ArpitGarg's Weblog

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ऐसा नहीं है

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ऐसा नहीं था कि मुझे कुछ गम था,
पर जीवन में लगता कुछ कम था|
पत्र तो था पर मंजिल थी लापता,
अगले मोड़ पे टकराइगी, क्या था पता||

ऐसा नहीं था कि मैं कोई विश्वामित्र था,
पर तपस्या थी हकीकत, न चल-चित्र था|
इन्द्र की बारिश, ये दिल सह न सका,
जब तन मन तपाने बनी तू मेनका|

ऐसा नहीं था कि कभी मस्ती नहीं थी,
पर अपनी कोई अलग हस्ती नहीं थी|
दौड़ा गयी तू सिरहन, मिली नयी राह,
कट रहा था जीवन, आई नयी चाह|

ऐसा नहीं था कि कोई पगला था मैं,
हाँ समझदारी में थोडा कंगला था मैं|
‘हड़बड़ी कबतक, आदतें सुधारो’, तूने ज्ञान दिया,
ज्यादा नहीं गर थोड़ा तो समझदार किया|

ऐसा नहीं था कि दिल ये पत्थर था,
पर धड़कने को नहीं ये तत्पर था|
मौत के जैसे आई औ जिंदगी दे गयी,
दिल को धड़का, मेरी सांसें ले गयी|

ऐसा नहीं है तू मुझे भाती नहीं,
या सुबह शाम तेरी याद आती नहीं|
सहे हैं दुःख तूने, और दे नहीं सकता,
असमंजस है मेरा, वक़्त ले नहीं सकता|

Written by arpitgarg

August 20, 2011 at 2:45 am

सारे जहाँ से अच्छा

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सारे जहाँ से अच्छा, कहता था एक बच्चा,
हम बुलबुलें हैं इसकी, कहती थी दादी उसकी,
ग़ुरबत में हों अगर हम, विश्वास न हो बस कम,
रहता हो दिल वतन में, फक्र से न घुटन में|

परवत वो सब से ऊँचा, सबने लहू से सींचा,
गोदी में हज़ारों नदियाँ, हो गयी हैं जिनको सदियाँ,
ए आब-ए-रूद-ए-गंगा, दुबकी जो कर दे चंगा,
मज़हब नहीं सिखाता बैर, असल बात जाने दो खैर|

हिन्दी हैं हम वतन है, दुश्मन करें जतन हैं,
यूनान-ओ-मिस्र-ओ-रोमा, कुछ गए, कुछ को कोमा,
हस्ती मिटती नहीं हमारी, झूझने की है बीमारी,
हम तुझको क्यों सुनाएं, दर्द-ए-निहाँ हमारा|

PS: My tribute to Saare Jahan se Accha by Muhammad Iqbal

Written by arpitgarg

August 13, 2011 at 3:00 pm

आँखों में हैं ऐसी तन्हाइयां

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मेरी आँखों में हैं ऐसी तन्हाइयां,
कि नींदों में आती बस अंगड़ाइयां|
लगे है बेगाना कुछ ऐसा जहां,
जैसे ओझिल है रातों को परछाइयां|

पास होकर भी वो दूर जाती रही,
मार ठोकर हमें, मुस्कराती रही|
उसकी लानत में है एक ऐसा मज़ा,
बिना उसके ताने, यह जीवन सजा|

उन बातों की यादें, हैं आती मुझे,
कि रातों कि आहट में खोजूं तुझे|
तेरी मुस्कराहट, एक ऐसा नशा,
उन मदहोशियों में, यह बेबस फसा|

जंगल का राजा, होने दो शेर को,
एक दिन तो खदेड़ा वो भी जाएगा|
अगर पास हो शेरनी,  तेरे जैसी तो,
खदेड़ने पर भी राजा वो कहलायेगा|

ऐ काश, रेत रूकती मेरे हाथ में,
समय को भी थमने को कह पाता मैं|
तो साहिल से कराता में पहचां तेरी,
और चुपके से तुझको सता जाता मैं|

होश वालों को होती नहीं जो खबर,
वो खबर मैं नशे में सुनाता रहा|
रात भर मेघ काले, बरसते रहे,
रात भर गीत, मैं गुनगुनाता रहा|

