I would like it to be a stage performance by the college band.  Let me live, at least for a moment. This is to the society which takes the childhood away.

सारी उम्र हम,
मर मर के जी लिए,
एक पल तो अब हमें,
जीने दो…जीने दो – ३

Na Na Na Na
Na Na Na Na Na Na

Give Me Some Sunshine,
Give Me Some Rain,
Give Me Another Chance,
I Wanna Grow Up Once Again.  – 2

कन्धों को किताबों के बोझ ने झुकाया,
रिश्वत देना तो खुद पापा ने सिखाया,
99% Marks लाओगे तो घड़ी वरना छड़ी,

लिख लिख कर पड़ा हथेली पर,
Alpha, Beta, Gamma का छाला,
Concentrated H2SO4 ने पूरा,
पूरा बचपन जला डाला,

बचपन तो गया,
जवानी भी गयी,
एक पल तो अब हमें,
जीने दो जीने  दो – २

सारी उम्र हम,
मर मर के जी लिए,
एक पल तो अब हमें,
जीने दो…जीने दो,

Na Na Na Na
Na Na Na Na Na Na

Give Me Some Sunshine,
Give Me Some Rain,
Give Me Another Chance,
I Wanna Grow Up Once Again.  – 2

Na Na Na Na
Na Na Na Na Na Na

Written by arpitgarg

November 17, 2009 at 2:30 pm

चुनावी दंगल

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आया है फिर से महाकुम्भ
चिंघाड़ उठी, लो भरा दंभ
सारे मिलकर जिसे खेले हैं
इसे चुनाव प्रक्रिया बोले हैं|

चुनाव आयोग है इसका अंपायर
फुस्स है एकदम, जैसे फटा टायर
घुड़की देने में उस्तादी है
पर गरजने वाले बरसे हैं कभी|

कई दल इस दंगल में खेले हैं
सब इसी दल-दल के मैले हैं
सब बजाते अपनी शहनाई हैं
पांच साल बाद आम आदमी की रौनक छायी है|

पैसे, कपडे, साईकल, टीवी
सब बटते हैं इस हुज्जुम में
एक-एक वोट पे न्योछावर
सौ- सौ के नोट की गड्डी है|

सभी प्रकार के अपराधी
अभी जेल से छूटे हैं
सब वोट मांगने निकले हैं
पर जो खुद ही है कंगाल
वो वोट के सिवा देगा भी क्या|

चोर-उच्चके, खूनी-कातिल
बस इनकी ही सुनवाई है
यह बन जो गए अपने नेता
बस राम तेरी ही दुहाई है|

एक तरफ है कठपुतली
एक तरफ खड़ा बुजुर्ग सिपाही है
दोनों में से किसको चुनू
यह असमंजस होता तो अच्छा था
पर हाय रे में तो सोचूँ हूँ
इसको भी नहीं, उसको भी नहीं|

इसी बात की आस है बस
कि कुछ ऐसा हो, जो सच्चा हो
और पांच साल के बाद नहीं
आम आदमी का हर दिन अच्छा हो|

Written by arpitgarg

April 1, 2009 at 11:56 am

फिर वो पुरानी याद आई

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क्यों रह रह कर आते सपने,
उन पीर परायी रातों के,
क्यों होती है दिल में हलचल,
उन नई पुरानी बातों से,
क्यों जहन में अटकी हैं यादें,
जब गलियों की कच्ची सड़कें,
सावन में पक्की लगती थीं,
जब टूटी सायिकल की गद्दी,
मोटर से मुलायम लगती थी,
जब आंच पे पकती रोटी भी,
जायके में अव्वल लगती थी,
क्या दौर था वो, कुछ और था वो,
सुख चैन का बस सिरमौर था जो,

वो समां पुराना चला गया,
कुछ और देर तक रहता फिर,
मिल बैठ के बातें करते हम,
कोई रीत पुरानी गाता में,
कुछ गम मिल जुलकर करते कम|

