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Archive for the ‘Poetry’ Category

रात जवां, अभी ढली नहीं

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नश्तर से नैन तेरे चल जाते,
जब तब, घायल कर जाते,
दिल को मेरे हाय, तब तब,
थोडा ठहर, न हो रुखसत,
रात जवां, अभी ढली नहीं|

प्यारी सी हँसी, कोमल पंखुडियां,
होठ तेरे, ललचाते मुझको,
शर्म से लाल गाल तेरे,
कितना रोकूँ, तड़पाते मुझको,
थोडा ठहर, न हो रुखसत,
रात जवां, अभी ढली नहीं|

जब होती है तू उदास, रोता है,
मन मेरा, दुखता अन्दर कुछ मेरे,
मत बहाना कभी तू आंसू,
बहुत कीमती हैं, पूछ मुझसे,
थोडा ठहर, न हो रुखसत,
रात जवां, अभी ढली नहीं|

जुल्फें तेरी, उलझी सुलझी,
हर वक़्त तेरा जूझना उनसे,
पर जैसी भी हैं, भाता है मुझे,
उंगलियाँ जब फसती हैं मेरी,
थोडा ठहर, न हो रुखसत,
रात जवां, अभी ढली नहीं|

बचपना तेरा, इतराना, कट्टी,
हंस पड़ता हूँ, बंद आँखें करके,
मेरे छूने से होती सिरहन तुझे,
तुझे परेशां करता मैं हक़ से हूँ,
थोडा ठहर, न हो रुखसत,
रात जवान, अभी ढली नहीं|

जाना है तो जा, न पीछा
करूंगा मैं, बस निगाहें मेरी,
रुखसत भी हो गयी जो तू,
अहसास को कैसे ले जायेगी,
कितना भी दूर चली जा,
यह रात लौटकर फिर आएगी||

Written by arpitgarg

September 5, 2011 at 12:30 am

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चार भौंकते कुत्ते

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सपने में आते हैं मेरे,
डरता हूँ मैं, खौफनाक ,
क्यों न मुझको सोने देते,
वो चार भौंकते कुत्ते|

मैंने क्या बिगाड़ा तेरा है,
क्या ऐसा पाप किया है,
सुख चैन हर ले गए जो,
वो चार भौंकते कुत्ते|

एक बेचैनी सी छाई है,
पसीना पसीना हुआ हूँ मैं,
क्यों दिल को मेरे धड्काते,
वो चार भौंकते कुत्ते|

सुनसान गली, रास्ता तंग,
घेर लिया मुझे चारों ओर,
मेरे पापों की गिनती करवाते,
वो चार भौंकते कुत्ते|

काँप रहा मैं, ठण्ड लगी,
मुख में मेरे आवाज दबी,
राम नाम मुझसे जपवाते,
वो चार भौंकते कुत्ते|

तभी एक तेज रोशनी दिखी,
आँखें खुली, कुछ साफ़ हुआ,
मुझे साहस देने आये थे,
मेरे डर को भागने आये थे,
मुझे हिम्मत देके चले गए,
मेरे डर को लेके चले गए,
वो चार भौंकते कुत्ते|

Written by arpitgarg

August 29, 2011 at 6:27 pm

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ऐसा नहीं है

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ऐसा नहीं था कि मुझे कुछ गम था,
पर जीवन में लगता कुछ कम था|
पत्र तो था पर मंजिल थी लापता,
अगले मोड़ पे टकराइगी, क्या था पता||

ऐसा नहीं था कि मैं कोई विश्वामित्र था,
पर तपस्या थी हकीकत, न चल-चित्र था|
इन्द्र की बारिश, ये दिल सह न सका,
जब तन मन तपाने बनी तू मेनका|

ऐसा नहीं था कि कभी मस्ती नहीं थी,
पर अपनी कोई अलग हस्ती नहीं थी|
दौड़ा गयी तू सिरहन, मिली नयी राह,
कट रहा था जीवन, आई नयी चाह|

ऐसा नहीं था कि कोई पगला था मैं,
हाँ समझदारी में थोडा कंगला था मैं|
‘हड़बड़ी कबतक, आदतें सुधारो’, तूने ज्ञान दिया,
ज्यादा नहीं गर थोड़ा तो समझदार किया|