मेरी आँखों में हैं ऐसी तन्हाइयां,
कि नींदों में आती बस अंगड़ाइयां|
लगे है बेगाना कुछ ऐसा जहां,
जैसे ओझिल है रातों को परछाइयां||

Written by arpitgarg

July 25, 2011 at 10:51 pm

जल उठी धरती फिर

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जल उठी धरती फिर धू धू करके,
फिर हुआ स्तम्भ विस्तंभ आज,
छाती चौड़ी, अब जीता डरके,
गम में मुस्कराना, गहरा राज|

कुछ घना, कुछ गहरा, एक साया,
चहचहा उठे पंची सारे, सांझ भई,
धड़कन बढ़ी, सकुचा, दिल घबराया,
पुराने सब काल हुए, दुर्घटना नई|

कितने हँसे, कितने रोये, क्या गिनती,
मुखौटे से दिखे सब, मूक मय अवाक,
ग्रसित हैं, मुक्त करो, बस यही विनती,
कुछ न बचा, साथ गयी झूठी साख|

एक बटन दबा, एक घनघोर ध्वनी,
चिथड़े उड़े, हर ओर गिरे, सब शांत,
चीख भी उसकी, न निकली, न सुनी,
रो उठे सागर, हिंद से लेकर प्रशांत|

लाचार लगे अब, कुछ न कर पाऊँ,
शीश महल, अब नहीं बचा, चूर-चूर,
घर कब्जाया, खतरा, अब कहाँ जाऊं,
पास था साहिल, लगे अब दूर-दूर|

शैतान था वो, कुकृत्य किया जिसने,
बेबाक जिंदगी, न कभी जिए डरके,
सरफ़रोश हुआ, तृप्त-अमृत पिया उसने
जल उठी धरती जब धू धू करके|

Written by arpitgarg

July 15, 2011 at 9:17 pm

न भूल सका

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पहली बार जो तुझको देखा था,
शरमाई औ सकुचाई सी थी,
कुछ डरी औ कुछ घबराई सी थी,
भूला मैं यह सब कुछ, न भूल सका,
बस तेरे चेहरे पर आती हुई वो लट|

बच रही थी तू मुझसे, कौन है यह?
शायद कुछ ज्यादा ही उतावला था मैं,
तिर्छी निगाहों से वैसे, देख रही थी तू,
भूला मैं यह सब कुछ, न भूल सका,
बस तेरी वो पहली नश्तर सी हँसी|

दो घंटे इंतज़ार करवाया था तूने,
पहली बार मिले थे जब हम तुम,
ऐसी नादान बन रही थी तू, क्या कहता,
भूला मैं यह सब कुछ, न भूल सका,
बस तेरी वो बिंदी जो कुछ टेढ़ी थी|

लम्बी लम्बी बातें तेरी, नहीं ख़त्म,
जो होती थी, पक-पक पक-पक तेरी,
न जाने कब अच्छी लगने लगी थी,
भूला मैं यह सब कुछ, न भूल सका,
बस तेरा वो तकिया-कलाम, हाय|

निगाहों का नशा तेरा, रिश्ता मेरा,
तेरा रूठना, मनाना मेरा, पल छिन,
वो प्यार से तेरा मुझ पे मुक्के बरसना,
भूला मैं यह सब कुछ, न भूल सका,
बस तेरी वो आखों की सरफरोशी|

तेरा मेरे पास आना, दूर जाना, सताना,
रोकना मुझे, प्यार बरसना, कतराना,
तेरे नखरे सहना, तुझे कुछ न कहना,
भूला मैं यह सब कुछ, न भूल सका,
बस वो सारे ख्वाब जो तेरे नाम किये||

Written by arpitgarg

July 11, 2011 at 7:32 pm

Posted in Hindi, Love, Poetry

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ठर्कीपन

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बात है उस दिन की, पैदा हुआ था मैं,
सफ़ेद लिबास में पुचकार रही थी वो,
उम्र न देखी, वक़्त न देखा, बस ली फिर्की,
नर्स को ही देखकर हो गया मैं ठर्की|

नर्सरी क्लास का है किस्सा यह,
आगे की कुर्सी पे बैठी थी वो,
खींच दी आहिस्ता से चोटी उसकी,
उसकी नन्ही जुल्फों में उलझा ये ठर्की|