मैदान में वो गिरना पड़ना,
हर बात पे बालक हठ करना,
जो हवा बनाई डींगे हांक,
सब अव्वल बैटिंग देते थे,
जो आड़े आया कोई सो,
अपने सुदबुध में ऐंठे थे,
जो पेड़ सुनहरा गुलमोहरी,
दिनभर हरिया बरसाता था,
वोह बेल हवा में टूट टूट,
और नीम का मस्ती लहराना,
क्या दौर था वो, कुछ और था वो,
सुख चैन का बस सिरमौर था जो,

वो समां पुराना चला गया,
कुछ और देर तक रहता फिर,
मिल बैठ के बातें करते हम,
कोई रीत पुरानी गाता में,
कुछ गम मिल जुलकर करते कम|

शादी का मौसम सुनते ही,
मुहँ में पानी का आ जाना,
ख्वाब में भी खुरचन लड्डू की,
आपस में कुश्ती करवाना,
और कचौड़ी पूड़ी  से,
घी का टप टप रिसते जाना,
और नहीं, बस और नहीं,
एक और तो लो, तुम्हें मेरी कसम,
भाभी देवर का टकराना,
क्या दौर था वो, कुछ और था वो,
सुख चैन का बस सिरमौर था जो,

वो समां पुराना चला गया,
कुछ और देर तक रहता फिर,
मिल बैठ के बातें करते हम,
कोई रीत पुरानी गाता में,
कुछ गम मिल जुलकर करते कम|

बीमार था जब, सब याद है अब,
दादी ने नजर उतारी थी,
अलाएँ बालाएं सब टल जाएँ,
इस बात की दुआ पुकारी थी,
दीवाली में पूरे कुनबे का,
मिल जुलकर बाड़ा चमकाना,
कुछ दीपक से, कुछ बत्ती से,
सब ओर प्रकाश का टिम टाना,
सब बच्चों को नगदी मिलना,
बड़ों का आशीर्वाद कहलाता था,
एक सुई, एक धागे में,
सारा संसार पिर जाता था,
क्या दौर था वो, कुछ और था वो,
सुख चैन का बस सिरमौर था जो,

वो समां पुराना चला गया,
कुछ और देर तक रहता फिर,
मिल बैठ के बातें करते हम,
कोई रीत पुरानी गाता में,
कुछ गम मिल जुलकर करते कम|

हो गई पुरानी सब बातें,
यादें भी धुंधली हो हैं चली,
पर मन जाने क्यों अटका है,
कभी ना जाना, उसी गली,
कभी कभी एक आस जगे,
क्यों ना कल जब सो के उठें,
तो सुबह उन्हीं गलियों में हो,
रात उन्हीं अठखलियों से हो,
पर बीत चुका कब आया है,
बीते की याद ही आई है,
क्या दौर था वो, कुछ और था वो,
सुख चैन का बस सिरमौर था जो,

वो समां पुराना चला गया,
कुछ और देर तक रहता फिर,
मिल बैठ के बातें करते हम,
कोई रीत पुरानी गाता में,
कुछ गम मिल जुलकर करते कम|

Written by arpitgarg

February 20, 2009 at 7:57 am

भूली बिसरी यादें

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कहाँ-कहाँ से पकड़ से लाये,
कैसे करतब करवाने को|
बंद कर दिए एक पिंजरे मैं,
आपस मैं खोपड़ टकराने को|

तीन मोर और दो थी मोरनी,
नई-नई पहचान हुई|
पग-पग कर थी राह जोड़नी,
कच्चा था धागा टूटी थी सुई|

प्यार था उमड़ा जिन बातों पर,
वो बातें कड़वी याद हुईं|
एक हाथ से ताली नहीं बजती,
कहावत ये साकार हुई|

मोर-मोरनी लड़े औ झगडे,
अपनों का नाम खराब किया|
होते हैं जीवन में लाखों लफड़े,
पर हाय ये विष क्यों सबने पिया|

नजरें मिला पाओगे अब तुम,
दर्पण मैं अपने आप से क्या|
गिर कर भी उठ पाओगे क्या,
नजरों मैं अपने आप के तुम|

भगवान् इन्हें सदबुद्धि देना,
आगें करतब कुछ ऐसा करें|
सब देखें और गुणगान करें,
कि मोर-मोरनी हों तो ऐसे,
और सभी का ये सम्मान करें|

Written by arpitgarg

January 14, 2009 at 10:08 am