ऐसा नहीं था कि दिल ये पत्थर था,
पर धड़कने को नहीं ये तत्पर था|
मौत के जैसे आई औ जिंदगी दे गयी,
दिल को धड़का, मेरी सांसें ले गयी|

ऐसा नहीं है तू मुझे भाती नहीं,
या सुबह शाम तेरी याद आती नहीं|
सहे हैं दुःख तूने, और दे नहीं सकता,
असमंजस है मेरा, वक़्त ले नहीं सकता|

Written by arpitgarg

August 20, 2011 at 2:45 am

सारे जहाँ से अच्छा

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सारे जहाँ से अच्छा, कहता था एक बच्चा,
हम बुलबुलें हैं इसकी, कहती थी दादी उसकी,
ग़ुरबत में हों अगर हम, विश्वास न हो बस कम,
रहता हो दिल वतन में, फक्र से न घुटन में|

परवत वो सब से ऊँचा, सबने लहू से सींचा,
गोदी में हज़ारों नदियाँ, हो गयी हैं जिनको सदियाँ,
ए आब-ए-रूद-ए-गंगा, दुबकी जो कर दे चंगा,
मज़हब नहीं सिखाता बैर, असल बात जाने दो खैर|

हिन्दी हैं हम वतन है, दुश्मन करें जतन हैं,
यूनान-ओ-मिस्र-ओ-रोमा, कुछ गए, कुछ को कोमा,
हस्ती मिटती नहीं हमारी, झूझने की है बीमारी,
हम तुझको क्यों सुनाएं, दर्द-ए-निहाँ हमारा|

PS: My tribute to Saare Jahan se Accha by Muhammad Iqbal

Written by arpitgarg

August 13, 2011 at 3:00 pm

आँखों में हैं ऐसी तन्हाइयां

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मेरी आँखों में हैं ऐसी तन्हाइयां,
कि नींदों में आती बस अंगड़ाइयां|
लगे है बेगाना कुछ ऐसा जहां,
जैसे ओझिल है रातों को परछाइयां|

पास होकर भी वो दूर जाती रही,
मार ठोकर हमें, मुस्कराती रही|
उसकी लानत में है एक ऐसा मज़ा,
बिना उसके ताने, यह जीवन सजा|

उन बातों की यादें, हैं आती मुझे,
कि रातों कि आहट में खोजूं तुझे|
तेरी मुस्कराहट, एक ऐसा नशा,
उन मदहोशियों में, यह बेबस फसा|

जंगल का राजा, होने दो शेर को,
एक दिन तो खदेड़ा वो भी जाएगा|
अगर पास हो शेरनी,  तेरे जैसी तो,
खदेड़ने पर भी राजा वो कहलायेगा|

ऐ काश, रेत रूकती मेरे हाथ में,
समय को भी थमने को कह पाता मैं|
तो साहिल से कराता में पहचां तेरी,
और चुपके से तुझको सता जाता मैं|

होश वालों को होती नहीं जो खबर,
वो खबर मैं नशे में सुनाता रहा|
रात भर मेघ काले, बरसते रहे,
रात भर गीत, मैं गुनगुनाता रहा|

मेरी आँखों में हैं ऐसी तन्हाइयां,
कि नींदों में आती बस अंगड़ाइयां|
लगे है बेगाना कुछ ऐसा जहां,
जैसे ओझिल है रातों को परछाइयां||

Written by arpitgarg

July 25, 2011 at 10:51 pm

जल उठी धरती फिर

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जल उठी धरती फिर धू धू करके,
फिर हुआ स्तम्भ विस्तंभ आज,
छाती चौड़ी, अब जीता डरके,
गम में मुस्कराना, गहरा राज|

कुछ घना, कुछ गहरा, एक साया,
चहचहा उठे पंची सारे, सांझ भई,
धड़कन बढ़ी, सकुचा, दिल घबराया,
पुराने सब काल हुए, दुर्घटना नई|

कितने हँसे, कितने रोये, क्या गिनती,
मुखौटे से दिखे सब, मूक मय अवाक,
ग्रसित हैं, मुक्त करो, बस यही विनती,
कुछ न बचा, साथ गयी झूठी साख|