चौथी कक्षा की टीचर जी,
हर बच्चा उन पे मरता था,
कितनों से लड़ा, कितनी तोड़ी बत्तीसी,
ब्लैक बोर्ड की लिखाई ने कर दिया ठर्की|

स्कूल के मास्टर की कोचिंग जाता था,
कुछ अपनापन था वहां, दिल को भाता था,
नंबर अब जो भी दे वो, बेटी भा गयी मास्टर की,
फेल और पास क्या जाने, यह मन तो है ठर्की|

बचपन का दोस्त था जो, एक दिन बोला वो,
नीले दुपट्टे में आई है जो, दिल ले गयी मेरा,
कहने को भाभी होनी थी, पर मर्जी इश्वर की,
समझा लूँगा दोस्त को मैं, न समझे ये दिल ठर्की|

कम्पटीशन का पेपर देने बैठा था, आर या पार,
दो सीट आगे बैठी थी, दिल हुआ बेकरार,
सलेक्श हो जाएगा अगले साल सही,
आज जी भर के देखूं उसको, हो कर ठर्की|

ऑफिस में तो सुधर जा अब, सीधा बन,
शिकायत करेगी, जायेगी नौकरी, होगी कुर्की,
जान दे, दूसरी मिल ही जायेगी नौकरी तो,
आज रोका तो बुरा मान जाएगा दिल ठर्की|

बचपन में सीखा था मैंने,
कैसा भूल गया यह ज्ञान,
अब ना भूलूंगा जीवन भर,
हर दिन जाप करूंगा, जी कर, मर कर|

इश्क में पड़ेगा तो जान से जाएगा,
ऐसा घुसेगा, पानी नहीं पायेगा,
जूतों से पिटवाएगी यह लड़की,
नज़र रख सीधी, मत बन ठर्की||

कौन है तू

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रात को आग़ोश में लेने दो,
सुबह को ख्वाब ही रहने दो,
ऐ यार तेरे खुमार में हूँ,
मुझे इस प्यार में डूबा रहने दो|
 
भूख प्यास कोई ना लगती,
सुनता था तो हँसता था में,
पर भूख मरी, जब प्यास मरी जब,
हर पल आहें भरता था में|
 
आँख बचाकर, आँख मिलाना,
अहसासों पर काबू पाना,
सुनने में  ही लगता है,
पर होता नहीं है आसां ये|
 
नींद गयी है, चैन गया है,
तारों की गिनती करता हूँ,
सुबह को कैसे उठ जाऊं में,
रात को सोता कौन सा हूँ|
 
वो पल्लू जो पहिये में अटक गया,
मेरा मन भी उसमें लिपटा  था,
तूने जो फाड़ के फैंका था,
पत्र नहीं वो, दिल था मेरा|
 
माना, किस्मत मेरी खोत्ती है,
पर ज्यादा गुलामी ना होती है,
हाँ कर देगी तो मेरी है,
ना कर दे जो, मर्ज़ी तेरी|
 जीवन का पहिया चलता है,
आगे को, बस आगे को|
 
हसीन सा ख्व़ाब, तू आयी थी,
पर नींद तो टूट ही जाती है,
ओर दिल भी जुड़ ही जाता है,
होगा, किस्मत को जो है मंज़ूर,
कौन हूँ में, कौन है तू ||

Written by arpitgarg

May 11, 2011 at 7:41 pm

नन्ही परी, चंचलता भरी

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एक थी चुलबुल नन्ही सी परी,
चंचलता, चपलता, शरारत भरी,
मुस्कान से उसकी, रोशन था ज़माना,
पड़े सब पीछे, उसको था फंसाना|

आया एक राजकुमार तभी,
सबसे लड़ा और उसे ले उड़ा,
आह भरी, देखते रह गए सभी,
आसां न था, युद्ध हुआ था कड़ा|

पर किस्मत को था मंज़ूर नहीं,
नज़र लगी उसको जमाने की,
अभिमन्यु का भी चक्रव्यूह क्या होगा,
फंसी वो बेचारी जान थी जिसमें|

आंसू न बहा तू, आंसू का मोल है तेरे,
खुशियाँ हैं तेरी, सब गम हैं मेरे,
वक़्त बुरा ना रहता, चला जाता है,
तेरा यह उदास मुख, पर नहीं भाता है|

