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ऐसा नहीं है
ऐसा नहीं था कि मुझे कुछ गम था,
पर जीवन में लगता कुछ कम था|
पत्र तो था पर मंजिल थी लापता,
अगले मोड़ पे टकराइगी, क्या था पता||
ऐसा नहीं था कि मैं कोई विश्वामित्र था,
पर तपस्या थी हकीकत, न चल-चित्र था|
इन्द्र की बारिश, ये दिल सह न सका,
जब तन मन तपाने बनी तू मेनका|
ऐसा नहीं था कि कभी मस्ती नहीं थी,
पर अपनी कोई अलग हस्ती नहीं थी|
दौड़ा गयी तू सिरहन, मिली नयी राह,
कट रहा था जीवन, आई नयी चाह|
ऐसा नहीं था कि कोई पगला था मैं,
हाँ समझदारी में थोडा कंगला था मैं|
‘हड़बड़ी कबतक, आदतें सुधारो’, तूने ज्ञान दिया,
ज्यादा नहीं गर थोड़ा तो समझदार किया|
ऐसा नहीं था कि दिल ये पत्थर था,
पर धड़कने को नहीं ये तत्पर था|
मौत के जैसे आई औ जिंदगी दे गयी,
दिल को धड़का, मेरी सांसें ले गयी|
ऐसा नहीं है तू मुझे भाती नहीं,
या सुबह शाम तेरी याद आती नहीं|
सहे हैं दुःख तूने, और दे नहीं सकता,
असमंजस है मेरा, वक़्त ले नहीं सकता|
सारे जहाँ से अच्छा
सारे जहाँ से अच्छा, कहता था एक बच्चा,
हम बुलबुलें हैं इसकी, कहती थी दादी उसकी,
ग़ुरबत में हों अगर हम, विश्वास न हो बस कम,
रहता हो दिल वतन में, फक्र से न घुटन में|
परवत वो सब से ऊँचा, सबने लहू से सींचा,
गोदी में हज़ारों नदियाँ, हो गयी हैं जिनको सदियाँ,
ए आब-ए-रूद-ए-गंगा, दुबकी जो कर दे चंगा,
मज़हब नहीं सिखाता बैर, असल बात जाने दो खैर|
हिन्दी हैं हम वतन है, दुश्मन करें जतन हैं,
यूनान-ओ-मिस्र-ओ-रोमा, कुछ गए, कुछ को कोमा,
हस्ती मिटती नहीं हमारी, झूझने की है बीमारी,
हम तुझको क्यों सुनाएं, दर्द-ए-निहाँ हमारा|
PS: My tribute to Saare Jahan se Accha by Muhammad Iqbal
जल उठी धरती फिर
फिर हुआ स्तम्भ विस्तंभ आज,
छाती चौड़ी, अब जीता डरके,
गम में मुस्कराना, गहरा राज|
कुछ घना, कुछ गहरा, एक साया,
चहचहा उठे पंची सारे, सांझ भई,
धड़कन बढ़ी, सकुचा, दिल घबराया,
पुराने सब काल हुए, दुर्घटना नई|
कितने हँसे, कितने रोये, क्या गिनती,
मुखौटे से दिखे सब, मूक मय अवाक,
ग्रसित हैं, मुक्त करो, बस यही विनती,
कुछ न बचा, साथ गयी झूठी साख|
एक बटन दबा, एक घनघोर ध्वनी,
चिथड़े उड़े, हर ओर गिरे, सब शांत,
चीख भी उसकी, न निकली, न सुनी,
रो उठे सागर, हिंद से लेकर प्रशांत|
लाचार लगे अब, कुछ न कर पाऊँ,
शीश महल, अब नहीं बचा, चूर-चूर,
घर कब्जाया, खतरा, अब कहाँ जाऊं,
पास था साहिल, लगे अब दूर-दूर|
शैतान था वो, कुकृत्य किया जिसने,
बेबाक जिंदगी, न कभी जिए डरके,
सरफ़रोश हुआ, तृप्त-अमृत पिया उसने
जल उठी धरती जब धू धू करके|
न भूल सका
पहली बार जो तुझको देखा था,
शरमाई औ सकुचाई सी थी,
कुछ डरी औ कुछ घबराई सी थी,
भूला मैं यह सब कुछ, न भूल सका,
बस तेरे चेहरे पर आती हुई वो लट|
बच रही थी तू मुझसे, कौन है यह?