एक बटन दबा, एक घनघोर ध्वनी,
चिथड़े उड़े, हर ओर गिरे, सब शांत,
चीख भी उसकी, न निकली, न सुनी,
रो उठे सागर, हिंद से लेकर प्रशांत|

लाचार लगे अब, कुछ न कर पाऊँ,
शीश महल, अब नहीं बचा, चूर-चूर,
घर कब्जाया, खतरा, अब कहाँ जाऊं,
पास था साहिल, लगे अब दूर-दूर|

शैतान था वो, कुकृत्य किया जिसने,
बेबाक जिंदगी, न कभी जिए डरके,
सरफ़रोश हुआ, तृप्त-अमृत पिया उसने
जल उठी धरती जब धू धू करके|

Written by arpitgarg

July 15, 2011 at 9:17 pm

न भूल सका

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पहली बार जो तुझको देखा था,
शरमाई औ सकुचाई सी थी,
कुछ डरी औ कुछ घबराई सी थी,
भूला मैं यह सब कुछ, न भूल सका,
बस तेरे चेहरे पर आती हुई वो लट|

बच रही थी तू मुझसे, कौन है यह?
शायद कुछ ज्यादा ही उतावला था मैं,
तिर्छी निगाहों से वैसे, देख रही थी तू,
भूला मैं यह सब कुछ, न भूल सका,
बस तेरी वो पहली नश्तर सी हँसी|

दो घंटे इंतज़ार करवाया था तूने,
पहली बार मिले थे जब हम तुम,
ऐसी नादान बन रही थी तू, क्या कहता,
भूला मैं यह सब कुछ, न भूल सका,
बस तेरी वो बिंदी जो कुछ टेढ़ी थी|

लम्बी लम्बी बातें तेरी, नहीं ख़त्म,
जो होती थी, पक-पक पक-पक तेरी,
न जाने कब अच्छी लगने लगी थी,
भूला मैं यह सब कुछ, न भूल सका,
बस तेरा वो तकिया-कलाम, हाय|

निगाहों का नशा तेरा, रिश्ता मेरा,
तेरा रूठना, मनाना मेरा, पल छिन,
वो प्यार से तेरा मुझ पे मुक्के बरसना,
भूला मैं यह सब कुछ, न भूल सका,
बस तेरी वो आखों की सरफरोशी|

तेरा मेरे पास आना, दूर जाना, सताना,
रोकना मुझे, प्यार बरसना, कतराना,
तेरे नखरे सहना, तुझे कुछ न कहना,
भूला मैं यह सब कुछ, न भूल सका,
बस वो सारे ख्वाब जो तेरे नाम किये||

Written by arpitgarg

July 11, 2011 at 7:32 pm

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अंगुलियाँ तेरी

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गुनगुनाती हैं नए तराने,
अहसासों का सैलाब लिए,
कुछ न कहकर सब कह जाती,
तेरी यह जालिम अंगुलियाँ|
 
कमल की कोमल पंखुड़ियां,
छू देती हैं, सिरहन करके,
होने की मेरे करती पुष्टी,
तेरी यह मादक अंगुलियाँ|
 
हाथों में लेकर पुच्के/गुजिया,
ओठों तक तेरे जो पहुंचाती,
कभी आह भरी, कभी चाह भरी,
तेरी यह पूरक अंगुलियाँ|
 
शोभा हीरे की तुझसे है,
जो अंगूठी बनके बैठा है,
हीरे की चमक को चमकाती,
तेरी यह यौवन अंगुलियाँ|
 
जाते में मुझको पकड़ा था,
बाहों में भींच के जकड़ा था,
बालों, कपडों को खींच रही,
तेरी यह गुमसुम अंगुलियाँ|
 
दिन था बुरा, परेशां था में,
सर पर मेरे वो शीतल स्पर्श,
हाथ लगाकर दर्द किया फुर्र,
थकान मिटाती यह अंगुलियाँ|
 
लाल की लाली में डूबीं कभी,
कभी हरियाई हरे की छाई है,
नाखूनों पर छितरे सतरंग से,
इन्द्रधनुष सी तेरी यह अंगुलियाँ|
 
वो बारिश में तले पकोड़े थे,
गरम गरम औ सुरख सुरख,
उनपर एक छाप सी छोड़ गयीं,
तेरी यह पाँचों अंगुलियाँ|
 