चहकती महकती सी गुड़िया जो है तू,
चहकती महकती सी गुड़िया ही रह तू,
चहकना महकना ही भाता ही तुझको,
चहकना तेरा, महकाता है सबको|

ठहराव थोड़ा बस आता है,
रुकती नहीं है चाल,
भूल के तू सबकुछ,
मचा वही पुराना धमाल|

कुछ होते हैं सच्चे, कुछ होते हैं कच्चे,
पर कुछ तुझ जैसे, बस होते हैं अच्छे,
आंसू न बहा तू, आंसू का मोल है तेरे,
खुशियाँ हैं तेरी, सब गम हैं मेरे|

Written by arpitgarg

March 26, 2011 at 6:34 pm

शादी मुबारक हो दोस्त!

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बात उन दिनों की है,
जब बेफिक्री का आलम था,
फ़ालतू थे, वक़्त नहीं कम था,
संग में छड़ी थी वो सीड़ियाँ,
संग में लिया था पहला कदम|
 
वो पहला कश, वो पहला जाम,
वो चुराया हुआ पल, वो अधूरा काम,
संग में छेड़ी थी कुडियां,
संग में डाला था दाना,
वो देना सफायियाँ, नया बहाना|
 
हर दिन नयी कसम,
बस आज से पढ़ेंगे,
नया अध्याय, शुरू करेंगे,
और वही हर बार का काम,
दिन को लुक्खागिरी, रात को जाम|
 
वो संपादकीय लेख,
वो अपनी धौंस जमाना,
देख लेंगे साले को, अगला लेख उस पे,
पता नहीं है पंगा लिया है किस से,
साथ-साथ थे, इसलिए सब कर गए,
वरना यही कहते कि, ‘… लग गए’|
 
वो पालतू बिल्ली जो थी,
आज भी याद आती है,
बिलोंटा देखते ही,
उसकी चीख निकल जाती थी|
 
संग में मिलकर दुनिया को गालियाँ दी,
अलग-अलग शहर चले गए,
नज़र लग गयी उसी ज़माने की|
 
तू अब नयी ज़िन्दगी शुरू करने जा रहा है,
बहुत खुश हूँ दोस्त तेरे लिए,
तू सलामत रहे यही दुआ करूंगा,
क्यूंकि करता हूँ में खुद से भी बहुत प्यार, 
मेरी उम्र तुझे लग जाए, यह नहीं कहूँगा|
 
तेरी होनी वाली जीवन साथी से,
तुझे मिले अपार प्रेम,
जब कभी तेरे घर आऊँ,
वैसे तो दोस्तों से कम ही मिल पाते हैं,
एक कप चाय पिला दे भाभी बस,
यह ना कहे, “कैसे-कैसे दोस्त आ जाते हैं”?

एक सताती बात

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एक सताती बात,
कि होता क्यूं है तांडव,
बने सब कौरव पांडव,
बीच बाज़ार के आगे,
न कोई पर्दा ढाके,
न कोई अपने क्यूं है,
न आते सपने क्यूँ हैं,
रात दिन, दिन रात|

एक सताती बात,
कि क्यूं कोई भूखा सोता,
क्यूं कोई बच्चा रोता,
अनाज है धरती देती,
मुफत, ना पैसे लेती,
क्यूं फिर सबको न मिलती,
फ़कत दो वक़्त की रोटी,
रात दिन, दिन रात|

एक सताती बात,
कि क्यूं कोई इतना लोभी,
ना आती लाज जराभी,
जब है कोई बहू जलाता,
चंद रुपयों की खातिर,
बने कोई इतना शातिर,
कि बस पैसा ललचाये,
रात दिन, दिन रात|

एक सताती बात,
बुढ़िया की किस्मत कैसी,
कि उसकी आँखें तरसी,
पर उसका पूत ना पूछे,
उसे तो बोझ लगे अब,
जब निकले सब मतलब,
कहाँ पे हुई थी गलती,
यही ईश्वर से पूछे,
रात दिन, दिन रात|

एक सताती बात,
कि देखो खाखी-खादी,
करें देश बर्बादी,
औ हम सब चुप कर देखें,
बेबस धृतराष्ट्र के जैसे,
वतन का हरते चीर,
अरे अब जाग भी जा तू,
तुझे धरती है पुकारे,
रात दिन, दिन रात|