शायद कुछ ज्यादा ही उतावला था मैं,
तिर्छी निगाहों से वैसे, देख रही थी तू,
भूला मैं यह सब कुछ, न भूल सका,
बस तेरी वो पहली नश्तर सी हँसी|
दो घंटे इंतज़ार करवाया था तूने,
पहली बार मिले थे जब हम तुम,
ऐसी नादान बन रही थी तू, क्या कहता,
भूला मैं यह सब कुछ, न भूल सका,
बस तेरी वो बिंदी जो कुछ टेढ़ी थी|
लम्बी लम्बी बातें तेरी, नहीं ख़त्म,
जो होती थी, पक-पक पक-पक तेरी,
न जाने कब अच्छी लगने लगी थी,
भूला मैं यह सब कुछ, न भूल सका,
बस तेरा वो तकिया-कलाम, हाय|
निगाहों का नशा तेरा, रिश्ता मेरा,
तेरा रूठना, मनाना मेरा, पल छिन,
वो प्यार से तेरा मुझ पे मुक्के बरसना,
भूला मैं यह सब कुछ, न भूल सका,
बस तेरी वो आखों की सरफरोशी|
तेरा मेरे पास आना, दूर जाना, सताना,
रोकना मुझे, प्यार बरसना, कतराना,
तेरे नखरे सहना, तुझे कुछ न कहना,
भूला मैं यह सब कुछ, न भूल सका,
बस वो सारे ख्वाब जो तेरे नाम किये||
ठर्कीपन
बात है उस दिन की, पैदा हुआ था मैं,
सफ़ेद लिबास में पुचकार रही थी वो,
उम्र न देखी, वक़्त न देखा, बस ली फिर्की,
नर्स को ही देखकर हो गया मैं ठर्की|
नर्सरी क्लास का है किस्सा यह,
आगे की कुर्सी पे बैठी थी वो,
खींच दी आहिस्ता से चोटी उसकी,
उसकी नन्ही जुल्फों में उलझा ये ठर्की|
चौथी कक्षा की टीचर जी,
हर बच्चा उन पे मरता था,
कितनों से लड़ा, कितनी तोड़ी बत्तीसी,
ब्लैक बोर्ड की लिखाई ने कर दिया ठर्की|
स्कूल के मास्टर की कोचिंग जाता था,
कुछ अपनापन था वहां, दिल को भाता था,
नंबर अब जो भी दे वो, बेटी भा गयी मास्टर की,
फेल और पास क्या जाने, यह मन तो है ठर्की|
बचपन का दोस्त था जो, एक दिन बोला वो,
नीले दुपट्टे में आई है जो, दिल ले गयी मेरा,
कहने को भाभी होनी थी, पर मर्जी इश्वर की,
समझा लूँगा दोस्त को मैं, न समझे ये दिल ठर्की|
कम्पटीशन का पेपर देने बैठा था, आर या पार,
दो सीट आगे बैठी थी, दिल हुआ बेकरार,
सलेक्श हो जाएगा अगले साल सही,
आज जी भर के देखूं उसको, हो कर ठर्की|
ऑफिस में तो सुधर जा अब, सीधा बन,
शिकायत करेगी, जायेगी नौकरी, होगी कुर्की,
जान दे, दूसरी मिल ही जायेगी नौकरी तो,
आज रोका तो बुरा मान जाएगा दिल ठर्की|
बचपन में सीखा था मैंने,
कैसा भूल गया यह ज्ञान,
अब ना भूलूंगा जीवन भर,
हर दिन जाप करूंगा, जी कर, मर कर|
इश्क में पड़ेगा तो जान से जाएगा,
ऐसा घुसेगा, पानी नहीं पायेगा,
जूतों से पिटवाएगी यह लड़की,
नज़र रख सीधी, मत बन ठर्की||
कौन है तू
नन्ही परी, चंचलता भरी
एक थी चुलबुल नन्ही सी परी,
चंचलता, चपलता, शरारत भरी,
मुस्कान से उसकी, रोशन था ज़माना,
पड़े सब पीछे, उसको था फंसाना|
आया एक राजकुमार तभी,
सबसे लड़ा और उसे ले उड़ा,
आह भरी, देखते रह गए सभी,
आसां न था, युद्ध हुआ था कड़ा|
पर किस्मत को था मंज़ूर नहीं,
नज़र लगी उसको जमाने की,
अभिमन्यु का भी चक्रव्यूह क्या होगा,
फंसी वो बेचारी जान थी जिसमें|
आंसू न बहा तू, आंसू का मोल है तेरे,
खुशियाँ हैं तेरी, सब गम हैं मेरे,
वक़्त बुरा ना रहता, चला जाता है,
तेरा यह उदास मुख, पर नहीं भाता है|
चहकती महकती सी गुड़िया जो है तू,
चहकती महकती सी गुड़िया ही रह तू,
चहकना महकना ही भाता ही तुझको,
चहकना तेरा, महकाता है सबको|
ठहराव थोड़ा बस आता है,
रुकती नहीं है चाल,
भूल के तू सबकुछ,
मचा वही पुराना धमाल|
कुछ होते हैं सच्चे, कुछ होते हैं कच्चे,
पर कुछ तुझ जैसे, बस होते हैं अच्छे,
आंसू न बहा तू, आंसू का मोल है तेरे,
खुशियाँ हैं तेरी, सब गम हैं मेरे|