साथ साथ थे पकडे हाथ,
तुझे अपना बनाया मैंने था,
पहना के अंगूठी प्रेम की,
मेरी हो गयीं, तेरी अंगुलियाँ||

Written by arpitgarg

June 16, 2011 at 2:43 pm

ठर्कीपन

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बात है उस दिन की, पैदा हुआ था मैं,
सफ़ेद लिबास में पुचकार रही थी वो,
उम्र न देखी, वक़्त न देखा, बस ली फिर्की,
नर्स को ही देखकर हो गया मैं ठर्की|

नर्सरी क्लास का है किस्सा यह,
आगे की कुर्सी पे बैठी थी वो,
खींच दी आहिस्ता से चोटी उसकी,
उसकी नन्ही जुल्फों में उलझा ये ठर्की|

चौथी कक्षा की टीचर जी,
हर बच्चा उन पे मरता था,
कितनों से लड़ा, कितनी तोड़ी बत्तीसी,
ब्लैक बोर्ड की लिखाई ने कर दिया ठर्की|

स्कूल के मास्टर की कोचिंग जाता था,
कुछ अपनापन था वहां, दिल को भाता था,
नंबर अब जो भी दे वो, बेटी भा गयी मास्टर की,
फेल और पास क्या जाने, यह मन तो है ठर्की|

बचपन का दोस्त था जो, एक दिन बोला वो,
नीले दुपट्टे में आई है जो, दिल ले गयी मेरा,
कहने को भाभी होनी थी, पर मर्जी इश्वर की,
समझा लूँगा दोस्त को मैं, न समझे ये दिल ठर्की|

कम्पटीशन का पेपर देने बैठा था, आर या पार,
दो सीट आगे बैठी थी, दिल हुआ बेकरार,
सलेक्श हो जाएगा अगले साल सही,
आज जी भर के देखूं उसको, हो कर ठर्की|

ऑफिस में तो सुधर जा अब, सीधा बन,
शिकायत करेगी, जायेगी नौकरी, होगी कुर्की,
जान दे, दूसरी मिल ही जायेगी नौकरी तो,
आज रोका तो बुरा मान जाएगा दिल ठर्की|

बचपन में सीखा था मैंने,
कैसा भूल गया यह ज्ञान,
अब ना भूलूंगा जीवन भर,
हर दिन जाप करूंगा, जी कर, मर कर|

इश्क में पड़ेगा तो जान से जाएगा,
ऐसा घुसेगा, पानी नहीं पायेगा,
जूतों से पिटवाएगी यह लड़की,
नज़र रख सीधी, मत बन ठर्की||

कौन है तू

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रात को आग़ोश में लेने दो,
सुबह को ख्वाब ही रहने दो,
ऐ यार तेरे खुमार में हूँ,
मुझे इस प्यार में डूबा रहने दो|
 
भूख प्यास कोई ना लगती,
सुनता था तो हँसता था में,
पर भूख मरी, जब प्यास मरी जब,
हर पल आहें भरता था में|
 
आँख बचाकर, आँख मिलाना,
अहसासों पर काबू पाना,
सुनने में  ही लगता है,
पर होता नहीं है आसां ये|
 
नींद गयी है, चैन गया है,
तारों की गिनती करता हूँ,
सुबह को कैसे उठ जाऊं में,
रात को सोता कौन सा हूँ|
 
वो पल्लू जो पहिये में अटक गया,
मेरा मन भी उसमें लिपटा  था,
तूने जो फाड़ के फैंका था,
पत्र नहीं वो, दिल था मेरा|
 
माना, किस्मत मेरी खोत्ती है,
पर ज्यादा गुलामी ना होती है,
हाँ कर देगी तो मेरी है,
ना कर दे जो, मर्ज़ी तेरी|
 जीवन का पहिया चलता है,
आगे को, बस आगे को|
 
हसीन सा ख्व़ाब, तू आयी थी,
पर नींद तो टूट ही जाती है,
ओर दिल भी जुड़ ही जाता है,
होगा, किस्मत को जो है मंज़ूर,
कौन हूँ में, कौन है तू ||

Written by arpitgarg

May 11, 2011 at 7:41 pm